Location Tracking Technology: टेक्नोलॉजी ने पूरी दुनिया का परिवेश बदल दिया है। इससे हमें कई तरह के बड़े फायदे हुए हैं तो इसके कुछ नुकसान भी हैं। हम लोग अपनी डेली रूटीन लाइफ में न जानें कितने ऐसे काम करते हैं जो सीधे सीधे टेक्नोलॉजी से जुड़े रहते हैं। टेक्नोलॉजी से हम इस कदर तक घिर चुके हैं कि अब हमारा छुप के रह पाना भी बहुत मुश्किल। आप चाहे रोड में हो या फिर अपने घर के किसी कमरे में बैठे हों एक पल में आपकी लोकेशन को चुटकियों में ट्रैक किया जा सकता है।
हमारे आस पास के परिवेश में कैमरे का जाल बिछ चुका है। सड़क हो, ऑफिस हो, शॉपिंग मॉल हो हर कहीं न कहीं आप कैमरे की नजर में रहते हैं। अब तो टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि आपकी लोकेशन को ट्रैक करने के लिए किसी कैमरे की जरूरत नहीं है। मतलब आप बिना कैमरे के भी ट्रैक किए जा सकते हैं और इस काम में सबसे बड़ी मदद करता है हमारा स्मार्टफोन। स्मार्टफोन के अलावा भी दूसरी कई ऐसी चीजें भी हैं जो आपकी लोकेशन को ट्रैक करने में मदद करती हैं जैसे- आपकी गाड़ी, आपके द्वारा ऑनलाइन फूड बुकिंग या फिर आपका ऑनलाइन पेमेंट करना।
लोकेशन ट्रैकिंग आज के समय में इतनी आसान हो चुकी है कि एक साधारण आदमी घर बैठे एक सस्ते डिवाइस से भी हजारों किलोमीटर दूर चल रही ट्रेन, बस या फिर आपकी गाड़ी की लोकेशन को पता कर लेता है। हम जब भी ऑनलाइन कैब की बुकिंग करते हैं हम भी कैब ड्राइवर की लोकेशन को लगातार ट्रैक करते रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये लोकेशन ट्रैकिंग किस तरह से काम करता है, आपको कैसे पता चल जाता है कि आपका ऑनलाइन ऑर्डर कितनी दूर पर या फिर ड्राइवर आपकी गाड़ी को कहां लेकर जा रहा है। आज हम आपको ऑनलाइन ट्रैकिंग से जुड़े कुछ ऐसे ही खास सवालों का जवाब देने जा रहे हैं।
कैसे काम करती है लोकेशन ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी?
सबसे पहले आपको बता दें कि लोकेशन ट्रैकिंग किसी एक टेक्नोलॉजी का काम नहीं है। यह कई तरह की अलग अलग तकनीक पर काम करती है और सबको साथ मिलकार एक सिस्टम तैयार किया जाता है जो ह्यूमन्स, पशुओं और गाड़ियों पर नजर रखता है। आइए आपको इसमें इस्तेमाल होने वाली हर एक तकनीक के बारे में बताते हैं।
जियोग्राफिक इंफोर्मेशन सिस्टम (GIS) - जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) एक ऐसा सिस्टम होता है जो जगहों से जुड़ी जानकारी को इकट्ठा करता है, उसे सुरक्षित रखता है, उसका एनालिसिस करता है और जरूरत के अनुसार रिपोर्ट तैयार करता है।
बड़े स्तर पर लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम बनाने के लिए अलग-अलग स्थानों की सही जानकारी रखना बहुत जरूरी होता है। GIS इसी काम को आसान बनाता है। यह मैप्स और लोकेशन डेटा की मदद से हमें यह समझने में मदद करता है कि कोई चीज़ कहाँ स्थित है, कैसे बदल रही है और उससे जुड़ी जानकारी का उपयोग कैसे किया जा सकता है।
ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम (GPS) - धरती के ऊपर अंतरिक्ष में करीब 27 सैटेलाइट लगातार घूमते रहते हैं। आपके मोबाइल फोन या गाड़ी में लगा GPS इन सैटेलाइट्स से सिग्नल लेकर आपकी लोकेशन पता करता है। आमतौर पर यह कम से कम 4 सैटेलाइट्स की मदद से सही जगह की जानकारी देता है।
शुरुआत में GPS को सेना के इस्तेमाल के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसका उपयोग सर्वे, खेती और ट्रांसपोर्ट जैसे कई कामों में किया जाता है। बाहर (आउटडोर) लोकेशन पता करने के लिए यह बहुत ही उपयोगी और भरोसेमंद तकनीक है।
रेडियो फ्रीक्वैंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) - RFID टैग बहुत छोटे माइक्रोचिप्स होते हैं, जिनमें बैटरी नहीं होती। इन्हें किसी सामान, जानवर, गाड़ी या किसी भी चीज पर लगाकर उसकी मूवमेंट को ट्रैक किया जा सकता है।
ये टैग पैसिव होते हैं, यानी ये अपने आप डेटा नहीं भेजते। जब कोई RFID रीडर इनके पास आता है और रेडियो वेव्स भेजता है, तब ये एक्टिव हो जाते हैं और उसी रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए अपना डेटा वापस भेजते हैं।
वायरलेस लोकल एरिया नेटवर्क (WLAN) - WLAN एक ऐसा नेटवर्क होता है जिसमें डिवाइस रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए आपस में जुड़े रहते हैं। यह रेडियो वेव्स की मदद से डेटा एक डिवाइस से दूसरे तक भेजता है और आमतौर पर 70 से 300 फीट की दूरी तक काम कर सकता है। आज हम जो भी लोकेशन-बेस्ड सर्विसेज इस्तेमाल करते हैं, उनमें इन जैसी एक या एक से ज्यादा तकनीकों का मिलाकर उपयोग किया जाता है।
Location Tracking
लोकेशन ट्रैकिंग कितने टाइप की होती है?
वाइड-एरिया ट्रैकिंग- जब काम बड़े स्तर पर होता है, तो कंपनियों को पूरे देश में चल रही अपनी गाड़ियों पर नजर रखनी पड़ती है। इसके लिए GPS एक बहुत अच्छा ट्रैकिंग तरीका माना जाता है। गाड़ियों में GPS डिवाइस लगाए जाते हैं, जो सैटेलाइट से सिग्नल लेकर उनकी सही लोकेशन बताते हैं। इससे कंपनी आसानी से अपनी सभी गाड़ियों को ट्रैक कर सकती है और उनकी गतिविधियों पर नजर रख सकती है।
लोकल एरिया या इनडोर ट्रैकिंग- बड़े स्तर पर GPS बहुत काम की तकनीक है, लेकिन वेयरहाउस या अस्पताल जैसी बंद जगहों (इनडोर) में इसका असर कम हो जाता है। ऐसी जगहों पर RFID टैग्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही WLAN नेटवर्क भी काम आता है। RFID टैग की मदद से बड़े वेयरहाउस में सामान को आसानी से ढूंढा और ट्रैक किया जाता है। आजकल क्विक कॉमर्स के बढ़ने के कारण इन तकनीकों का उपयोग और भी ज्यादा बढ़ गया है।
