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Explained: हर जगह पानी, फिर भी हाइड्रोजन ईंधन सबसे मुश्किल मिशन; जानें भविष्य का फ्यूल आज भी क्यों है सपना

दुनिया की रफ्तार ईंधन से तय होती है, लेकिन यही ईंधन आज पर्यावरण और भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी बन चुका है। जीवाश्म ईंधनों के प्रदूषण और सीमित भंडार ने वैज्ञानिकों को ऐसे विकल्प की तलाश में लगा दिया है, जो साफ हो, टिकाऊ हो और भविष्य के लिए सुरक्षित हो। पानी में छिपा हाइड्रोजन इसी उम्मीद की सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है। सवाल सिर्फ इतना है कि जब हाइड्रोजन हर जगह है, तो वह अभी तक हमारी गाड़ियों, फैक्ट्रियों और घरों तक क्यों नहीं पहुंच पाया? आइए समझते हैं।

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'भविष्य के फ्यूल' हाइड्रोजन की क्यों मुश्किल है राह (AI Image)

कहने को तो दुनिया भरोसे पर चलती है लेकिन असल में दुनिया चलती है ईंधन पर। खाने से लेकर सफर तक किसी भी चीज की कल्पना ईंधन के बिना संभव नहीं है। लेकिन इसका इस्तेमाल अपने साथ एक कीमत लेकर आता है। लकड़ी, कोयला, LPG, पेट्रोल, डीजल... इस लंबी कतार में शामिल सभी ईंधन ठोस, तरल या गैसीय हो सकते हैं। अधिकांश सामान्य ईंधनों में हाइड्रोकार्बन (कार्बन और हाइड्रोजन कंपाउंड) होते हैं और इन्हें जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लाखों सालों पहले पौधों और जानवरों के छोड़े गए कार्बनिक पदार्थों (जीवाश्म) के अंतिम उत्पाद के रूप में ये जमीन में पाए जाते हैं।

ईंधन का चक्कर

अब ये बात तो सबको पता है कि ऊर्जा यानी एनर्जी बनाई नहीं जा सकती है, इसका केवल रूप बदला जा सकता है। तो ईंधनों से भी एनर्जी बनाने का तरीका यही है, ऐसे ईंधनों को जलाया जाता है, जिससे ऑक्सीजन के साथ रिएक्शन होता है और गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को मेकेनिकल या इलेक्ट्रिकल एनर्जी में बदला जाता है, और फिर मनचाहे काम में इस्तेमाल होता है। हालांकि फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल भले ही कितना भी जरूरी क्यों न हो ये अपने साथ एक कीमत भी लेकर आता है। अव्वल तो ये असीम नहीं है, एक बार इस्तेमाल हो जाने के बाद ईंधन खत्म हो जाता है। इसके अलावा फॉसिल फ्यूल्स के कुछ नुकसान भी हैं। इनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। जीवाश्म ईंधनों को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड , कार्बन मोनोऑक्साइड , नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं। ये गैसें हवा को प्रदूषित करती हैं और वातावरण में मौजूद नमी के साथ रिएक्शन करके अम्लीय वर्षा (Acid Rain) का कारण बनती हैं। ग्रीनहाउस इफेक्ट के कारण ये वायुमंडलीय तापमान को भी बढ़ाती हैं, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है। इन्हीं कारणों से ग्रीन एनर्जी के स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने की बात बार-बार कही जाती है। ऐसे में जिस ईंधन का कहीं तोड़ नहीं है, वो है- हाइड्रोजन। क्योंकि हाइड्रोजन से जब ऊर्जा पाने के लिए ऑक्सीजन से जब रिएक्शन होगा तो जो गैस निकलेगी वो पानी की भाप (H2O) ही होगी। फिर भी इसका इस्तेमाल इतना आम क्यों नहीं है आइए समझते हैं।

सबसे शानदार ईंधन

पृथ्वी की सतह का लगभग दो-तिहाई हिस्सा पानी से ढका है, यानी पहली नजर में लगता है कि हाइड्रोजन की कोई कमी नहीं होनी चाहिए। पानी के हर अणु में दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन होता है, इसीलिए वैज्ञानिक इसे भविष्य का संभावित ईंधन मानते भी हैं। हाइड्रोजन को जलाने पर मुख्य रूप से पानी ही बनता है, यानी लगभग शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा मिलती है, इसलिए इसे क्लीन या ग्रीन फ्यूल की श्रेणी में रखा जाता है। हाइड्रोजन का ऊर्जा घनत्व (प्रति किलोग्राम मिलने वाली ऊर्जा) बहुत अधिक है, जो पारंपरिक फॉसिल फ्यूल की तुलना में बेहतर हो सकती है।

