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भिखारी ठाकुर ने फूंकी जान, शारदा सिन्हा ने बढ़ाया मान, भोजपुरी संगीत को यूं मिली ग्लोबल पहचान

Bhojpuri Music: दरभंगा से देहरादून और मोकामा से मुंबई तक, भोजपुरी गानों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। जी हां, भोजपुरी म्युजिक अब बिहार की सरहद लांघ बड़े शहरों के नाइट क्लब तक पहुंच चुका है।

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भोजपुरी म्युजिक: बड़े शहरों को पॉप कल्चर का नया सुपरस्टार

पिछले दिनों मैं दिल्ली के एक क्लब में था। क्लब में जश्न का माहौल था। हनी सिंह और बादशाह के गानों पर पूरी महफिल झूम रही थी। अचानक डीजे पर लॉलीपॉप लागेलू बजने लगा। महफिल का जोश हाई हो गया। जो नाचना नहीं जानते थे उनकी भी कमर हिलने लगी। फिर तो डीजे वाले बाबू ने भोजपुरी गानों की झड़ी लगा दी। इन भोजपुरी गानों ने समा बांध दिया। मैं समझ गया कि भोजपुरी म्युजिक ने बड़ी मजबूती से बड़े शहरों के पॉप कल्चर में अपने पैर जमा लिये हैं।

भोजपुरी म्युजिक का जलवा

दरभंगा से देहरादून और मोकामा से मुंबई तक, भोजपुरी गानों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। जी हां, भोजपुरी म्युजिक अब बिहार की सरहद लांघ बड़े शहरों के नाइट क्लब तक पहुंच चुका है। भोजपुरी गाने पहले यूपी बिहार के पान की दुकान या बस-टैम्पू में ही सुनाई देते थे। लेकिन अब भोजपुरी संगीत ने सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। आज बड़े शहरों के नाइट क्लब्स तो छोड़िए इंस्टा रील्स पर भी इनका दबदबा नजर आता है। शादी ब्याह हो या फिर कोई डीजे पार्टी, भोजपुरी तड़का जरूर लगता है। भोजपुरी म्युजिक का असली जलवा तो यूट्यूब पर दिखता है। आप चाहे कोई भी गाना खोल लिजिए। लगभग हर गाने पर लाखों-करोड़ों व्यूज़ हैं। भोजपुरी गानों की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुंच चुकी है।

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बड़े शहरों के पॉप कल्चर का नया सुपरस्टार (Source: You Tube)

भोजपुरी गीतों की लोकप्रियता अपने साथ दाग भी लाई। ये दाग कहीं से अच्छे नहीं थे। भोजपुरी गानों पर अश्लीलता और फूहड़ता का जो दाग लगा उसने भोजपुरी संगीत प्रेमियों को बुरी तरह आहत किया। दरअसल भोजपुरी वह ज़ुबान है जिसमें मां अपने बच्चे को सोहर गाकर सुलाती है, किसान कजरी गाकर खेतों में मेहनत करता है और समाज अपनी पीड़ा व संघर्ष को बिरहा और चैता के सुरों में व्यक्त करता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भोजपुरी संगीत को जिस नजर से देखा जा रहा है, वह इसकी असल पहचान नहीं है। हकीकत बस इतनी है कि आज भोजपुरी गीतों की शैली, मंच और दर्शक सब बदल गए हैं।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिसिर का भोजपुरी संगीत इतना कैसे बदल गया। कैसे वो शारदा सिन्हा और भरत शर्मा की आवाज से सजे साफ सुथरे लोक गीत आज के गायकों के ढोंढ़ी, चोली और भौजी वाले अश्लील गानों के शोर में दब गए। इन सवालों के जवाब के के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने होंगे:

वह दौर जब ना टीवी था, न रेडियो था और न ही यू-ट्यूब

यूं तो भोजपुरी लोक गीतों का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन शुरू करते हैं 20वीं सदी की शुरुआत से। वह ऐसा दौर था जब मनोरंजन के लिए टीवी नहीं था। रेडियो सीमित था। यूट्यूब नाम का प्लेटफॉर्म तो दूर-दूर तक था ही नहीं। गांव की राम लीला मनोरंजन का मुख्य साधन थी और नाटक मंडली वाले लोग उस समय के स्टार। इसी दौर में भोजपुरी समाज को अपना पहला सुपरस्टार मिला। नाम था भिखारी ठाकुर।

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भोजपुरी संगीत का गोल्डन एरा (Source : You Tube)

