Dec 03, 2025
1660 के दशक तक शिवाजी महाराज सैन्य और प्रशासनिक दृष्टि से सबसे मजबूत मराठा नेता बन चुके थे, जिससे राजाभिषेक की मांग तेज हो गई।
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समर्थ रामदास ने उन्हें हिंदवी स्वराज्य का योग्य नेतृत्वकर्ता माना। यह धार्मिक और सामाजिक स्वीकृति उपाधि मिलने का आधार बनी।
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शिवपुरी में राज्याभिषेक की तैयारियां महीनों चलीं। पूरे हिंदुस्तान से पंडित, विद्वान और प्रतिनिधि पहुंचे।
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काशी के विद्वान गागाभट्ट ने उनका वंश ‘सिसोदिया राजपूत’ परंपरा से जोड़ा और उन्हें राजतिलक योग्य घोषित किया। इससे ‘छत्रपति’ उपाधि को औपचारिक स्वरूप मिला।
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भारतीय परंपरा में ‘छत्र’ राजा की सर्वोच्च सत्ता और संरक्षण का प्रतीक है। इसे धारण करने वाले को छत्रपति यानी "छत्रधारी सम्राट" कहा जाता था।
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पति का अर्थ है स्वामी या संरक्षक। इस प्रकार ‘छत्रपति’ का मतलब हुआ— ऐसा राजा जो अपनी प्रजा को संरक्षण दे और राज्य का सर्वोच्च अधिकार रखे।
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यह उपाधि अन्य सरदारों पर सर्वोच्च नेतृत्व स्थापित करती थी। मराठा सैन्य शक्ति को इससे वैध एकता और दिशा मिली।
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राजाभिषेक के साथ मराठा शासन पहली बार पूर्णतः स्वतंत्र और वैध सत्ता बना। यह उपाधि स्वतंत्र भारत के सपने की घोषणा थी।
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उन्हें यह उपाधि इसलिए मिली क्योंकि वे युद्ध नीतियों, प्रशासन, न्याय और धर्म-सम्मान के आदर्श प्रतीक थे। ‘छत्रपति’ उनके साम्राज्य, साहस और जनकल्याण का स्थायी सम्मान है।
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