आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अनोखा संगम है मुरीर मेला, मुरमुरे खाने जुटते हैं लोग
‘मुरी’ यानी मुरमुरा। यूपी, बिहार समेत दूसरे कुछ राज्यों में इसे मूढ़ी या लैय्या भी बोलते हैं। बंगालियों के लिए यह मुरी बहुत खास है। यह उनके पूजा, व्रत और लोक परंपरा का अहम हिस्सा है। इसी मुरी पर खास मेला लगता है जिसे मुरीर मेला कहते हैं।
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 22, 2026, 04:42 PM IST
Murir Mela: पश्चिम बंगाल सांस्कृतिक रूप से भारत का अहम राज्य है। आमतौर पर लोग दुर्गा पूजा, रवींद्र संगीत या रसगुल्ले को बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के तौर पर देखते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। यहां के लोकजीवन में रची बसी ऐसी कई और परंपराएं हैं, जो सदियों से आस्था, समाज और संस्कृति को जोड़ते आ रहे हैं। इन्हीं में से एक है बंगाल का मशहूर मुरीर मेला (Murir Mela)। यह मेला धार्मिक आस्था का प्रतीक होने के साथ ही ग्रामीण जीवन, लोककला और सामूहिक सहभागिता का जीता जागता उदाहरण भी है।
क्या है मुरीर मेला?
‘मुरी’ यानी मुरमुरा। यूपी, बिहार समेत दूसरे कुछ राज्यों में इसे मूढ़ी या लैय्या भी बोलते हैं। बंगालियों के लिए यह मुरी बहुत खास है। यह उनके पूजा, व्रत और लोक परंपरा का अहम हिस्सा है। इसी मुरी पर खास मेला लगता है जिसे मुरीर मेला कहते हैं। यह मेला दक्षिण बंगाल के बांकुड़ा जिले के केंजाकुड़ा में लगता है। यहां दूर दराज से लोग आते हैं। अपने साथ मुरी भी लेकर आते हैं। मेला क्षेत्र में इकट्ठा होकर लोग मुरी खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। यहां मुरी यानी मुरमुरे को प्रसाद और भेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक यह मेला हर साल माघ माह की पहली तारीख से चौथे दिन तक लगता है।
बंगाल का मशहूर मुरीर मेला
क्यों लगता है मुरीर मेला
जानकार बताते हैं कि इस मुरीर मेले का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। पश्चिम बंगाल के पारंपरिक लोकगीतों में भी इस मेले का जिक्र मिलता है। लोगों का मानना है कि पिछले करीब दो सौ सालों से जंगल से घिरे केंजाकुड़ा में द्वारकेश्वर नदी के किनारे संजीवनी माता का आश्रम है। हमेशा से यहां माघ महीने की पहली तारीख को संकीर्तन शुरू और चतुर्थी को खत्म होता। कीर्तन देर शाम तक चलता। कई बार ऐसा होता कि अंधेरा होने के बाद लोगों को आश्रम के पास जंगल में ही रात बितानी पड़ जाती।
रात में वहीं रुकने की संभावना को देखते हुए लोग अपने साथ मुरी लेकर जाने लगे। मकसद ये था कि अगर रात में वहीं रुकना पड़ा तो खाने के काम आएगा। धीरे-धीरे इसका चलन बढ़ गया। लोग अपने साथ मुरी लेकर जाते, रात में रुकने की स्थिति में वहीं सब एक साथ इकट्ठा होते और मुरी खाते। यही परंपरा मुरीर मेले की नींव है।
सामाजिक सहभागिता का पर्व है मुरीर मेला (Photo: AI Image)
आज भी हर साल माघ मेले की चतुर्थी तिथि को केंजाकुड़ा में द्वारकेश्वर नदी के किनारे मुरीर मेला लगता है। सर्दियों के बावजूद मेले में दिनभर हजारों लोग अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ नदी के किनारे इकट्ठा होते हैं और मुरी खाते हैं। यहां मुरी का आनंद खीरे, गाजर, प्याज और मिर्च के साथ नींबू का रस मिलाकर भी लिया जाता है। मुरी के साथ खाने पीने की दूसरी चीजें भी वहां बिकती हैं।
मेले का भगवान विष्णु से कनेक्शन!
