खिचड़ी: कभी प्रसाद तो कभी दवाई, मुगलों को भी खूब भाई, जानें भारतीयों की थाली में कैसे आई
Khichdi: खिचड़ी के चार यार घी, दही, पापड़-अचार या फिर माघ महीना खिच्चड़ खाय- भारतीय घरों में खिचड़ी का जिक्र कुछ इसी तरीके से होता है। खिचड़ी हम भारतीयों की रसोई का ऐसा व्यंजन है जो साधारण होते हुए भी असाधारण महत्व रखती है। यही कारण है कि यह कभी बीमार के लिए सबसे सही भोजन बन जाती है तो कभी मकर संक्रांति जैसे पर्व पर समाज का उत्सव भोजन।
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 14, 2026, 01:07 PM IST
देशभर में मकर संक्रांति की धूम है। नए साल की शुरुआत के बाद पहला त्योहार मकर संक्रांति का होता है। यह त्योहार अपने साथ ढेर सारी खुशियां, उत्साह और उमंग लेकर आता है। इस दिन देश के कुछ हिस्सों में दही चूड़ा खाने का चलन है तो कुछ जगह खिचड़ी खाई जाती है। मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस दिन खिचड़ी खाने का विशेष महत्व है।
खिचड़ी की सबसे खास बात ये है कि यह अमीर से गरीब, बच्चे से बुजुर्ग और सेहतमंद से बीमार तक, हर किसी की थाली में नजर आती है। यह खिचड़ी ही है जो किसी बच्चे का पहला आहार होती है तो किसी बीमार का आखिरी निवाला भी कई बार खिचड़ी ही होती है। कई मंदिरों और भंडारों में तो खिचड़ी को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है। शायद इसी कारण खिचड़ी को भारत का राष्ट्रीय भोजन कहा जाता है।
महाभारत काल से है खिचड़ी
खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के खिच्चा से माना जाता है। खिच्चा का अर्थ होता है चावल और दाल को मिलाकर पकाया गया भोजन। खिचड़ी का जिक्र महाभारत में भी हुआ है। महाकाव्य महाभारत में यह प्रसंग मिलता है कि वनवास के दौरान द्रौपदी ने पांडवों के लिए खिचड़ी बनाई थी। इसी खिचड़ी के एक दाने से भगवान कृष्ण ने ऋषि दुर्वासा की भूख शांत की थी।
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कृष्ण और सुदामा के प्रसंग में भी खिचड़ी का जिक्र है। जब सुदामा अपने बचपन के दोस्त कृष्ण से मिलने द्वारका जा रहे थे तब वह अपने साथ एक पोटली में खिचड़ी और दूसरी में भुने चने लेकर निकले। खिचड़ी की पोटली रास्ते में बंदर खा गए। बाकी बचे चनों के साथ सुदामा कृष्ण से मिले थे।
इतिहास के पन्नों में खिचड़ी
सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने 305-303 ईसा पूर्व में भारत में खाई जाने वाली दाल-चावल से बनी डिश का जिक्र किया था। 14वीं सदी में मोरक्को के मशहूर घुमंतू इब्नबतूता ने भी 'किशरी' नाम के एक भारतीय व्यंजन का जिक्र किया था। उन्होंने किशरी को चावल और मूंग की दाल को उबालकर और फिर मक्खन डालकर खाया जाने वाला व्यंजन बताया था।
15वीं सदी में रूसी यात्री अफानासी निकितिन ने भी खिचड़ी का जिक्र किया। ये प्रमाण बताते हैं कि खिचड़ी प्राचीन काल से ही भारतीय व्यंजनों में काफी लोकप्रिय थी।
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खिचड़ी से मुगलों को थी मोहब्बत
मुगल काल में खिचड़ी ने शाही दर्जा पाया। उस दौर में यह व्यंजन शाही रसोई में काफी लोकप्रिय थी। अकबर की जीवनी लिखने वाले अबुल फजल की मानें तो अकबर को खिचड़ी बेहद पसंद थी। उनके लिए रसोइयो 7 तरह की शाही खिचड़ी बनाया करते थे।
