Sep 15, 2024

'आइना देख कर तसल्ली हुई..', दिल की मायूसी को पल में मिटा देंगी गुलजार की ये नज्में

Suneet Singh

​आपकी कमी​

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।

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​जिंदगी​

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा।

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​आइना​

आइना देख कर तसल्ली हुई,
हम को इस घर में जानता है कोई।

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​वक्त​

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
आदत इस की भी आदमी सी है।

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​वादा​

आदतन तुम ने कर दिए वादे,
आदतन हम ने ए'तिबार किया।

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​आंखें​

जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ,
उस ने सदियों की जुदाई दी है।

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​जिंदगी​

कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है,
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है।

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​रिश्ते​

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते,
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते।

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​कल और आज​

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था,
आज की दास्ताँ हमारी है।

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