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धरती का वो दौर जब दिशाएं बताने में फेल हो जाता था कंपास; येल के वैज्ञानिकों ने खोजा 60 करोड़ साल पुराना रहस्यमयी पैटर्न

क्या आपको पता है, जिस कंपास की सुई एक झटके में उत्तर और दक्षिण दिशा बता देती है उसे धरती कभी चकमा भी देती थी। यही नहीं क्या आपको ये पता है कि जो दिशा आपको केवल इसलिए उत्तर लग रही है क्योंकि कंपास की सुई का लाल हिस्सा उस ओर रहता है, वो कभी दक्षिण भी होता था और आने वाले समय में यह फिर बदल सकता है। धरती के मैग्नेटिक पोल की अस्थिरता के लिए जिम्मेदार 60 करोड़ साल पहले हए जिस उथल-पुथल को रैंडम समझा जाता था, येल के वैज्ञानिकों को उसमें एक पैटर्न मिला है।

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Photo : Times Now Digital
धरती के 'केऑटिक' चुंबकीय क्षेत्र को लेकर आई नई स्टडी
Authored by: Nishant Tiwari
Updated Apr 3, 2026, 16:27 IST

कल्पना कीजिए कि आप जंगल में फंसे हैं और आपके पास एक कंपास यानी दिशा बताने वाला यंत्र है। आप उत्तर दिशा की ओर जाना चाहते हैं, लेकिन कंपास की सुई कभी पूरब की ओर भाग रही है, तो कभी दक्षिण की ओर। अचानक वह सुई गोल-गोल घूमने लगती है। आपको लग सकता है कि कंपास खराब है, लेकिन क्या हो अगर आपको पता चले कि असल में खराब कंपास नहीं, बल्कि पूरी धरती का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) है! सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने हाल ही में खुलासा किया है कि लगभग 60 करोड़ साल पहले हमारी धरती सच में इसी 'पागलपन' से गुजर रही थी। येल यूनिवर्सिटी (Yale University) के शोधकर्ताओं ने एक नई स्टडी में इस रहस्यमयी दौर के पीछे छिपा एक गहरा पैटर्न खोज निकाला है।

क्या है पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र?

पहले समझ लेते हैं धरती का चुंबकीय क्षेत्र क्या है। इसे समझने के लिए अपनी धरती को एक बहुत बड़े 'बार मैग्नेट' (चुंबक) की तरह सोचें। जैसे एक साधारण चुंबक के दो सिरे होते हैं, वैसे ही धरती के भी दो चुंबकीय ध्रुव (North and South Poles) हैं। यह चुंबकीय क्षेत्र हमें दिखाई तो नहीं देता, लेकिन यह एक 'अदृश्य कवच' (Magnetosphere) की तरह काम करता है। सूरज से लगातार बहुत खतरनाक चार्ज्ड पार्टिकल्स और रेडिएशन (सौर हवाएं) धरती की तरफ आती हैं। अगर यह चुंबकीय कवच न हो, तो ये किरणें हमारे वायुमंडल को तबाह कर देंगी और धरती पर जीवन असंभव हो जाएगा। यह कवच धरती के अंदर गहराई में मौजूद पिघले हुए लोहे (Molten Iron) की हलचल से बनता है।

धरती का चुंबकीय क्षेत्र

धरती का चुंबकीय क्षेत्र

एडिऐकेरन काल: जब दिशाएं खो गई थीं

लगभग 63 करोड़ से 54 करोड़ साल पहले धरती के इतिहास में एक ऐसा समय था जिसे 'एडिऐकेरन काल' (Ediacaran Period) कहा जाता है। यह कालखंड वैज्ञानिकों के लिए यह दौर हमेशा से एक सिरदर्द रहा है। बाकी समय में तो धरती का चुंबकीय ध्रुव अपनी जगह पर रहते थे और लाखों सालों में कभी-कभार अपनी दिशा बदलते थे, जिसे पोल रिवर्सल या मैगनेटिक फ्लिप कहते हैं। लेकिन एडिऐकेरन काल की चट्टानों को जब जांचा गया, तो उनमें दर्ज चुंबकीय संकेत बहुत ही 'अराजक' (Chaotic) मिले। ऐसा लगता था जैसे ध्रुव पूरी दुनिया में अस्थिरता और अराजकता के साथ घूम रहे थे। इसे लेकर वैज्ञानिकों को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ होगा। कुछ ने कहा कि शायद जमीन के टुकड़े (Tectonic Plates) बहुत तेज भाग रहे थे, तो कुछ ने कहा कि पूरी की पूरी धरती ही अपने अक्ष (Axis) पर झुक गई थी, जिसे 'ट्रू पोलर वांडर' कहते हैं। इसे लेकर येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की साइंस एडवांसेस में एक स्टडी छापी गई है, जो इस 'केऑस' में भी पैटर्न की ओर इशारा कर रही है।