भिखारी ठाकुर ने साल 1917 में अपनी नाच मंडली बनाई। भोजपुरी भाषा में बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-बिरोध, पिया निसइल, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड और नेटुआ जैसे कई नाटक, सामाजिक-धार्मिक प्रसंग गाथा और गीतों की रचना की। इन्हीं की बदौलत वह भोजपुरी के शेक्सपियर कहलाए। 1930 से 1970 के बीच भिखारी ठाकुर की नाच मंडली का जादू चरम पर रहा। असम और बंगाल सहित नेपाल के भी कई शहरों में लोग टिकट खरीद कर इस मंडली की पेशकश देखने आते। बिलकुल सिनेमा जैसा।

भिखारी ठाकुर अकले नहीं थे। उन्हें साथ मिला बिहार में छपरा के महेंदर मिसिर का। दोनों ने मिलकर भोजपुरी संस्कृति को शिखर पर बिठा दिया। उस समय को भोजपुरी संगीत का गोल्डन एरा माना जाता है। दोनों की विरासत को आगे बढ़ाया गायत्री ठाकुर, बिरेन्द्र सिंह, मुन्ना सिंह और नथुनी सिंह जैसे नामों ने।

शारदा सिन्हा और भरत शर्मा ने आगे बढ़ाई विरासत

वक्त का पहिया घूमा। भिखारी ठाकुर और महेंदर मिसिर बूढ़े हो रहे थे तो वहीं भोजपुरी सिनेमा जवान हो रहा था। भोजपुरी गायकों की नई फौज तैयार हो रही थी। उस दौर के गायकों ने भोजपुरी संगीत को और अधिक सुलभ बना दिया। भोजपुरी संगीत को सुनने और सराहने वाले लोग भी बढ़े। हे गंगा मैया तोहे पियरी चढइबे जैसे भोजुपरी गानों को लता मंगेशकर की आवाज ने अमर कर दिया।

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जब भोजपुरी को मिला पंख

90 का दशक आया तो अपने साथ ऑडियो कैसेट की क्रांति लाया। भोजपुरी गायकों को बड़ा प्लेटफॉर्म मिलने लगा। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ मच गई। लेकिन उस दौर में शारदा सिन्हा और भरत शर्मा जैसे गायकों ने भोजपुरी संगीत के स्तर को हमेशा सम्मानजनक बनाए रखा। इन दोनों का साथ दूसरे कलाकारों ने भी दिया जिनमें रविन्द्र राजू , मदन राय और विष्णु ओझा प्रमुख थे।

मनोज तिवारी की एंट्री

अब भोजपुरी गीतों की दुनिया बदलने वाली थी। 20वीं सदी अपनी अंतिम सांसे गिन रही थी तभी भोजपुरी इंडस्ट्री में एक नाम तेजी से जवान हो रहा था। यह नाम था मनोज तिवारी मृदुल का। भोजपुरी संगीत की दुनिया में मनोज तिवारी की एंट्री ने पूरी इंडस्ट्री को बदलकर रख दिया। यही वो दौर था जब केबल टीवी का जन्म हुआ। टेलीविजन पर माथे पर गमछा बांधे और हाथ में हारमोनियम लिए मनोज तिवारी नजर आने लगे। बगलवाली जान मारेली जैसे गाने टीवी स्क्रीन पर दिखने लगे। लोग झूमने लगे। भोजपुरी संगीत को नए तरह कद्रदान मिलने लगे। मनोज तिवारी का कद बढ़ता गया। लेकिन अफसोस कि मनोज तिवारी के बढ़ते कद के साथ उनके भोजपुरी गीतों का स्तर गिरता गया।

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मनोज तिवारी (Source: You Tube)

21वीं सदी के शुरुआती चार पांच सालों के अंदर सीडी-डीवीडी घर-घर पहुंच गए। मनोज तिवारी की देखा देखी गुड्डू रंगीला और राधे श्याम रसिया जैसे भोजपुरी गायकों ने नैतिकता की सारी हदें तोड़ते हुए अश्लीलता और फूहड़ता को अपने गानों की जान बना ली। भोजपुरी संगीत का यह नया संस्करण खूब दौड़ा। हमरा हऊ चाही और तनी सा जींस ढीला करअ जैसे गाने खूब रस लेकर सुने जाने लगे।

भोजपुरी संगीत का पवन सिंह और खेसारी युग

सीडी और डीवीडी के दौर में लोग भोजपुरी संगीत को ना सिर्फ सुन रहे थे बल्कि खूब देख भी रहे थे। भोजपुरी के गायक लोकप्रिय होने लगे। लोकप्रियता के इसी दौर में दो नाम तेजी से उभरे। पवन सिंह और खेसारी लाल यादव के। मनोज तिवारी ने जो ट्रेंड शुरू किया इन दोनों ने उसे दोगुनी रफ्तार से आगे बढ़ाया। यही वह दौर था जब पवन सिंह लॉलीपॉप लागेलू और सानिया मिर्जा के नथुनिया जान मारे गाकर भोजपुरी म्युजिक के पावर स्टार बनने लगे।

