Chaitra Navratri:पाकिस्तान में 'देवी शक्तिपीठ' जो हिंदुओं के लिए 'मां' तो मुसलमानों के लिए है "नानी की हज"

Hinglaj Mata temple in Pakistan: पाकिस्तान में देवी की एक ऐसी शक्तिपीठ है इसकी मान्यता दुनियाभर में हिंदुओं के बीच सबसे ज्यादा है वहीं मुसलमान भी यहां दर्शन करने आते हैं।

HIGLAJ MATA TEMPLE
हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील में एक संकीर्ण घाटी में स्थित है (फोटो साभार- विकीपीडिया)  |  तस्वीर साभार: फेसबुक

मुख्य बातें

  • 51 देवी शक्तिपीठों में सबसे अहम शक्तिपीठ हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है
  • हिंदुओं के अलावा मुस्लिम भी यहां दर्शन करने आते हैं और तीर्थयात्रा को "नानी की हज" कहते हैं
  • इस देवी को हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी भी कहते हैं इस मन्दिर को 'नानी मन्दिर' के नामों से भी जाना जाता है

चैत्र नवरात्र शुरू हो गए हैं देवी मां को सभी रूपों में सजाया और पूजा जा रहा है इन नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की आराधना, व्रत और अन्य धार्मिक कार्यक्रम होते हैं इस मौके पर शक्तिपीठों में भक्तों की भीड़ भी होती है। हम आज यहां बात कर रहे हैं भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के बलूचिस्तान (Balochistan pakistan) स्थित 51 देवी शक्तिपीठों में सबसे अहम शक्तिपीठ हिंगलाज माता मंदिर (Hinglaj Mata Temple) की...

इसे हिंगलाज भवानी मंदिर भी कहा जाता है, कहा जाता है कि यह मंदिर 2000 साल से भी अधिक पुराना है, वैसे तो ये हिंदुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है वहीं मुस्लिम (Mislims) भी यहां खासी संख्या में दर्शन करने आते हैं, वे लोग इसे बेहद चमत्कारिक स्थान मानते हैं और तीर्थयात्रा को "नानी की हज" (Nani Ki Haj) कहते हैं बताते हैं कि इस शक्तिपीठ की देखभाल वहां के स्थानीय मुसलिम लोग करते हैं।

हिंगलाज माता मन्दिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त के हिंगलाज में हिंगोल नदी के तट पर स्थित एक हिन्दू मन्दिर है। यह हिन्दू देवी सती को समर्पित इक्यावन शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ इस देवी को हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी भी कहते हैं। इस मन्दिर को नानी मन्दिर के नामों से भी जाना जाता । पिछले तीन दशकों में इस जगह ने काफी लोकप्रियता पाई है और यह पाकिस्तान के कई हिंदू समुदायों के बीच आस्था का केन्द्र बन गया है।

हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील के दूरस्थ, पहाड़ी इलाके में एक संकीर्ण घाटी में स्थित है। यह कराची के उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर, अरब सागर से 12 मील अंतर्देशीय और सिंधु के मुंहाने के पश्चिम में 80 मील में स्थित है। यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर, मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की एक शृंखला के अंन्त में बना हुआ है। यह क्षेत्र हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अन्तर्गत आता है।

यहां मंदिर में देवी की कोई मानव निर्मित छवि नहीं है

मंदिर एक छोटी प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है। जहाँ एक मिट्टी की वेदी बनी हुई है। देवी की कोई मानव निर्मित छवि नहीं है। बल्कि एक छोटे आकार के शिला की हिंगलाज माता के प्रतिरूप के रूप में पूजा की जाती है। शिला सिंदूर (वर्मीमिलियन), जिसे संस्कृत में हिंगुला कहते है, से पुता हुआ है, जो संभवतया इसके आज के नाम हिंगलाज का स्रोत हो सकता है।

हिंगलाज के आस-पास, गणेश देव, माता काली, गुरुगोरख नाथ दूनी, ब्रह्म कुध, तिर कुण्ड, गुरुनानक खाराओ, रामझरोखा बेठक, चोरसी पर्वत पर अनिल कुंड, चंद्र गोप, खारिवर और अघोर पूजा जैसे कई अन्य पूज्य स्थल हैं।

यह डोडिया राजपूत की प्रथम कुलदेवी हिंगलाज माता पूजनीय है

एक लोक गाथानुसार चारणों तथा राजपुरोहित की कुलदेवी हिंगलाज थी, जिसका निवास स्थान पाकिस्तान के बलुचिस्थान प्रान्त में था। हिंगलाज नाम के अतिरिक्त हिंगलाज देवी का चरित्र या इसका इतिहास अभी तक अप्राप्य है। हिंगलाज देवी से सम्बन्धित छंद गीत अवश्य मिलती है।

सातो द्वीप शक्ति सब रात को रचात रास।
प्रात:आप तिहु मात हिंगलाज गिर में॥

उत्पत्ति की एक और कथा के अनुसार सती के वियोग मे क्षुब्ध शिव जब सती की पार्थिव देह को लेकर तीनों लोको का भ्रमण करने लगे तो भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 51 खंडों मे विभक्त कर दिया जहाँ जहाँ सती के अंग- प्रत्यंग गिरे स्थान शक्तिपीठ कहलाये । केश गिरने से महाकाली, नैन गिरने से नैना देवी, कुरूक्षेत्र मे गुल्फ गिरने से भद्रकाली, सहारनपुर के पास शिवालिक पर्वत पर शीश गिरने से शाकम्भरीआदि शक्तिपीठ बन गये सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था।

हिंगलाज माता को एक शक्तिशाली देवी माना जाता है

हिंगलाज माता को एक शक्तिशाली देवी माना जाता है जो अपने सभी भक्तों के लिए मनोकामना पूर्ण करती है। जबकि हिंगलाज उनका मुख्य मंदिर है, मंदिरों के पड़ोसी भारतीय राज्य गुजरात और राजस्थान में भी उनके लिए समर्पित मंदिर बने हुए हैं। मंदिर को विशेष रूप से संस्कृत में हिंदू शास्त्रों में हिंगुला, हिंगलाजा, हिंगलाजा और हिंगुलता के नाम से जाना जाता है। देवी को हिंगलाज माता (मां हिंगलाज), हिंगलाज देवी (देवी हिंगलाज), हिंगुला देवी (लाल देवी या हिंगुला की देवी) और कोट्टारी या कोटवी के रूप में भी जाना जाता है।

स्थानीय मुस्लिम भी हिंगलाज माता पर आस्था रखते हैं

स्थानीय मुस्लिम भी हिंगलाज माता पर आस्था रखते हैं और मंदिर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। उन्होंने मंदिर को "नानी का मंदिर" कहते है। देवी को बीबी नानी (सम्मानित मातृ दादी) कहा जाता है। बीबी नानी, नाना के समान हो सकती है, जो कुशान सिक्कों पर दिखाई देने वाले एक पूज्य देव थे और पश्चिम और मध्य एशिया में व्यापक रूप से उनकी पूजा की जाती थी। एक प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए स्थानीय मुस्लिम जनजातियां, तीर्थयात्रा समूह में शामिल होती हैं और तीर्थयात्रा को "नानी की हज" कहते हैं।

फोटो साभार-Wikipedia

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