येल यूनिवर्सिटी की नई खोज: अराजकता में भी अनुशासन

येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड इवांस और उनकी टीम ने मोरक्को की पहाड़ियों से प्राचीन ज्वालामुखी चट्टानों के नमूने लिए। उन्होंने इन चट्टानों की परतों की बहुत बारीकी से जांच की। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह चुंबकीय बदलाव लाखों सालों में नहीं, बल्कि महज कुछ हजारों सालों में हो रहे थे। इतनी तेजी से तो जमीन के प्लेट्स हिल भी नहीं सकते। इसका मतलब था कि समस्या धरती की ऊपरी सतह में नहीं, बल्कि उसके अंदरूनी 'कोर' (Core) में थी।

सबसे रोमांचक बात यह थी कि जिसे वैज्ञानिक अब तक 'बेमतलब की चीज' या केवल 'रैंडम शोर' मानकर छोड़ देते थे, उसमें एक ग्लोबल पैटर्न छिपा था। चुंबकीय ध्रुव रैंडम तरीके से नहीं हिल रहे थे, बल्कि एक व्यवस्थित ढांचे (Structured Pattern) का पालन कर रहे थे। प्रोफेसर इवांस के अनुसार, "हमने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल (Statistical Model) तैयार किया है जो इस अराजकता में भी अनुशासन ढूंढता है। इससे अब हम अरबों साल पुराने महाद्वीपों और महासागरों का सटीक नक्शा बना सकेंगे।"

क्या फिर से पलटने वाली है धरती?

अब सवाल उठता है कि क्या आज भी ऐसा कुछ हो रहा है? जवाब है हां! नासा (NASA) के अनुसार, पिछले 200 सालों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति लगभग 10% कम हो गई है। साथ ही, चुंबकीय उत्तरी ध्रुव (Magnetic North Pole) बहुत तेजी से कनाडा से साइबेरिया की ओर खिसक रहा है।

पोल रिवर्सल क्या है?

पोल रिवर्सल (Pole Reversal) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उत्तर और दक्षिण ध्रुव अपनी जगह बदल लेते हैं। यानी आपका कंपास उत्तर की जगह दक्षिण दिखाने लगेगा। नासा का कहना है कि पिछले 8.3 करोड़ सालों में ऐसा 183 बार हो चुका है। औसतन हर 3 लाख साल में ऐसा होता है, लेकिन आखिरी बार यह 7 लाख 80 हजार साल पहले हुआ था। यानी हम एक 'रिवर्सल' के लिए काफी लेट हैं!

सुपरकंप्यूटर से तैयार किया गया पोल रिवर्सल का मॉडल

सुपरकंप्यूटर से तैयार किया गया पोल रिवर्सल का मॉडल

अगर आज दिशा बदल जाए तो क्या होगा?

लोग अक्सर डरते हैं कि ध्रुव बदलने से प्रलय आ जाएगी, लेकिन नासा और येल के वैज्ञानिक आश्वस्त करते हैं कि ऐसा हुआ तो जीवन खत्म नहीं होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी ध्रुव बदले हैं, कोई सामूहिक विनाश (Mass Extinction) नहीं हुआ। इसका कारण है कि चुंबकीय क्षेत्र कमजोर जरूर होता है, लेकिन गायब नहीं होता। हमारा वायुमंडल हमें सौर किरणों से बचाता रहेगा। लेकिन आज के दौर में सबसे बड़ा असर हमारे सैटेलाइट्स, GPS और बिजली ग्रिड पर पड़ सकता है। पक्षी और जानवर जो दिशा पहचानने के लिए चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करते हैं, वे थोड़े समय के लिए भ्रमित हो सकते हैं। होगा बस यूं कि रिवर्सल के दौरान एक साथ कई छोटे-छोटे नॉर्थ और साउथ पोल बन सकते हैं, जिससे दिशा पहचानना मुश्किल हो जाएगा।

अतीत से भविष्य की राह

येल यूनिवर्सिटी की यह नई खोज हमें यह समझने में मदद करती है कि हमारी धरती का इंजन (Core) कैसे काम करता है। एडिऐकेरन काल की उस 'अराजकता' को समझकर अब हम यह जान सकते हैं कि भविष्य में होने वाले बदलावों के लिए हमें कितना तैयार रहना है। धरती का चुंबकीय क्षेत्र भले ही अस्थिर लगे, लेकिन यह उसके जीवित होने का प्रमाण है। जब तक धरती के अंदर लोहा पिघल रहा है और हलचल हो रही है, तब तक हमारा यह अदृश्य सुरक्षा कवच हमें ब्रह्मांड की खतरनाक किरणों से बचाता रहेगा।

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