जब मेडिकल साइंस के विकास के शुरुआती क्रम में जरूर लोगों ने कभी किसी एक बीमारी का इलाज ढूंढने के चक्कर में कोई ऐसी दवा खा ली होगी, जिसका उल्टा असर शरीर के दूसरे अंगों पर पड़ गया होगा। ये कोई अजीब बात नहीं है, अब भी साइड इफेक्ट के नाम पर ऐसे मामले देखने को मिल ही जाते हैं। फिलहाल दवाइयों से इतर कुछ ऐसा ही इस वक्त हमारी धरती के साथ हो रहा है। इंसानों ने मिलकर सूरज की खतरनाक पराबैंगनी किरणों (UV Rays) से बचाने वाली 'ओजोन परत' का छेद तो काफी हद तक ठीक कर लिया, लेकिन इस इलाज के चक्कर में अनजाने में पूरी धरती पर 'फॉरेवर केमिकल' (Forever Chemical) यानी कभी न खत्म होने वाले केमिकल का ऐसा जाल बुन दिया है, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए बड़ी मुसीबत बनने वाला है।
यूके की प्रसिद्ध लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी (Lancaster University) के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यह रिसर्च साइंस पत्रिका जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स (Geophysical Research Letters) में प्रकाशित हुई है। आइए बहुत ही आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझते हैं कि आखिर यह पूरा मामला क्या है।
क्या है यह पूरी कहानी?
आज से करीब तीन-चार दशक पहले दुनिया को पता चला कि हमारे फ्रिज, एयर कंडीशनर (AC) और स्प्रे में इस्तेमाल होने वाली CFC (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) गैस आसमान में जाकर हमारी सुरक्षा ढाल यानी ओजोन परत को कम कर रही है। दुनिया घबरा गई। तुरंत साल 1987 में एक इंटरनेशनल समझौता हुआ जिसे 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' कहा जाता है। इसके तहत तय हुआ कि CFC गैसों को बैन किया जाएगा और उनकी जगह 'सुरक्षित' या 'इको-फ्रेंडली' गैसें लाई जाएंगी। इंसानों ने CFC की जगह पहले HCFC (हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन) और फिर HFC (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन) गैसों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। ये गैसें ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाती थीं। हमें लगा कि हमने जंग जीत ली, लेकिन ट्विस्ट यहीं से शुरू हुआ। ये नई गैसें जब हवा में मौजूद अन्य तत्वों और सूरज की रोशनी के साथ रिएक्शन करती हैं, तो टूटकर एक नया केमिकल बनाती हैं, जिसका नाम है, TFA (ट्राइफ्लूरोएसेटिक एसिड)।
1989 से 2011 तक ओजोन परत की स्थिति (चित्र साभार: NASA)
TFA क्या है और इसे 'फॉरेवर केमिकल' क्यों कहते हैं?
आसान भाषा में समझते हैं। मान लीजिए आपके घर में प्लास्टिक का एक ऐसा डिब्बा है जिसे न तो आग से जलाया जा सकता है, न पानी में गलाया जा सकता है, और न ही मिट्टी में दबाकर नष्ट किया जा सकता है। आप उसे फेंक भी दें, तो वह सैकड़ों सालों तक वैसा का वैसा ही कबाड़ बनकर पड़ा रहेगा। TFA भी केमिकल की दुनिया का ऐसा ही एक 'अमर प्लास्टिक' है। यह रसायनों के उस बड़े परिवार का हिस्सा है जिसे PFAS या 'फॉरेवर केमिकल्स' कहा जाता है। ये ऐसे सिंथेटिक रसायन हैं जो पर्यावरण में जाने के बाद कभी सड़ते या गलते नहीं हैं। ये पानी में घुल जाते हैं और बारिश के जरिए वापस नदी, तालाब, मिट्टी और हमारे पीने के पानी में समा जाते हैं। इन्हें पानी से अलग करना या फिल्टर करना लगभग नामुमकिन है।
आर्कटिक की बर्फ में मिला 'जहर': कैसे फैल रहा है यह प्रदूषण?
लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी की मुख्य शोधकर्ता लूसी हार्ट (Lucy Hart, PhD Researcher) और उनकी टीम ने एक बेहद एडवांस कंप्यूटर मॉडल (Chemical Transport Modeling) के जरिए यह ट्रैक किया कि ये गैसें दुनिया में कहां से निकलती हैं और कैसे सफर करती हैं। जांच में सबसे हैरान करने वाली बात आर्कटिक (North Pole) को लेकर सामने आई। आर्कटिक एक ऐसा इलाका है जहां न तो कोई फैक्ट्रियां हैं, न गाड़ियां चलती हैं और न ही कोई फ्रिज-एसी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है। लेकिन जब वैज्ञानिकों ने वहां जमी सदियों पुरानी बर्फ की परतों (Ice-Cores) की जांच की, तो उसमें भारी मात्रा में TFA केमिकल पाया गया।
मॉडलिंग से साबित हुआ कि शहरों में कारों और AC से निकलने वाली ये आधुनिक गैसें हवा के झोंकों के साथ तैरती हुई हजारों किलोमीटर दूर आर्कटिक जैसे साफ इलाकों में पहुंच जाती हैं। वहां बादलों के साथ मिलकर ये बारिश या बर्फ के रूप में जमीन पर गिरती हैं। यानी इंसानों की बनाई गंदगी से आज धरती का वो कोना भी अछूता नहीं है जहां इंसान खुद नहीं रहता।
चिंता की बात: इंसानी खून और रीप्रोडक्शन पर खतरा
वैज्ञानिक इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं क्योंकि यह केमिकल लगातार जमा होता जा रहा है। यूरोपियन केमिकल्स एजेंसी (ECHA) ने इसे जलीय जीवों (मछलियों और पौधों) के लिए बेहद हानिकारक माना है। बात सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, यह हमारे शरीर के अंदर भी घुस चुका है। वैज्ञानिकों ने इंसानों के खून और यूरिन (Urine) में भी TFA के अंश पाए हैं।
हाल ही में जर्मन फेडरल ऑफिस फॉर केमिकल्स ने एक बेहद डरावनी बात सामने रखी है, जिसके मुताबिक TFA को इंसानों की प्रजनन क्षमता (Reproduction System) यानी बच्चे पैदा करने की क्षमता के लिए जहरीला हो सकता है।
हालांकि, कुछ सरकारी एजेंसियां कहती हैं कि अभी पानी या पर्यावरण में इसकी मात्रा इतनी अधिक नहीं है कि इंसान तुरंत बीमार हो जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि जब यह कभी नष्ट ही नहीं होता, तो धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ती ही जाएगी। इसीलिए वैज्ञानिक इसे अब 'प्लैनेटरी बाउंड्री थ्रेट' यानी पृथ्वी की बर्दाश्त करने की सीमा के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे हैं।
नई कारें और नए रेफ्रिजरेंट्स बढ़ा रहे हैं आफत
स्टडी के सह-लेखक प्रोफेसर रायन होसैनी (Professor Ryan Hossaini) ने एक और नए खतरे की तरफ इशारा किया है। उन्होंने बताया कि आजकल कारों के एयर कंडीशनिंग सिस्टम में एक नया रेफ्रिजरेंट इस्तेमाल हो रहा है, जिसका नाम है HFO-1234yf (2,3,3,3-टेट्राफ्लोरोप्रोपेन)।
इसे 'ग्लोबल वार्मिंग' को कम करने वाली सबसे बेहतरीन और 'क्लाइमेट फ्रेंडली' गैस बताकर बाजार में बेचा जा रहा है। लेकिन रिसर्च से पता चला है कि यह गैस पुरानी गैसों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से और बहुत अधिक मात्रा में TFA केमिकल बनाती है। यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में इस गैस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में पानी के स्रोतों में इस जहर की मात्रा और तेजी से बढ़ेगी।
कैसे 'फॉरेवर केमिकल' बन रहा नया संकट (AI Created Image)
क्या कहते हैं दुनिया के अन्य वैज्ञानिक?
स्विट्जरलैंड में इस पर नजर रखने वाले वैज्ञानिक डॉ. स्टीफन रीमैन (Dr. Stefan Reimann) का कहना है, "दुनिया के जिस भी हिस्से में हमने टीएफए (TFA) को नापा है, हर जगह एक ही जैसी डरावनी तस्वीर दिख रही है, हवा और पानी में इसकी मात्रा लगातार बढ़ रही है।" वहीं लैंकेस्टर एनवायरनमेंट सेंटर के डायरेक्टर प्रोफेसर क्रिस हालसाल (Professor Cris Halsall) ने बताया, "पहले हम सोचते थे कि यह केमिकल सिर्फ खेतों में छिड़के जाने वाले कुछ कीटनाशकों से निकलता है। लेकिन अब साफ है कि यह हमारी दवाओं, सॉल्वैंट्स, गाड़ियों और घरों के एसी-फ्रिज से बड़े पैमाने पर निकल रहा है।"
आखिर समाधान क्या है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समस्या 2025 से लेकर 2100 के बीच अपने चरम पर पहुंच सकती है। अगर हमने आज एसी की गैसें बदलना बंद भी कर दिया, तो जो गैसें पहले से हवा में मौजूद हैं, वे अगले कई दशकों तक टूट-टूटकर इस जहर को बनाती रहेंगी। इसलिए, अब समय आ गया है कि जब भी हम किसी हानिकारक केमिकल का विकल्प ढूंढें, तो सिर्फ यह न देखें कि वह ओजोन को बचा रहा है या नहीं, बल्कि यह भी देखें कि वह भविष्य के लिए कोई नया सिरदर्द तो पैदा नहीं कर रहा।
