मणिकर्णिका घाट: ऐसा महाश्मशान जहां नहीं बुझती चिता की आग, मरने वाले से भी पूछते हैं खास सवाल
Manikarnika Ghat Story and History: मोक्ष की चाह में सैकड़ों सालों से लोग इसी मणिकर्णिका घाट पर देह त्यागते रहे हैं। जिन लोगों को ये पता चल जाता था कि अब उनकी मृत्यु निकट है तो वह खुद काशी आकर इस घाट पर अपने प्राण त्याग देते थे। नदी में कूदकर, खाना पीना छोड़कर, पेड़ से लटक कर, यहां तक कि खुद को आरी से चिरवा कर भी लोग अपनी जान दे देते।
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 22, 2026, 10:03 AM IST
Manikarnika Ghat Demolition: वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चल रहे सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास कार्य को लेकर बहुत से लोग नाराज हैं। राजनीतिक दल भी इसे मुद्दा बना रहे हैं। नाराज लोगों का मानना है कि काशी के पंचतीर्थों में सबसे श्रेष्ठ माने जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर तोड़फोड़ उनकी आस्था को चोट पहुंचाने वाली है। इन सबसे इतर मणिकर्णिका घाट सदियों से मोक्ष, आस्था, विश्वास और जीवन-मृत्यु चक्र का प्रतीक बना हुआ है। आखिर क्यों इतना खास है काशी का यह घाट? मणिकर्णिका घाट पर क्यों नहीं बुझती चिता की आग?
गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- जनम मरन सब दु:ख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥ काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥
इस चौपाई का भावार्थ है कि जिसका जन्म हुआ है उसका अंत होना निश्चित है। लेकिन, अंत के बाद एक नई यात्रा का आरंभ होता है। जीवन मरण के इसी चक्र को दर्शाता है मणिकर्णिका घाट। कहते हैं यहां जिसका दाह संस्कार किया जाता है वह जीवन मरण के चक्र से मुक्ति पा जाता है। वेद पुराणों में इसी मुक्ति को मोक्ष कहा गया है।
महाश्मशान कैसे बना मणिकर्णिका (Photo: iStock)
महाश्मशान कैसे बना मणिकर्णिका
मोक्ष की चाह में सैकड़ों सालों से लोग इसी मणिकर्णिका घाट पर देह त्यागते रहे हैं। जिन लोगों को ये पता चल जाता था कि अब उनकी मृत्यु निकट है तो वह खुद काशी आकर इस घाट पर अपने प्राण त्याग देते थे। नदी में कूदकर, खाना पीना छोड़कर, पेड़ से लटक कर, यहां तक कि खुद को आरी से चिरवा कर भी लोग अपनी जान दे देते। उनकी नजरों में यह आत्महत्या नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग था। उनका विश्वास था कि काशी में मृत्यु, मणिकर्णिका पर दाह संस्कार और गंगा में अस्थियों का विसर्जन जन्म मरण के बंधन से मुक्ति दिला देता है और आत्मा सीधे मोक्ष या स्वर्ग को प्राप्त होती है।
मोक्ष के लिए काशी आकर खुद को खत्म कर लेने की इस परंपरा को काशी करवत कहा जाता था। करवत का जिक्र भक्ति काल के कई संतों की रचनाओं में भी है। कबीर से लेकर मीरा बाई और संत रविदास से लेकर सूफी संत रज्जब तक, सबने शरीर त्यागकर आत्मा की शुद्धि के लिए काशी करवत करने की परंपरा को दर्ज किया है। सूरदास का एक ऐसा ही दोहा है - सूरदास प्रभु तुम्हारे दर्शन बिन, लेहो करवट कासी। इस दोहे का भावार्थ है कि यदि प्रभु कृष्ण दर्शन नहीं देंगे, तो वे काशी करवत (काशी में आत्महत्या) कर लेंगे।
काशी की प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo: AI Image)
इस करवत का ही नतीजा था कि मणिकर्णिका घाट पर शवों के अंतिम संस्कार की भीड़ बढ़ने लगी। रोज दर्जनों चिताएं जलतीं। अंतिम संस्कार के लिए बड़ी संख्या में शव घाट पर पहुंचने लगे। इस तरह से तरह से महाश्मशान बन गया मणिकर्णिका घाट।
हालांकि मोक्ष पाने के इस विश्वास पर संत कबीर ने प्रश्न उठाए थे। उनका प्रसिद्ध दोहा है - जो कबीर काशी में मरिहें, रामहिं कौन निहोरा? कबीर यहां काशी करवत की धारणा को चुनौती देते हैं। कबीर दोहे के जरिए पूछते हैं कि यदि केवल काशी में मरने से ही स्वर्ग मिल जाता है, तो फिर ईश्वर, कर्म और जीवन के नैतिक मूल्य का क्या महत्व रह जाता है?