बांकुड़ा के लोगों के बीच पौराणिक मान्यता है कि एक बार भगवान इंद्र को स्वर्ग में धरती लोक से किसी तरह की गर्जना सुनाई दी। उन्होंने वरुण देव से पूछा कि क्या धरती पर कोई तूफान आया है। वरुण देव ने मना किया। तब विष्णु जी ने नारद मुनि से गर्जना का कारण पता करने को कहा। धरती लोक का चक्कर काटने पर नारद मुनि को पता चला कि बांकुड़ा जिले में द्वारकेश्वर नदी के किनारे बड़ी संख्या के लोग मुरी खा रहे थे जिससे यह गर्जना हुई। लोगों का मानना है कि मुरी की आवाज इतनी तेज थी कि स्वर्ग लोक तक पहुंच गई। यह पौराणिक कथा भी बंगाल में काफी प्रचलित है। इसी मान्यता ने मुरीर मेले को जन्म दिया।
लोगों की आस्था से जुड़ा है मुरीर मेला (Photo: AI Image)
मुरीर मेले की खास रस्में और परंपराएं
मुरीर मेला की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और सामूहिकता है। यहां न भव्य मंच होते हैं, न भारी-भरकम इंतजाम। लोग अपने घरों से मुरमुरा लाते हैं, जिसे देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है। मेले में आए लोग वहीं द्वारकेश्वर नदी में स्नान करते हैं। मुरी के साथ ही गुड़ और तिल भी दान करते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि मेले से लौटते समय प्रसाद के रूप में मुरमुरे को घर ले जाना शुभ होता है।
लोक संस्कृति का जीवंत रंग
मुरीर मेला सिर्फ मुरी खाने तक ही सीमित नहीं है। यह बंगाल की लोकसंस्कृति का भी बड़ा मंच है। यहां मेला क्षेत्र में बंगाली लोक कलाओं का जादू भी दिखता है। फिर चाहे वह बाउल गीत हो, कीर्तन हो या फिर पारंपरिक लोक नृत्य। इन सबके बिना मुरीर मेला अधूरा माना जाता है। कलाकार बिना किसी बड़े मंच या प्रचार के अपनी कला प्रस्तुत करते हैं और दर्शक पूरे मन से इसका आनंद लेते हैं।
मेले में बंटता है मुरमुरे का प्रसाद
बच्चों और युवाओं के लिए खास
मुरीर मेला बच्चों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। यहां उन्हें उनके पसंद के खिलौने और मिठाइयां भी मिल जाती हैं। युवाओं के लिए यह मेला मेल-मिलाप का मौका होता है। रिश्तेदार, पुराने दोस्त और पड़ोसी इसी बहाने एक-दूसरे से मिलते हैं।
सामाजिक एकता का प्रतीक
मुरीर मेला की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां जाति, वर्ग या आर्थिक स्थिति का कोई भेद नहीं होता। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी एक साथ पूजा करते हैं, एक साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं और एक ही जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं। यह मेला सामाजिक समरसता की मिसाल है।
सामाजिक समरसता का उत्सव है मुरीर मेला (Photo: AI Image)
आज के दौर में मुरीर मेला
ज्यादातर इलाकों में मेले की परंपरा और लोक कलाएं या चो मर चुकी हैं या फिर अपनी अंतिम सांसे गिन रही हैं। इसी दौर में मुरीर मेला अब भी अपनी लोकात्मा को संभाले हुए है। 200 साल बाद भी यह मेला उतने ही विश्वास और श्रद्धा से मनाया जाता है। मेला न केवल धार्मिक विश्वास को मजबूत करता है, बल्कि हमें अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपने लोगों से जोड़ता है।
इस बार 18 जनवरी को यह मेला लगा था। ना सिर्फ बंगाल बल्कि झारखंड और ओडिशा से भी लोग यहां पहुंचे। मुरी खाते-खाते लोगों वे अपने सुख-दुख, सफलता-असफलता, पाने और ना मिल पाने की कहानियां बांटी। मेले से खुशनुमा यादें लेकर लोग इस वादे के साथ लौटे कि अगले साल वह फिर से इस मुरीर मेले का हिस्सा बनेंगे और अगले साल फिर मिलेंगे।
