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गुजरात के बजट कवर पर क्यों दिखीं आदिवासियों की देवी, कैसे जंगल से निकल जर्मनी तक पहुंची ये कला

कंसारी देवी के महत्व पर गुजरात सरकार का कहना है कि इन्हें वारली समुदाय में अन्नपूर्णा माता के समान माना जाता है। उनकी पूजा से समृद्धि, धन और सुख प्राप्त होता है। कंसारी आदिवासियों के लिए समृद्धि की मूल देवी हैं और लोग उनके आशीर्वाद से सुख-समृद्धि और सफलता प्राप्त करते हैं।

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वारली पेंटिंग का सफर: बीहड़ से बजट तक
Authored by: Suneet Singh
Updated Feb 19, 2026, 14:58 IST

Warli Paintings: बुधवार 18 फरवरी को गुजरात सरकार का बजट पेश हुआ। यह बजट कई मायनों में चर्चा में रहा। आर्थिक प्रावधानों से हटकर जिस चीज ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी, वह थी राज्य की बजट बुकलेट। बजट बुकलेट के कवर पर सैकड़ों साल पुरानी एक कलाकृति दिखी। यह कलाकृति लोगों के लिए उत्सुकता का कारण बनी। आइए जानते हैं आखिर किसकी है ये कलाकृति और क्यों गुजरात सरकार की बजट बुकलेट पर मिली इसे जगह।

गुजरात सरकार की बजट बुकलेट पर क्या बना था?

गुजरात सरकार के बजट बुकलेट के कवर पर पारंपरिक चित्रकारी शैली में आदिवासी देवी कंसारी की तस्वीर बनी थी। इस तस्वीर को बनाया था मशहूर गुजराती कलाकार बीना हसमुख पटेल ने। कंसारी देवी गुजरात के आदिवासी समुदाय में बेहद पूजनीय हैं। शादी ब्याह हो या फिर फसल की कटाई, किसी भी शुभ काम में वहां का आदिवासी समुदाय कंसारी देवी की आराधना करता है।

Kansari Devi Warli Painting

Kansari Devi Warli Painting

कौन हैं कंसारी देवी

गुजरात के वलसाड क्षेत्र में वारली जनजाति रहती है। आदिवासियों की यह प्रजाति महाराष्ट्र के ठाणे जिले के आसपास भी रहती हैं। इस आदिवासी की कुलदेवी हैं कंसारी देवी। जब भी किसी के घर में शादी होती है, खेत से नई फसल कटती है या कोई भी शुभ अवसर होता है तो कंसरी देवी को स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है। आदिवासी समुदाय देवी कंसारी को समृद्धि की देवी के रूप में पूजते हैं। सिर्फ वारली जनजाति ही नहीं पूरा गुजरात कंसारी देवी को सुख, समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक मानता है।

कंसारी देवी के महत्व पर गुजरात सरकार का कहना है कि इन्हें वारली समुदाय में अन्नपूर्णा माता के समान माना जाता है। उनकी पूजा से समृद्धि, धन और सुख प्राप्त होता है। कंसारी आदिवासियों के लिए समृद्धि की मूल देवी हैं और लोग उनके आशीर्वाद से सुख-समृद्धि और सफलता प्राप्त करते हैं।

Kansari Devi Warli Painting (1)

Kansari Devi Warli Painting (1)

वारली पेंटिंग की जनक है ये जनजाति

बजट के कवर पर कंसारी देवी का चित्र जिस शैली में छपा है उसके वारली चित्रकला कहते हैं। वारली जनजाति की यह खास चित्रकारी दुनियाभर में मशहूर है। इन पेंटिंग्स की सबसे बड़ी खासियत इनकी सादगी और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। आदिवासियों के हाथों के हुनर से निकली इस चित्रकला को साल 2014 में GI Tag भी मिल चुका है।

क्या है वारली पेंटिंग

वारली कला लगभग 1,200 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इस कला की खास पहचान इसकी सफेद रंग की आकृतियां हैं, जिन्हें चावल के आटे और पानी के घोल से बनाया जाता है। परंपरागत रूप से ये चित्र दीवारों पर महिलाओं द्वारा बनाए जाते थे।

Kansari Devi Warli Painting (5)

Kansari Devi Warli Painting (5)

इन चित्रों में आमतौर पर रोजमर्रा का जीवन, सामुदायिक उत्सव, खेती-किसानी के काम, धार्मिक अनुष्ठान और प्रकृति के दृश्य दिखाए जाते हैं। नाचते हुए लोग, पानी भरती महिलाएं, पशुपालक, घरेलू कामकाज और पूजा-त्योहार के दृश्य इसमें प्रमुख रूप से नजर आते हैं। जंगली जानवर, पक्षी, कीट-पतंगे और नागदेव, पंचोरा देव, इंद्र देव, वाघ देव और कंसारी देवी जैसे देवताओं को भी चित्रों में प्रमुखता से स्थान दिया जाता है।

इस तरह की चित्रकारी में रंग भरने के लिए सफेद चावल के पेस्ट के अलावा, दूसरे प्राकृतिक रंगों जैसे सिंदूर, शहद और कोयले का भी उपयोग किया जाता है।

वारली चित्रकारी में साधारण ज्यामितीय आकारों (जियोमेट्रिकल शेप) का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे वृत्त (सर्किल), त्रिभुज (ट्राएंगल) और वर्ग (स्क्वायर)। इस पेंटिंग में जितनी भी आकृतियां बनाई जाती हैं, उन सबका खास मतलब होता है। हर आकार प्रकृति के किसी न किसी तत्व को दर्शाता है। जैसे वृत्त सूरज और चांद का प्रतीक होता है, जबकि त्रिभुज पहाड़ों और नुकीले पेड़ों को दिखाता है। इस तरह ये चित्र सरल आकृतियों और सीमित रंगों के जरिए प्रकृति और जीवन से जुड़ी बातों को दर्शाते हैं।

Kansari Devi Warli Painting (3)

Kansari Devi Warli Painting (3)

आज भी वारली आदिवासी समुदाय की महिलाएं त्योहार, विवाह, सगाई, फसल कटाई या फिर बच्चे के जन्म जैसे शुभ अवसरों पर ऐसी कलाकृतियां बनाती हैं। ये कलाकृतियां सफेद रंग से घरों की दीवारों पर बनाई जाती थी। इन कलाकृतियों में वह अपनी रोज की जिंदगी और उसकी रवानगी को चित्र का आकार देती हैं।

जंगल से जर्मनी तक का सफर

आदिवासियों की यह चित्रकारी गुजरात की लोक कला की अनूठी विरासत है। वहां के कई कलाकारों और स्वयंसेवी संस्थानों ने पेंटिंग की इस अद्भुत शैली को हमेशा जिंदा रखा। सरकार ने भी हर कोशिश की कि ऐसी शानदार कला कभी वेंटिलेटर पर ना जाए। गुजरात के लोगों और लोक कला को संजोने की जिद का ही नतीजा था कि साल 2014 में इसे जीआई टैग मिला।

Kansari Devi Warli Painting (2)

Kansari Devi Warli Painting (2)

जीआई टैग मिलने के बाद तो जंगलों से निकली ये चित्रकला ने अपने पंख दुनिया भर में फैला लिये। सात समुंदर पार भी इन कलाकृतियों के मुरीद पाए जाने लगे। मुमकिन है कि आपको जंगलों से निकली इस कलाकारी का कोऊ नमूना जर्मनी के किसी आलीशान घर के ड्रॉइंग रूम की शोभा बढ़ाती भी दिख जाए।

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