पानी हर जगह, हाइड्रोजन भी बहुत… फिर दिक्कत कहां

दरअसल पानी से हाइड्रोजन निकालना ही सबसे बड़ा चैलेंज है। पानी में मौजूद हाइड्रोजन 'फ्री' नहीं है, बल्कि ऑक्सीजन के साथ मजबूती से बंधा होता है। इसे अलग करने के लिए 'इलेक्ट्रोलिसिस' नाम की प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है, जिसमें बिजली की मदद से पानी के अणुओं को तोड़कर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग किया जाता है। यहीं होती है गड़बड़ी, असल में इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया के लिए बहुत अधिक बिजली चाहिए, और अगर यह बिजली कोयला या गैस से आती है तो पूरा सिस्टम फिर से कार्बन-इंटेंसिव हो जाता है। हाइड्रोजन ग्रीन तब कहलाता है जब यह बिजली सोलर, हवा जैसी रिन्यूएबल एनर्जी से आती है, लेकिन अभी इनकी कीमत और स्थिर उपलब्धता दोनों बड़े मुद्दे हैं। यानी पानी तो हर जगह है, पर उसे ईंधन में बदलने की प्रक्रिया अभी भी महंगी है और इसमें ऊर्जा की खपत भी बहुत ज्यादा है।

Electrolysis of water

इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन होता है अलग (चित्र साभार : iStock)

हाइड्रोजन संभालना मुश्किल काम

हाइड्रोजन के साथ एक और दिक्कत जो सामने आती है वो इसके ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज से जुड़ी है। हाइड्रोजन दुनिया की सबसे हल्की गैस है, हवा से भी लगभग 14 गुना हल्की, इसलिए इसे साधारण टैंकों में रखना आसान नहीं है। गैस रूप में स्टोर करने के लिए बहुत हाई प्रेशर वाले महंगे और मजबूत टैंक चाहिए, जो कारों और स्टोरेज सिस्टम की लागत बढ़ा देते हैं। लिक्विड हाइड्रोजन बनाने के लिए इसे लगभग -253 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा करना होता है, जो ऊर्जा और तकनीक दोनों के स्तर पर चुनौतीपूर्ण और महंगा है। पाइपलाइन से ट्रांसपोर्ट करने पर रिसाव और मेटल की भंगुरता यानी Brittleness जैसी समस्याएं आती हैं, इसलिए सामान्य गैस पाइपलाइन जैसी सस्ती व्यवस्था किसी काम की नहीं होती। इन सब वजहों से हाइड्रोजन के लिए अलग, खास और महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, जो अभी दुनिया के बहुत कम हिस्सों में मौजूद है। इससे इतर, हाइड्रोजन बहुत ज्वलनशील गैस भी है, थोड़ी सी चिंगारी से भी आग भड़क सकती है। यदि सिस्टम में कहीं लीकेज हो जाए तो गैस बहुत तेजी से हवा में फैलती है और विस्फोट के जोखिम बढ़ जाते हैं, इसलिए हाई-प्रिसिशन वाल्व, सेंसर और मॉनिटरिंग सिस्टम जरूरी हैं। इससे हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स पर सुरक्षा मानकों के कारण अतिरिक्त लागत जुड़ जाती है।

hydrogen fuel storage

हाइड्रोजन ईंधन को रखने के लिए खास व्यवस्था की होती है जरूरत (चित्र साभार : iStock)

अभी मुश्किल है राह

हाइड्रोजन बतौर ईंधन कागज पर लगभग परफेक्ट लगता है, प्रचुर मात्रा में मौजूदगी, जीरो कार्बन इमीशन और हाई एनर्जी डेंसिटी लेकिन वास्तविक दुनिया में इसे पानी से निकालना, सुरक्षित रखना, सस्ते में ट्रांसपोर्ट करना और बाकी फ्यूल्स के सामने खड़ा करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। संभावना यह है कि आने वाले दशकों में हाइड्रोजन अपने सेक्टर में जगह बनाएगा और पानी में छिपा यह 'सुपर फ्यूल' सच में हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सकेगा लेकिन फिलहाल दिल्ली दूर है।

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