जब कोई ग्रह बनता है, तो वह गैस, धूल और चट्टानों के छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है। समय के साथ इन कणों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल काम करता है, जो सभी पदार्थों को केंद्र की ओर खींचता है।
इस प्रक्रिया में हर दिशा से बराबर खिंचाव होता है, जिससे वस्तु का आकार गोल यानी गोले जैसा हो जाता है। यही कारण है कि पृथ्वी सहित सभी बड़े ग्रह गोल दिखाई देते हैं।
वैज्ञानिक इस स्थिति को हाइड्रोस्टैटिक संतुलन कहते हैं। इसका मतलब है कि ग्रह के अंदर का दबाव और गुरुत्वाकर्षण बल एक संतुलन बना लेते हैं।
इस संतुलन में सबसे स्थिर और ऊर्जा की दृष्टि से सबसे उपयुक्त आकार गोला ही होता है। इसलिए प्रकृति खुद ही ग्रहों को गोल आकार दे देती है।
हर अंतरिक्ष पिंड गोल नहीं होता। छोटे एस्टेरॉइड या उल्कापिंड अक्सर अनियमित आकार के होते हैं। इसका कारण यह है कि उनका गुरुत्वाकर्षण बल इतना मजबूत नहीं होता कि वह उन्हें पूरी तरह गोल बना सके। जब कोई पिंड एक निश्चित आकार और द्रव्यमान से बड़ा हो जाता है, तभी वह गोल आकार ग्रहण करता है।
सिद्धांत रूप में चौकोर या किसी और आकार के ग्रह बनना लगभग असंभव है। ऐसा इसलिए क्योंकि गुरुत्वाकर्षण हर कोने को खींचकर समतल कर देता है। अगर कोई वस्तु चौकोर बनने की कोशिश भी करे, तो समय के साथ उसके कोने टूटकर गोल हो जाएंगे। इसलिए ब्रह्मांड में स्थायी रूप से चौकोर ग्रह का अस्तित्व संभव नहीं माना जाता।