जानें कैसे प्रारंभ हुई थी गणेशजी को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा, पढ़ें पौराणिक कथा

Ganesh Amritvani, Know the reason behind offering Ganapati ji Durva: गणपति जी की पूजा में दूर्वा को विशेष महत्व होता है, लेकिन क्या आपको पता है कि दूर्वा गणपति जी को इतनी प्रिय क्यों है?

Recognition of offering Ganpati ji to Durva, क्यों हैं गणपति जी को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा
Recognition of offering Ganpati ji to Durva, क्यों हैं गणपति जी को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा  

मुख्य बातें

  • अनलासुर को निगलने से गणपति जी के पेट में हुई थी जलन
  • इस जलन को शांत करने के लिए प्रभु को दूर्वा खिलाया गया था
  • दूर्वा गणपति जी के पेट या सिर पर ही रखना चाहिए

गणपति जी की पूजा में लाल गुड़हल के फूल और दूर्वा का महत्व सबसे अधिक होता है। यदि मनुष्य गणपति जी को बुधवार के दिन सिर्फ ये दो चीजें भी चढ़ा दे तो उसकी सारी ही मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। दूर्वा चढ़ाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी है। साथ ही दूर्वा चढ़ाते समय हर किसी को ये बात जरूर ध्यान देना चाहिए कि दूर्वा कभी भी गणपति जी के पैरों पर नहीं चढ़ानी चाहिए। दूर्वा हमेशा गणपति जी के हाथ अथवा सिर के ऊपर रखना चाहिए। गणपति जी को दूर्वा चढ़ाने के पीछे आखिर क्या मान्यता रही है, आइए आपको इस पौराणिक कथा के जरिये बताएं।

ये है गणपति जी को दूर्वा चढ़ाने के पीछे पौराणिक कारण

अति प्राचीन समय की बात है असुर के कारण धरती ही नहीं स्वर्ग में भी त्राहि मच गई थी। धरती पर मानव ही नहीं ऋषि-मुनी और स्वर्ग में देवता भी इस असुर के आतंक से कांपने लगे थे। दरअसल, अनलासुर ऐसा असुर था जो सभी प्राणियों को जिंदा ही निगल जाता था। इस दैत्य के अत्याचारों से भयाक्रांत हो कर मनुष्य देवताओं के समक्ष पहुंचे, लेकिन यह असुर देवताओं के लिए भी खतरा बनने लगा था तब सभी देवता महादेव के शरण में गए और उनसे यह प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का खात्म करें।  तब महादेव ने सबकी प्रार्थना सुनकर देवताओं को बताया कि असुर अनलासुर का नाश केवल श्रीगणेश ही कर सकते हैं। तब देवता गणपति जी के पास जा कर अपनी व्यथा सुनाएं और गणपति जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उस असुर के आतंक से सबको मुक्त करेंगे और इसके लिए गणपति जी ने अनलासुर को निगल लिया। अनलासुर को निगलने से उसके अंदर की ताप से गणपति जी के पेट अत्यंत जलन होने लगी।

इस परेशानी से निपटने के लिए कई प्रकार के उपाय किए गए, लेकिन कोई आराम न मिला तब कश्यप ऋषि ने गणपति जी को दूर्वा की 21 गांठें बनाकर खाने को दीं। यह दूर्वा खाते ही श्री गणेशजी के पेट की जलन एकदम शांत हो गई।  ऐसा माना जाता है कि श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा तभी से आरंभ हुई।  

प्रभु पर दूर्वा अर्पित करने के लाभ और जानकारी

  1. दूर्वा की पत्तियां गणपति जी को हमेशा विषम संख्या में, जैसे 3, 5, 7 अर्पित करनी चाहिए।

  2. दूर्वा हमेशा जड़ समेत अच्छी तरह से धुल कर अर्पित करें। जैसे समिधा एकत्र बांधते हैं, उसी प्रकार दूर्वा को भी बांधना चाहिए। ऐसे करने से दूर्वा की सुगंध अधिक समय बनी रहती है। उसे अधिक समय ताजा रखने के लिए पानी में भिगोकर चढ़ाते हैं। 

  3. गणेशजी पर दूर्वा के साथ बहुत सी वन्स्पतियां चढ़ाई जाती हैं, बस इसमें तुलसी दल शामिल नहीं होता। गणेशजी की तुलसी पत्र और दुर्गाजी की दूर्वा से पूजा नहीं करनी चाहिए।

  4. भगवान गणेश को गुड़हल का लाल फूल विशेष रूप से प्रिय है। दूर्वा के साथ इस फूल को चढ़ाने से हर कामना शीघ्र पूरी होती है। इसके अलावा चांदनी, चमेली या पारिजात के फूलों की माला दूर्वा के साथ बनाकर पहनाने से भी गणेश जी प्रसन्न होते हैं।

  5. गणपति का वर्ण लाल है इसलिए  उनकी पूजा में लाल वस्त्र, लाल फूल व रक्तचंदन का प्रयोग करना चाहिए।

गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं।गणपति जी को वह सब चढ़ाया जा सकता है जो उनके पिता शिवजी को चढ़ता है।

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