बाबर का पोता, जिसने राजगद्दी मिलने के बाद छोड़ दिया था इस्लाम?
भारत में मुगल इस्लाम धर्म के शासक के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मुगलों का सबसे बड़ा शासक, जिसकी तारीफ में कसीदे पढ़े जाते हैं, उसी ने इस्लाम धर्म से किनारा कर लिया था। इस्लाम धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लिया था। बाबर की मृत्यु के बाद उसका बेटा हुंमायूं दिल्ली की गद्दी पर बैठा था, लेकिन जब हुमायूं के बाद बाबर के पोते ने दिल्ली की गद्दी संभाली तो कुछ साल बाद उसने इस्लाम धर्म को छोड़ एक नया धर्म अपना लिया था, जिसकी स्थापना उसने खुद की थी।
किस मुगल शासक ने छोड़ा था इस्लाम धर्म?
मुगल वंश के तीसरे शासक ने इस्लाम धर्म को छोड़ दिया था। बाबर का पोता और हुमायूं का बेटा अकबर ने इस्लाम धर्म छोड़ दिया था। हालांकि कुछ इतिहासकार इसे इस्लाम धर्म छोड़ना नहीं कहते हैं। लेकिन ये भी दर्ज है कि अकबर ने एक नए धर्म की स्थापना की थी, वो उसी धर्म को मानने लगा था।
अकबर ने किस धर्म की स्थापना की थी?
मुगल बादशाह अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम के धर्म की स्थापना की थी। अकबर ने 1528 ईस्वी में दीन-ए-इलाही की स्थापना की और अपने कई मंत्रियों को इस धर्म में शामिल कराया, जिसमें बीरबल सबसे बड़े नाम थे।
अकबर ने क्यों की थी दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना
अकबर ने कई कारणों ले दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना की थी। अकबर का मूल उद्देश्य एक ऐसे विशाल और बहुधार्मिक साम्राज्य को एकजुट रखना था, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, जैन, सिख, ईसाई और पारसी सभी रहते थे। उन्हें लगता था कि किसी एक धर्म को सर्वोपरि मानने से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी। अकबर का उलेमाओं से टकराव भी एक बड़ा कारण था। उन्हें यह महसूस हुआ कि कट्टरपंथी मौलवी सत्ता और धर्म दोनों पर अनुचित प्रभाव डाल रहे हैं। 1579 में जारी महजरनामा के जरिए अकबर ने धार्मिक मामलों में अंतिम निर्णय का अधिकार अपने हाथ में ले लिया, जिससे उलेमाओं की शक्ति सीमित हो गई।
अकबर सर्वोच्च लेकिन स्वीकारता नहीं
इस नए संप्रदाय का संस्थापक होने के कारण अकबर का स्थान अपने आप सर्वोच्च हो गया। वह केवल सम्राट ही नहीं रहा, बल्कि स्वयं को पैगंबर के रूप में भी स्थापित कर बैठा। इस संप्रदाय में अबुलफ़ज़ल को खलीफ़ा का दर्जा मिला। इसके अनुयायियों में मुसलमान और हिन्दू दोनों शामिल थे, लेकिन उनकी संख्या बेहद सीमित रही। आम तौर पर अधिकांश मुसलमानों और हिन्दुओं ने इस नए मत को गंभीरता से नहीं लिया और उसकी उपेक्षा ही की।
दीन-ए-इलाही धर्म को अपनाने वालों की संख्या काफी कम
दरबार के प्रमुख लोगों में मुसलमान पक्ष से शेख मुबारक, फैजी और अबुलफ़ज़ल जैसे कुछ गिने-चुने लोगों ने इस संप्रदाय को स्वीकार किया। हिन्दुओं में केवल बीरबल ही ऐसा व्यक्ति था जिसने इसे अपनाया। अकबर के निकट संबंधी और प्रभावशाली दरबारी, जैसे राजा भगवानदास और मानसिंह, इससे पूरी तरह उदासीन रहे। यहां तक कि अकबर के अंतःपुर में किसी भी रानी या बेगम ने इस धर्म को स्वीकार नहीं किया।
अकबर की मौत और दीन-ए-इलाही धर्म खत्म
अकबर की मृत्यु के बाद दीन-ए-इलाही का नाम लेने वाला कोई नहीं बचा। 1605 में अकबर के निधन के साथ ही दीन-ए-इलाही का संरक्षण समाप्त हो गया। उसके उत्तराधिकारी जहांगीर ने इस संप्रदाय में कोई रुचि नहीं दिखाई और न ही इसे आगे बढ़ाया। चूंकि यह धर्म संस्थागत रूप से मजबूत नहीं था, इसलिए शाही संरक्षण हटते ही यह स्वतः ही निष्क्रिय हो गया।
कैसे खत्म हो गया दीन-ए-इलाही धर्म
दीन-ए-इलाही धर्म का अंत किसी एक घटना से नहीं, बल्कि कई कारणों के मेल से हुआ। सबसे बड़ा कारण यह था कि यह कोई जन-आधारित या संगठित धर्म नहीं बन सका। अकबर ने इसे 1582 में शुरू तो किया, लेकिन इसमें न तो कोई स्पष्ट धार्मिक ग्रंथ था, न नियमित पूजा-पद्धति और न ही धर्म-प्रचार की व्यवस्था। इसका प्रभाव लगभग पूरी तरह अकबर की व्यक्तिगत इच्छा, सत्ता और संरक्षण पर टिका हुआ था। अधिकांश मुसलमानों ने इसे इस्लाम के विरुद्ध माना, जबकि हिन्दू समाज ने भी इसे अलग धर्म के रूप में स्वीकार नहीं किया।
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