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फोटो सोर्स: You Tube

ये सब चल ही रहा था कि भारत में इंटरनेट का आगाज हुआ। यूट्यूब ने तो तहलका ही मचा दिया। कलाकारों को इतना बड़ा मंच मिल गया जिसकी कल्पना उस वक्त इंसान की सोच से परे थे। इस सरल और सुविधाजन प्लेटफॉर्म को भोजपुरी कलाकारों ने अपना हथियार बना लिया। उसके बाद तो जो हुआ वो सब देख भिखारी ठाकुर की आत्मा के भी आंसू निकल गए होंगे। पैसे कमाने और मशहूर होने के चक्कर में गायकों ने भोजपुरी संगीत को अश्लीलता की आग में झोंक दिया। इन गायकों ने ऐसा ट्रेंड सेट कर दिया कि जो भोजपुरी संगीत को जितना नीचे गिराता वो उतना सुपरहिट हो जाता।

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फोटो सोर्स: You Tube

स्त्री देह, कामुकता और अश्लीलता से होते हुए जाति विरादरी के नाम पर भी फूहड़ता फैलने लगी। पांडे जी का बेटा हूं, चुम्मा चिपक कर लेता हूं जैसे गानों की भरमार हो गई। हद तो तब हो गई जब आरती कुंज बिहारी की धुन पर लौंडिया लंडन से लाकर रात भर डीजे बजाने की बात होने लगी। पलंग करे चोंए-चोंए की तर्ज पर कांवर कर चोएं-चोएं बनने लगे। भोजपुरी समाज के एक बहुत बड़े वर्ग ने अपना सिर पकड़ लिया। भोजपुरी संगीत अपने सबसे बुरे दौर को देख रहा था।

गांव की चौपाल से गोवा के नाइट क्लब तक

भोजपुरी संगीत पर चारों ओर से सवाल उठने लगे। भोजपुरी कलाकारों पर मुकदमे भी दर्ज हुए। इन सब विवादों के बीच बस एक चीज अच्छी हुई कि भोजपुरी संगीत क्षेत्रीय नहीं रहा। वह शहर के पॉप कल्चर के बीच पहुंच गया। न सिर्फ पहुंचा, बल्कि मजबूती से अपने पैर जमा लिए। पवन सिंह और मनोज तिवारी जैसे गायक बॉलीवुड में भी गाने लगे। भोजपुरी संगीत पर चाहे जितनी तोहमत लगे लेकिन इसमें कुछ तो ऐसा है ही कि आज हनी सिंह जैसे सुपरस्टार रैपर को भी दीदीया के देवरा गड़उले बाटे नजरी गाते सुना जा रहा है। ये बात अलग है कि हनी सिंह को अपना भोजपुरी डेब्यू भी उसी चोली और ढोंढ़ी से ही करना पड़ा।

अगर अश्लीलता को दरकिनार कर दिया जाए तो भोजपुरी गीतों में जो मिठास है वो शायद कहीं और नहीं मिलेगी। भोजपुरिया समाज का अपना एक समृद्ध संस्कार रहा है। अश्लील गानों से अलग हट कर यहां ढेरों गीत ऐसे हैं जो मन को मोह लेते हैं और तन को भी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं।

अश्लील गाने तो भोजपुरी सहित हर भाषा में हैं। लेकिन बिना अश्लीलता के देह में लहर उठाने का माद्दा भी तो सिर्फ भोजपुरी गानों में है। समय का पहिया घूम रहा है। युवा गायकों की ठीक-ठाक फौज तैयार हो रही है जो भोजपुरी संगीत की असल आत्मा को लोगों के सामने रख रही है। मैथिली ठाकुर, चंदन तिवारी, पांडे सिस्टर्स, विशाल दुबे, प्रभाकर मिश्रा जैसे कई ऐसे नाम तेजी से उभर रहे हैं।

तो अगर कभी आपको चोली, ढोंढ़ी और भोजी, देवर जैसे अश्लील भोजपुरी गीतों के बीच सुतल संइया के जगावे हो रामा, कोयल बड़ी पापिन जैसे चैता गीत सुनाई दे जाएं तो चौंकियेगा मत। भोजपुरी की पहचान ऐसे ही लोकगीत हैं जो पीढ़ियों से बिहारी संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। अब आपको तय करना है कि आप सुनना क्या चाहते हैं। क्योंकि हकीकत तो ये ही है कि आज भोजपुरी गीतों की शैली और मंच के साथ ही सुनने वालों का टेस्ट भी बहुत बदल गया है।

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Suneet Singh
Suneet Singh Author

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे ... और देखें

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