पीढ़ी दर पीढ़ी मुगल सल्तनत पर शहंशाह बदले लेकिन खिचड़ी को लेकर उनकी पसंद बरकरार ही। जहांगीर पिस्ता-किशमिश वाली खिचड़ी खाते थे जिसे 'लज़ीज़ान' कहा जाता था। वहीं औरंगजेब को मछली-अंडे वाली 'आलमगीरी खिचड़ी' पसंद थी।
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अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को खिचड़ी इतनी पसंद थी कि उसे 'बादशाह पसंद' के नाम से जाना जाने लगा। बहादुर शाह मूंग-की-दाल की खिचड़ी खाया करते थे। मुगलों के जाने के बाद नवाबों के दौर में भी खिचड़ी खूब खाई और खिलाई गई।
जब क्वीन विक्टोरिया ने चखी खिचड़ी
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इंग्लैंड की महारानी क्वीन विक्टोरिया को भी खिचड़ी काफी पसंद थी। उन्हें खिचड़ी से सबसे पहली रूबरू कराया था उनके उर्दू टीचर मुंशी अब्दुल करीम ने। क्वीन मसूर के दाल वाली खिचड़ी खाती थीं।
भारत में ब्रिटिश राज के दौरान यहां की खिचड़ी की रेसिपी इंगलैंड तक पहुंची। वहां खिचड़ी से मिलती जुलती ही डिश खूब पॉपुलर हुई जिसका नाम केडगिरी रखा गया था। इसे स्मोक्ड हैडॉक, चावल, अंडे और करी पाउडर मिला कर बनाया जाता था।
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जैसे लोग वैसी खिचड़ी
भारतीयों के लिए खिचड़ी यहां की सांस्कृतिक विविधता का भी प्रतीक है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग तरह से और अलग मौकों पर बनाया जाता है। यूपी-बिहार में ज्यादातर मूंग के दाल वाली खिचड़ी बनती है तो वहीं दक्षिण भारत में आपको नारियल के तड़के वाली खिचड़ी मिल जाएगी। गुजरात में खिचड़ी कढ़ी के साथ खाई जाती है तो हैदराबाद की खिचड़ी में कीमा और मछली दिख जाएगी। भारत में व्रत के दौरान लोग साबूदाने की खिचड़ी भी खूब खाते हैं।
प्रसाद भी है खिचड़ी
बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान खिचड़ी जिसे ‘खिचुरी’ कहा जाता है, प्रसाद के तौर पर बांटी जाती है। ओडिशा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में जगन्नाथ जी को तमाम 56 भोग परोसे जाते हैं, लेकिन इन कई व्यंजनों के बीच खेचुड़ी थाल सबसे खास होती है। ये खेचुड़ी थाल और कुछ नहीं उरद और मूंग के दाल में चावलों के साथ पकी हुई खिचड़ी होती है। देश के और भी तमाम मंदिरों में खिचड़ी प्रसाद के तौर पर बांटी जाती है। कई अवसरों पर खिचड़ी का भंडारा भी होता है।
खिचड़ी (Photo: iStock)
संस्कृति, स्वास्थ्य और परंपरा का स्वादिष्ट संगम है खिचड़ी
खिचड़ी के चार यार घी, दही, पापड़-अचार या फिर माघ महीना खिच्चड़ खाय- भारतीय घरों में खिचड़ी का जिक्र कुछ इसी तरीके से होता है। खिचड़ी हम भारतीयों की रसोई का ऐसा व्यंजन है जो साधारण होते हुए भी असाधारण महत्व रखती है। यही कारण है कि यह कभी बीमार के लिए सबसे सही भोजन बन जाती है तो कभी मकर संक्रांति जैसे पर्व पर समाज का उत्सव भोजन।
खिचड़ी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह हर उम्र और हर स्थिति के अनुकूल है। बच्चे हों, बुजुर्ग हों या व्यस्त दिनचर्या में थका हुआ शरीर, खिचड़ी सबको स्वीकार है। शायद इसी कारण आज दुनिया के तमाम देशों में खिचड़ी ने हेल्दी फूड के तौर पर अपनी पहचान बना ली है।
