Domkach: हमारी लोक संस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं जो हमारे समाज की सोच, रिश्तों और जीवन-दर्शन की जीवंत पाठशाला भी मानी जाती रही हैं। इन्हीं में से एक है डोमकच। यह महिलाओं की अभिव्यक्ति का ऐसा उत्सव है जहां न पुरुष वर्चस्व का दबाव होता है और न ही बनावटी संकोच की कोई दीवार। यहां सिर्फ औरतें होती हैं और उनके भीतर छिपी सहज, बेफिक्र और उन्मुक्त दुनिया। वे खुलकर हंसती हैं, गीत गाती हैं, एक-दूसरे से चुहल करती हैं और अपनी भावनाओं को बिना किसी झिझक के व्यक्त करती हैं। सबसे खास बात यह है कि यह सब किसी की इजाजत या निगरानी में नहीं, अपनी शर्तों पर होता है।
बिहार के भोजपुर और यूपी के पूर्वांचल में सदियों से डोमकच ऐसी परंपरा के तौर पर मौजूद है जो औरतों का मनोरंजन करने के साथ ही उनके अंदर की कुंठा को बाहर निकाल उनमें नया उत्साह, आत्मविश्वास पैदा करती है। इसके माध्यम से हर पुरानी पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को दांपत्य जीवन जीने का तरीका भी बताती है। यही डोमकच थोड़े बहुत बदले स्वरूप के साथ झारखंड, छत्तीसगढ़, मिथिलांचल और नेपाल के तराई इलाकों की लोक संस्कृति में भी शामिल है।
बारात निकलने के बाद शुरू होता है डोमकच
डोमकच शादी ब्याह के उत्सव से जुड़ी कला है। पहले शादी ब्याह के दौरान घर परिवार के सारे मर्द बारात में दूल्हे के साथ निकल जाया करते थे। पीछे बचती थीं घर की महिलाएं। वह रात भर रात भर जागकर घर की देखभाल करती थीं। रतजगे और समय बिताने के लिए आपस में नाच गाना होता। नाचने-गाने की यही परंपरा आगे चलकर डोमकच कहलाई।
रात भर जाग कर होता था डोमकच (AI Image)
हालांकि डोमकच को महज रतजगा नहीं था। धीरे-धीरे यह महिलाओं के लिए ऐसा मौका बन गया, जहां वे अपने मन की बातें गीतों और अभिनय के जरिए व्यक्त कर सकती थीं। वे खुलकर हंसतीं, एक-दूसरे से मजाक करतीं और सामाजिक बंधनों से कुछ घंटों के लिए मुक्त हो जातीं।
कैसे होता हा डोमकच
बारात निकल जाने के बाद शादी वाले घर में आस पड़ोस की महिलाएं इकट्ठा हो जातीं। इनमें से कुछ औरतें घर के मर्दों के ही कपड़े पहन और नकली मूछें लगाकर पुरुष वेश धर लेतीं। पुरुष 'बनने' वाली महिलाओं में ज़्यादातर लड़के (दूल्हा) की बहन या बुआ होती थीं। पुरष बनी महिलाएं तरह-तरह के स्वांग रचतीं। नाच, गाना और नाटक करते हुए पहले अपने घर फिर पड़ोस की महिलाओं को छेड़तीं। इनके गीत और भंगिमाएं बहुरंगी और हस्यादपद होते।
सेक्स एजुकेशन की पहली पाठशाला हुआ करती थी डोमकच
डोमकच में दांपत्य जीवन की शिक्षा भी बड़े ही दिलचस्प अंदाज में लड़कियों को दी जाती है। हल्के फुल्के मस्ती भरे अंदाज में उन सारी चीजों को सामने रखा जाता जिसे सुखद दांपत्य का पर्याय माना जाता है। शादी से संतान प्राप्ति तक की पूरी यात्रा को नाच गाने और नौटंकी के जरिए पेश किया जाता। किशोरियों, अविवाहित लड़कियों और नई नवेली दुल्हनों को दांपत्य जीवन की पहली शिक्षा इसी डोमकच से मिलती रही है।
दाम्पत्य जीवन की सीख भी देता डोमकच
इस दौरान माहौल इतना हल्का और मस्ती भरा होता है कि सोने के बारे कोई सोचता तक नहीं। सब बस उस एक रात को पूरी बेफिक्री से जी लेना चाहतीं। यही बेफिक्री डोमकच की असली पहचान रहा है।
लेडीज संगीत के शोर में दब रही डोमकच की थाप
समय के साथ डोमकच का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता ने इस परंपरा पर पर भी आघात किया है। शहरों में अब डोमकच नहीं होते। क्योंकि बारात में औरतें भी जाने लगी हैं। नई पीढ़ी तो इस परंपरा का नाम तक नहीं जानती। गांवों एवं कस्बों में यह परंपरा अभी भी थोड़ी बहुत बची हुई है, लेकिन वहां डोमकच का तरीका बदल गया है।
औरतों के बीच डोमकच की जगह लेडीज संगीत ने ले ली है। लेडीज संगीत में ना तो डोमकच का भाव है और नी ही उसका मकसद। यह महज एक रस्म अदायगी का जरिया बनकर रह गया है। महिलाएं इकट्ठा होती हैं। फिल्मी गानों पर नाचना झूमना होता है और फिर खा-पीकर सब अपने-अपने घर निकल जाती हैं।
आज जब स्कूलों तक में सेक्स एजुकेशन और रिश्तों की समझ पर चर्चा हो रही है, तब डोमकच जैसी परंपराएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि भारतीय समाज में भी जीवन की इन बातों को समझाने के अपने सहज और सांस्कृतिक तरीके मौजूद रहे हैं। इन तरीकों में जीवन के कई अहम सबक किताबों की बजाय गीत, नाटक और अनुभवों के जरिए से दी जाती थी।
डोमकच को संजो कर रखना क्यों है जरूरी (AI Image)
डोमकच महिलाओं की सामूहिकता, उनकी अभिव्यक्ति और सामाजिक बुद्धिमत्ता का सांस्कृतिक दस्तावेज है। अगर इस दस्तावेज को नहीं सहेजा गया तो सदियों से संजोया गया अनुभव, हास्य और लोकज्ञान भी हमारे हाथों से फिसल जाएगा।
