Vishnu Katha: जब नाराज होकर भगवान विष्णु को श्राप देने वाले थे नारद मुनि, माता लक्ष्मी ने पकड़ लिया हाथ

जो व्यक्ति अपने कार्यों को श्रद्धा के साथ करता है उस पर भगवान की कृपा दृष्टि हमेशा बनी रहती है। इस कहानी के माध्यम से आप जान सकते है, कि भगवान विष्णु के हृदय के करीब हम क्या करने से जा सकते हैं।

Vishnu Katha
Vishnu Katha 

मुख्य बातें

  • किसी भी कार्य को मन लगाकर करने से भगवान वैसे व्यक्ति पर बहुत ही प्रसन्न होते हैं।
  • इस कथा से पता चलता है कि हमें किसी कार्य को लगन के साथ करना चाहिए।
  • यदि आप किसी काम को सही तरीके से करें, तो आप प्रभु के ह्रदय में बस सकते हैं।

नई दिल्ली. भगवान विष्णु की पूजा आराधना गुरुवार के दिन की जाती है। भगवान विष्णु को पीला रंग बहुत ही प्रिय है। ऐसा कहा जाता है, कि गुरुवार के दिन यदि भक्त भगवान की प्रतिमा के सामने पीला वस्त्र धारण करके, पीला फूल और पीले चंदन से भगवान की पूजा आराधना करें, तो भगवान बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। 

एक बार की बात है, नाराज जी बैकुंठ आए थे। वहां उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु किसी की तस्वीर बनाने में बहुत ही लीन है। वहीं पर तीनो लोक के स्वामी भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और अग्नि देवता विष्णु की कृपा दृष्टि अपने ऊपर बनाने के लिए बहुत देर से खड़े थे। 

भगवान विष्णु उन्हें अपने काम में व्यस्त रहने के कारण न तो देतागणों को और न ही नारद जी को देखा। यह देख कर नाराज जी को बहुत ही गुस्सा आ गया और वह माता लक्ष्मी से गुस्से में जाकर पूछो कि प्रभु किसकी तस्वीर बनाने में इतने लीन है, कि यहां खड़े देवतागण को देखा तक भी नहीं। 

विष्णु जी की हरकत पर हुआ आश्चर्य
यह सुनकर माता लक्ष्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, भगवान विष्णु अपने सबसे प्रिय भक्त की तस्वीर बनाने में लीन है। यह सुनकर नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और उन्होंने भगवान विष्णु के बनाते हुए चित्र को देखा। 

नारदजी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि भगवान विष्णु एक गंदे अर्धनग्न व्यक्ति की तस्वीर बना रहे थे। नाराज जी को यह देख कर बड़ा गुस्सा आ गया। ऐसे तस्वीर के लिए भगवान विष्णु ने हम लोगों को देखा तक नहीं, यह सोचते हुए नाराजी उल्टे पांव से पृथ्वी लोक पर चले गए। 

नारदजी ने तुरंत पहचान लिया
कुछ दिनों तक भ्रमण करने के बाद उन्हें एक जगह पर पशुओं के चमरों से घिरा हुआ एक चर्मकार दिखा।उसे देखकर नारद जी ने तुरंत पहचान लिया कि भगवान विष्णु इसी के चित्र बना रहे थे। उस व्यक्ति के पास से काफी दुर्गंध आ रहा था, इस वजह से नाराज जी उसके पास नहीं जा सके। 

नारद जी तब अदृश्य होकर प्रतिदिन उसके दिनचर्या को देखने लगे। नाराज जी ने देखा कि वह व्यक्ति म तो मंदिर जाता है और न ही भगवान की आराधना करता हैं। यह देखकर नारद जी सोच में  पड़ गए के ऐसा व्यक्ति भगवान का इतना प्रिय कैसे बन सकता है। 

भगवान विष्णु को दिया श्राप
नारद जी को यह सोच कर बहुत गुस्सा आ गया और उन्होनें भगवान विष्णु को श्राप देने के लिए अपनी तेजस्वी हाथों को ऊपर उठाया तब ही वहां माता लक्ष्मी प्रकट होकर उनका हाथ पकड़ लिया और कही देव तुमने भक्तों की उपसंहार तो देखा ही नहीं उसे भी देख लों। 

यह सुनकर नारदजी फिर से उस चर्मकार के कार्यों को ध्यान से देखने लगे। उन्होंने देखा कि चर्मकार अपने चमरे की ढेर को समेटकर एक गठरी में बांधा लिया और एक कपड़े में सिर से पैर को पूछ कर उस गठरी के सामने झुक गया। 

प्रसन्न हुए नारादजी
चर्मकार विनम्र वाणी से कहने लगा, हे प्रभु क्षमा करना कल भी मुझे ऐसी ही बुद्धि देना, कि मैं आज की तरह ही पसीने को बहाकर आपके दिए हुए कामों को अच्छे से कर के अपना गुजारा कर सकूं। यह सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए। 

नारदजी यह समझ गए कि चर्मकार भगवान विष्णु को इतना प्रिय क्यों है। इस कहानी से साफ पता चलता है कि जो व्यक्ति अपनी आजीविका को प्रभु का दिया हुआ वरदान समझकर भक्ति के साथ उस कार्य को करते है, वही व्यक्ति भगवान के हृदय के बहुत करीब होता है।
 

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