काजीरंगा में मिला गैंडों के अस्तित्व का 'टाइम कैप्सूल', कभी पूरे भारत में करते थे राज; जानें कैसे असम बना इनका घर

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क की दलदली मिट्टी के नीचे एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसने वैज्ञानिकों को हजारों साल पीछे जाने पर मजबूर कर दिया। हाल ही में हुए एक शोध में यह सामने आया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन और इंसानों की दखलअंदाजी ने एक सींग वाले गैंडों को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से खदेड़कर काजीरंगा के इस छोटे से हिस्से में समेट दिया।

मिट्टी के नीचे छिपा कुदरत का आर्काइव
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मिट्टी के नीचे छिपा कुदरत का 'आर्काइव'

बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वैज्ञानिकों ने काजीरंगा के सोहोला दलदल से लगभग एक मीटर लंबा मिट्टी का नमूना (Sediment Core) निकाला। यह मिट्टी किसी प्राकृतिक लाइब्रेरी की तरह काम करती है। इसकी परतों में दबे पराग कणों (Pollens) और जानवरों के गोबर पर पनपने वाले फंगल बीजाणुओं (Fungal Spores) का विश्लेषण करके वैज्ञानिकों ने पिछले 3300 सालों के पारिस्थितिक रिकॉर्ड को डिकोड किया है।

कभी पूरे भारत में राज करते थे गैंडे
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कभी पूरे भारत में राज करते थे गैंडे

जीवाश्म बताते हैं कि भारतीय एक सींग वाला गैंडा कभी केवल असम तक सीमित नहीं था। यह प्रजाति पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हुई थी। शोध से पता चला है कि उत्तर-पश्चिम भारत (वर्तमान राजस्थान और पंजाब के इलाके) से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक इनका साम्राज्य था। लेकिन समय के साथ इनके रहने के ठिकाने सिकुड़ते चले गए।

Climate Change और Little Ice Age का असर
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Climate Change और 'Little Ice Age' का असर

अध्ययन के अनुसार, होलोसीन युग (Holocene) के दौरान हुए जलवायु परिवर्तनों, विशेष रूप से 'लिटिल आइस एज' (Little Ice Age) के दौरान मौसम की मार ने गैंडों के लिए उत्तर-पश्चिम भारत में रहना मुश्किल कर दिया। जलवायु में आए इन बड़े बदलावों और बदलती वनस्पतियों ने इन विशालकाय शाकाहारी जीवों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पूरब की ओर पलायन करने पर मजबूर किया।

असम बना गैंडों का सुरक्षित ठिकाना
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असम बना गैंडों का सुरक्षित ठिकाना

जब उत्तर-पश्चिम भारत में सूखा और जलवायु संकट गहरा रहा था, तब पूर्वोत्तर भारत (असम का क्षेत्र) अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा। यहां की जलवायु और हरियाली ने गैंडों को वह माहौल दिया जिसकी उन्हें जरूरत थी। इसी स्थिरता के कारण गैंडे पूर्व की ओर बढ़ते गए और अंततः काजीरंगा को अपना अंतिम गढ़ बना लिया।

शिकार और मानवीय दबाव की दोहरी मार
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शिकार और मानवीय दबाव की दोहरी मार

​केवल मौसम ही नहीं, बल्कि बढ़ती इंसानी आबादी भी गैंडों की दुश्मन बनी। उत्तर-पश्चिम भारत में बढ़ते शिकार और प्राकृतिक आवासों के विनाश ने इन जीवों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया। पूर्वोत्तर भारत में उस समय मानवीय दबाव कम था, जिससे यह क्षेत्र इन लुप्तप्राय जीवों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया।

वनस्पतियों के बदलाव ने बदली तस्वीर
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वनस्पतियों के बदलाव ने बदली तस्वीर

वैज्ञानिकों ने पाया कि काजीरंगा का वर्तमान स्वरूप वैसा नहीं है जैसा यह हजारों साल पहले था। पेड़-पौधों में आए बदलावों और बाहरी प्रजातियों के आक्रमण ने यहां के पारिस्थितिकी तंत्र को समय-समय पर बदला है। जानवरों की गतिविधियों और शाकाहारी जीवों की उपस्थिति ने भी यहां के जंगलों और घास के मैदानों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भविष्य के संरक्षण के लिए बड़ा सबक
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भविष्य के संरक्षण के लिए बड़ा सबक

यह रिसर्च केवल अतीत की जानकारी नहीं देता, बल्कि भविष्य के संरक्षण प्रयासों के लिए एक ब्लूप्रिंट भी है। जलवायु परिवर्तन के मौजूदा दौर में यह समझना जरूरी है कि कैसे तापमान और वनस्पति में बदलाव वन्यजीवों के प्रवास और विलुप्ति को प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह डेटा काजीरंगा के गैंडों को भविष्य के संकटों से बचाने में मददगार साबित होगा।

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