काशी पंचतीर्थ में सर्वश्रेष्ठ है मणिकर्णिका
कब और कैसे बना मणिकर्णिका घाट
मणिकर्णिका श्मशान घाट की प्राचीनता उतनी ही मानी जाती है, जितनी यह आस्था कि काशी में बाबा विश्वनाथ के रूप में भगवान शिव सदा विराजमान रहते हैं। कैलास के बाद काशी को शिव का दूसरा धाम कहा गया है और पुराणों में इसे स्वयं शिव की नगरी बताया गया है।
मणिकर्णिका घाट से जुड़ीं कई पौराणिक मान्यताएं हैं। स्कंदपुराण में काशी खंड में वर्णित है कि काशी में भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सुन्दर सा तालाब खोदा और उसे अपने पसीने से भर दिया। उसी तालाब के पास बैठकर वह भगवान शिव की तपस्या करने लगे।
शिव प्रसन्न हुए और विष्णु से बोले वर मांगो। विष्णु जी ने कहा कि आप और देवी पार्वती सौम्य रूप में मुझे दर्शन दें। ऐसा ही हुआ भी। इसी दौरान भगवान शंकर के कान की मणि से जड़ी कुंडली वहीं कहीं गिर गई। तब भगवान ने कहा यहां मेरी मणिकर्णिका गिर गई है। यह कुंड मणिकर्णिका कहलाएगा। कुंड के पास बने घाट मणिकर्णिका घाट कहलाए।
मणिकर्णिका घाट वाराणसी (Photo: iStock)
मणिकर्णिका घाट पर क्यों नहीं बुझती चिता की आग
आप चाहें जब भी मणिकर्णिका घाट पर चले जाएं, वहां चिताएं जलती ही नजर आएंगी। लोगों को विश्वास हो गया है कि मणिकर्णिका घाट पर चिता की आग कभी नहीं बुझती। पौराणिक मान्यता है कि देवी पार्वती के श्राप के कारण ऐसा होता है।
दरअसल पौराणिक कथा है कि मणिकर्णिका घाट पर देवी पार्वती के कानों का कुंडल गिर गया। वह काफी देर तक उसे वहां ढूंढ़ती रहीं। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जब वह थक गईं तो उन्होंने क्रोध में कह दिया कि यह घाट हमेशा जलता रहेगा। लोगों का मानना है कि देवी पार्वती के इसी श्राप के कारण मणिकर्णिका घाट पर चिताएं लगातार जलती रहती हैं।
मणिकर्णिका पर नहीं बुझती चिता की आग (Photo: IStock)
मणिकर्णिका घाट के रहस्य
मणिकर्णिका घाट अपने अंदर कई रहस्य छिपाए हुए है। अंतिम संस्कार के दौरान वहां कई तरह के कर्म ऐसे किये जाते हैं जिसका रहस्य लोगों में उत्सुकता पैदा करते हैं:
चिता पर 94 लिखने का रहस्य
जब मणिकर्णिका घाट पर किसी की अंतिम संस्कार कर दिया जाता है तो जब उसकी राख ठंडी होने लगती है उस समय राख पर 94 अंक लिख दिया जाता है। दरअसल हिंदी आस्था के मुताबिक इंसान के 100 गुण होते हैं। इसमें से 6 गुण भगवान ब्रह्मा के हाथ में होते हैं और बाकि 94 इंसान के। ये 94 गुण इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों पर निर्भर करते हैं। मान्यता है कि मनुष्य अपने 94 प्रकार के कर्म से मुक्ति पा सके इसलिए अंतिम संस्कार के दौरान 94 लिख दिया जाता।
मइकर्णिका घाट के रहस्य (Photo: iStock)
मृत व्यक्ति से कान में क्या पूछा जाता है ?
मणिकर्णिका घाट पर जब किसी का अंतिम संस्कार होता है तो संस्कार कराने वाले पंडा मृत व्यक्ति के कान में कुछ बोलता है। आखिर वह कान में क्या कहता है और इसके पीछे क्या रहस्य है। यह भी पौराणिक आस्था से जुड़ी है।
एक कथा के अनुसार एक बार देवी पार्वती ने शिव जी के कान की बाली मणिकर्णिका घाट पर कहीं छिपा दी। फिर भगवान शंकर को उसे ढूंढ़ने को कहा। लेकिन भोले नाथ अपने कानों का बाली ढूंढ़ नहीं पाए। इसी कथा पर विश्वास करते हुए जिस भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया जाता है उसके कान में एक बार पूछा जाता है कि क्या उसने भगवान शिव की बाली देखी है।
मरने वाले से भी सवाल पूछती है मणिकर्णिका (Photo: Istock)
मणकिर्णिका पर क्यों हो रहा विवाद
18वीं शताब्दी में काशी पर मराठों और पेशवाओं की बहुत कृपा थी। उन्होंने ही काशी में मंदिरों और घाटों का निर्माण कराया। मणिकर्णिका कुंड का पक्का पुनर्निमाण 1730 में पेशवा बाजीराव के सहयोग से सदाशिव नाइक ने कराया। मणिकर्णिका कुंड में डुबकी के बाद गंगास्नान किया जाता है। यहां महिलाएं भी आती हैं।
मणिकर्णिका पर विवाद (Photo: iStock)
अहिल्याबाई होलकर ने दाईं तरफ तारकेश्वर महादेव मंदिर के पीछे महिलाओं के लिए खास घाट बनवाया था। आज इसे जनाना घाट कहा जाता है। वहीं घाट पर अहिल्या बाई होल्कर की प्रतिमा लगी थी। सौंदर्यीकरण के लिए उस मूर्ति को फिलहाल वहां से हटाया गया है। इसी को लेकर विवाद और राजनीति बढ़ गई है
