साल 1876 जयपुर के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के बेटे और होने वाले राजा, प्रिंस ऑफ वेल्स (प्रिंस अल्बर्ट एडवर्ड) भारत के दौरे पर आ रहे थे। वे जयपुर भी आने वाले थे और महाराजा सवाई राम सिंह उनके इस दौरे को यादगार बनाना चाहते थे।
महाराजा राम सिंह अपनी दूरदर्शिता और मेहमान नवाजी के लिए जाने जाते थे। उन्होंने प्रिंस के स्वागत के लिए कुछ ऐसा करने का सोचा जो दुनिया ने पहले कभी न देखा हो। उन्होंने फैसला किया कि सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि पूरे शहर को ही एक रंग में रंग दिया जाए। यह उस समय का सबसे बड़ा 'अर्बन मेकओवर' प्रोजेक्ट था।
सफेद या पीला रंग भी चुना जा सकता था, लेकिन महाराजा ने 'टेराकोटा पिंक' या 'गेरुआ गुलाबी' को चुना। इसके पीछे एक गहरा अर्थ था—भारतीय संस्कृति में गुलाबी रंग को मेहमान नवाजी और सत्कार (Hospitality) का प्रतीक माना जाता है। महाराजा प्रिंस को यह संदेश देना चाहते थे कि जयपुर उनके स्वागत में दिल खोलकर खड़ा है।
महाराजा का आदेश मिलते ही पूरे शहर में युद्ध स्तर पर काम शुरू हो गया। सैकड़ों मजदूरों और कारीगरों ने दिन-रात एक करके जयपुर के हर घर, हर दुकान और हर मुख्य इमारत को गुलाबी रंग से ढंक दिया। जब प्रिंस अल्बर्ट जयपुर पहुँचे, तो वे इस खूबसूरत एकरंगे शहर को देखकर दंग रह गए।
आज लगभग 150 साल बीत जाने के बाद भी जयपुर की वह गुलाबी चमक फीकी नहीं पड़ी है। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल यह शहर आज भी अपनी उसी 'मेहमान नवाजी' की परंपरा को निभा रहा है। हवा महल से लेकर नाहरगढ़ की पहाड़ियों तक, जयपुर का हर कोना आज भी महाराजा राम सिंह और प्रिंस ऑफ वेल्स की उस ऐतिहासिक मुलाकात की गवाही देता है।
कहा जाता है कि जयपुर की इस खूबसूरती को देखकर प्रिंस अल्बर्ट की पत्नी (प्रिंसेस एलेक्जेंड्रा) ने ही पहली बार इसे 'पिंक सिटी' कहकर पुकारा था। इसके बाद ब्रिटिश अखबारों और लेखकों ने इस नाम को इतना मशहूर किया कि पूरी दुनिया में जयपुर की पहचान ही 'पिंक सिटी' के रूप में हो गई।
प्रिंस के जाने के बाद महाराजा राम सिंह को यह गुलाबी रंग इतना पसंद आया कि उन्होंने 1877 में एक कानून बना दिया। इस कानून के तहत शहर के मुख्य हिस्सों में इमारतों को गुलाबी रंग के अलावा किसी और रंग में रंगना गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। आज भी जयपुर के पुराने शहर (वॉल सिटी) में इस परंपरा का पालन किया जाता है।