चंद्रमा पर था लावा का समंदर, पत्थर के टूटने से खुला 4.5 अरब साल पुराना राज
Interesting Science facts Ocean of lava was on the moon: समंदर की बात होती है तो आंखों के सामने ऊफनती लहरें और अथाह पानी का चित्र आ जाता है लेकिन क्या आपने कभी लावा के समंदर के बारे में सुना है? यकीनन नहीं सुना होगा। आज हम आपको एक ऐसा रहस्य बताने वाले हैं जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। 50 साल पहले चंद्रमा से लाए गए एक पत्थर के टूटने से ऐसा 4.5 अरब साल पुराना राज खुल गया है। यह राज है चंद्रमा पर लावा का समंदर होने का।
लावा का समंदर
समंदर की बात होती है तो आंखों के सामने ऊफनती लहरें और अथाह पानी का चित्र आ जाता है लेकिन क्या आपने कभी लावा के समंदर के बारे में सुना है? यकीनन नहीं सुना होगा। आज हम आपको एक ऐसा रहस्य बताने वाले हैं जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
पत्थर से खुला राज
50 साल पहले चंद्रमा से लाए गए एक पत्थर के टूटने से ऐसा 4.5 अरब साल पुराना राज खुल गया है। यह राज है चंद्रमा पर लावा का समंदर होने का। नासा ने 50 साल बाद अपोलो मिशन का एक सील पत्थर खोला है।
1972 में लाया गया था पत्थर
1972 में नासा का अपोलो 17 मिशन में इस पत्थर को पृथ्वी पर लाया गया था लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे तब नहीं खोला। समय और सही टेक्नोलॉजी आने पर इसे खोला गया तो विज्ञान की दुनिया में तहलका मचाने वाला राज सामने आ गया।
ब्रह्मांड की टाइम मशीन
ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्लेनेटरी साइंटिस्ट जेम्स डोटिन ने कहा कि इसके परिणाम इतने चौंकाने वाले थे कि उन्हें दोबारा जांच करनी पड़ी। यह सैंपल काफी रहस्यमयी निकला। यह सिर्फ एक पत्थर नहीं बल्कि ब्रह्मांड की टाइम मशीन है और यह 4.5 अरब साल पुराने इतिहास की गवाही दे रहा है।
पत्थर में वैज्ञानिकों ने मौजूद सल्फर की जांच की
अपोलो 17 के इस सैंपल में ट्रोइलाइट नाम का एक पदार्थ मिला जोकि लोहे और सल्फर का मिश्रण होता है और अक्सर अंतरिक्ष में मिलता है। अपोलो मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने कुल 382 किलोग्राम चांद की मिट्टी और पत्थर जमा किए थे। इस पत्थर में वैज्ञानिकों ने मौजूद सल्फर की जांच की।
वैज्ञानिक भी हुए हैरान
इस सैंपल के कुछ हिस्सों में सल्फर-33 आइसोटोप मिला जोकि यह ज्वालामुखी से निकलने वाली गैस के जैसा था। इस अजीब सल्फर के पीछे वैज्ञानिकों ने जिस वजह का खुलासा किया वह हैरान करने वाली है।
चांद के पास था वायुमंडल ?
वैज्ञानिकों का मानना है कि उस समय चांद के पास अपना एक पतला वायुमंडल रहा होगा जिसे सूरज की रोशनी ने इस सल्फर को बदल दिया। इसकी एक वजह बताई गई कि जब चांद नया था तो वह बहुत गर्म था तो वहां पूरी सतह पर लावा का समंदर बहता था। जैसे-जैसे यह लावा ठंडा हुआ, सल्फर उड़ने लगा।
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