US Bonds बेचकर क्या खरीद रहे हैं भारत-चीन और बाकी देश?नाम जानकर चौंक जाएंगे!

वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) में इन दिनों एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया के शक्तिशाली देश, विशेष रूप से भारत और चीन, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स (US Bonds) से अपना हाथ खींच रहे हैं। सालों तक अमेरिकी डॉलर और उसके बॉन्ड्स को सबसे सुरक्षित निवेश मानने वाले ये देश अब अपनी रणनीति बदल रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ये देश डॉलर के मोहजाल से निकलकर एक ऐसी पुरानी और भरोसेमंद संपत्ति की ओर लौट रहे हैं, जिसने सदियों से अपनी चमक बरकरार रखी है और वह है 'सोना' (Gold)।

Authored by: Updated Jan 30 2026, 08:37 IST
​भारी मात्रा में बेचे जा रहे हैं अमेरिकी बॉन्ड्स Image Credit : Canva01 / 08

​भारी मात्रा में बेचे जा रहे हैं अमेरिकी बॉन्ड्स

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच विभिन्न देशों ने बड़े स्तर पर अमेरिकी बॉन्ड्स बेचे हैं। भारत ने ₹4.36 लाख करोड़ के बॉन्ड्स बेचे हैं, जबकि चीन ने रिकॉर्ड ₹7.91 लाख करोड़ की बिकवाली की है। ब्राजील, हॉन्ग-कॉन्ग और आयरलैंड जैसे देश भी इसी राह पर चल रहे हैं।

​डॉलर के बजाय सोने पर बढ़ा भरोसा Image Credit : Canva02 / 08

​डॉलर के बजाय सोने पर बढ़ा भरोसा

अमेरिकी बॉन्ड्स बेचने के बाद जो पैसा मिल रहा है, उसका उपयोग ये देश सोना खरीदने में कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 1.26 लाख किलोग्राम सोना खरीदा है, वहीं चीन ने 3.55 लाख किलोग्राम की भारी-भरकम खरीदारी की है। यह दिखाता है कि अब केंद्रीय बैंकों के लिए डॉलर से ज्यादा कीमती सोना हो गया है।

​विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ी​Image Credit : Canva03 / 08

​विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ी​

सिर्फ सोना खरीदना ही बड़ी बात नहीं है, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) में इसकी हिस्सेदारी बढ़ाना एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है। भारत के भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 8.8 लाख किलोग्राम (लगभग 880 टन) हो गई है, जबकि चीन के पास यह आंकड़ा 19.48 लाख किलोग्राम तक पहुंच गया है।

​क्यों गिर रही है डॉलर की अहमियत?​Image Credit : Canva04 / 08

​क्यों गिर रही है डॉलर की अहमियत?​

एक समय था जब पूरी दुनिया के व्यापार पर डॉलर का एकछत्र राज था, लेकिन अब 'डी-डॉलराइजेशन' (De-dollarization) की लहर चल पड़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह अमेरिका ने डॉलर को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और प्रतिबंध लगाए, उससे कई देश सतर्क हो गए हैं। उन्हें डर है कि भविष्य में उनके विदेशी निवेश पर भी संकट आ सकता है।

​सोने की बढ़ती कीमतें और डॉलर की चुनौती​Image Credit : Canva05 / 08

​सोने की बढ़ती कीमतें और डॉलर की चुनौती​

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोने की बढ़ती कीमतें डॉलर की अहमियत को कम कर देंगी। जैसा कि फोटो में भी जिक्र है, "डॉलर को सोना पटखनी देने वाला है।" जब सोने की मांग बढ़ती है और डॉलर की सप्लाई कम होती है, तो डॉलर की वैश्विक साख (Dominance) पर सीधा असर पड़ता है।

सुरक्षित भविष्य की तैयारी Image Credit : Canva06 / 08

सुरक्षित भविष्य की तैयारी

सोने को 'सेफ हेवन' (Safe Haven) माना जाता है। युद्ध, महामारी या आर्थिक मंदी के समय जब कागजी मुद्रा (Currency) की वैल्यू गिरने लगती है, तब सोना ही वह संपत्ति है जो देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाती है। भारत और चीन जैसे देश अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने के लिए यह 'गोल्ड कवच' तैयार कर रहे हैं।

​चीन की आक्रामक रणनीति​Image Credit : Canva07 / 08

​चीन की आक्रामक रणनीति​

चीन दुनिया में सबसे ज्यादा अमेरिकी बॉन्ड्स रखने वाले देशों में से एक रहा है, लेकिन अब वह सबसे तेजी से इनसे किनारा कर रहा है। चीन अपनी निर्भरता अमेरिका से पूरी तरह खत्म करना चाहता है। वह न केवल सोना खरीद रहा है, बल्कि अन्य देशों के साथ अपनी स्थानीय मुद्रा (Yuan) में व्यापार को भी बढ़ावा दे रहा है।

​भारत का संतुलित दृष्टिकोण​Image Credit : Canva08 / 08

​भारत का संतुलित दृष्टिकोण​

भारत अपनी अर्थव्यवस्था को लचीला बनाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता ला रहा है। बॉन्ड्स बेचकर सोना खरीदना इस रणनीति का हिस्सा है कि अगर कभी वैश्विक स्तर पर डॉलर का संकट आए, तो भारत के पास पर्याप्त मात्रा में सोना हो ताकि देश की क्रय शक्ति और साख पर आंच न आए।

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