अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ऑपरेशन के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि एयरमैन के पास एक बेहद एडवांस “बीपर जैसे” डिवाइस था, जो हमेशा उनके पास रहता है। इस डिवाइस ने संकट के समय बेहतरीन तरीके से काम किया और फंसे हुए एयरमैन की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
यह डिवाइस बोइंग कॉम्बैट सर्वाइवर इवेडर लोकेटर (CSEL) के नाम से जाना जाता है, जिसे अमेरिकी वायुसेना और नौसेना लंबे समय से इस्तेमाल कर रही हैं।
यह एक हैंडहेल्ड कम्युनिकेशन डिवाइस है, जो सुरक्षित टू-वे सैटेलाइट कम्युनिकेशन, रियल-टाइम डेटा ट्रांसफर और सटीक GPS लोकेशन प्रदान करता है।
इसकी मदद से फंसे हुए सैनिक सैटेलाइट के जरिए रेस्क्यू सेंटर को मैसेज भेज सकते हैं, जिसके बाद रेस्क्यू टीम उनसे संपर्क कर सही लोकेशन तक पहुंचती है। इस डिवाइस से भेजे गए मैसेज को ट्रैक नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन डैन केन के मुताबिक, यह रेस्क्यू ऑपरेशन 50 घंटे से ज्यादा समय तक चला। यह मिशन तब शुरू हुआ जब एयरक्राफ्ट से मिले इमरजेंसी सिग्नल की पुष्टि हुई। F-15E लड़ाकू विमान को एक मिसाइल से निशाना बनाया गया था, जिसके बाद दोनों क्रू मेंबर अलग-अलग जगहों पर फंस गए। (AI-Generated Photo)
पायलट “Dude 44 Alpha” को दिन के समय ही सुरक्षित निकाल लिया गया था। वहीं, दूसरे एयरमैन “Dude 44 Bravo” गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद लगातार खुद को बचाने की कोशिश करते रहे।
दुश्मनों से छिपे रहे। आखिरकार शनिवार रात को उन्हें भी सुरक्षित निकाल लिया गया और ऑपरेशन शुरू होने के 50 घंटे बाद दोनों एयरमैन सुरक्षित क्षेत्र में पहुंच गए।
इस पूरे ऑपरेशन में सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) की भी अहम भूमिका रही। CIA डायरेक्टर John Ratcliffe के अनुसार, एजेंसी ने इंसानी संसाधनों और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। (AI Image)
उन्होंने बताया कि यह मिशन रेगिस्तान में रेत के एक कण को ढूंढने जितना कठिन था, लेकिन आखिरकार एजेंसी ने एयरमैन की सटीक लोकेशन का पता लगा लिया।