ज्ञानवापी पर बड़ी खबर: 'शिवलिंग' 13वीं शताब्दी का है, मस्जिद का गुंबद 17वीं शताब्दी में बना-सूत्र

ज्ञानवापी पर हिंदुओं की लड़ाई भले 353 साल पुरानी हो, लेकिन ये लड़ाई थमी नहीं कि इस बीच यह खबर आई कि ज्ञानवापी का 'शिवलिंग' 13वीं शताब्दी का है जबकि मस्जिद का गुंबद 17वीं शताब्दी में बना है।

Big news on Gyanvapi: 'Shivling' is of 13th century, the dome of the mosque was built in the 17th century- sources
ज्ञानवापी पर अब सिर्फ सत्यमेव जयते? 
मुख्य बातें
  • 1991 वाले कानून के नाम, सच पर और पर्दा नहीं?
  • सबूतों से साफ, ज्ञानवापी मस्जिद ही नहीं?
  • औरंगजेब के पाप को कैसे छिपाएगा मुस्लिम पक्ष?

भारत सत्य की ताकत को सदियों से पहचानता है, इसलिए हमारे मुंडक उपनिषद में लिखा है- सत्यमेव जयते। इसे अशोक स्तंभ पर भी लिखा गया है।
ज्ञानवापी पर हिंदुओं की लड़ाई भले 353 साल पुरानी हो, लेकिन ये लड़ाई थमी नहीं, क्योंकि हिंदू पक्ष का दावा है कि वो सच के साथ खड़ा है। सच को औरंगजेब के कारनामे नहीं दबा सकते। सच को कोई कानून भी नहीं रोक सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के पूजास्थल कानून के बहाने ज्ञानवापी का सर्वे रोकने की कोशिश को आईना दिखा दिया है। आज सवाल पब्लिक का है यही है कि क्या ज्ञानवापी के सच पर अब कानून की मुहर लगने वाली है?

ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग पर बहुत बड़ी खबर सामने आई है। सूत्रों के मुताबकि ज्ञानवापी का 'शिवलिंग' 13वीं शताब्दी का है जबकि मस्जिद का गुंबद 17वीं शताब्दी में बना है। किसी एक्सपर्ट ने कार्बन डेटिंग पद्धति से इसका पता लगाया है। कार्बन डेटिंग पद्धति से किसी वस्तु के बारे में पता लगाया जाता है कि वह कितना पुराना है कब बना था। दोनों के निर्माण में 400 साल से ज्यादा का फर्क है।

ज्ञानवापी में हुए सर्वे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए मुस्लिम पक्ष ने आज 1991 के पूजास्थल कानून पर जोरदार बहस करने की कोशिश की। मुस्लिम पक्ष के वकील हुजेफा अहमदी ने अपनी दलीलों में कहा - कमीशन क्यों बना? सिर्फ ये पता लगाने के लिए कि वहां देवता हैं? इसलिए इस सर्वे कमीशन से पूजास्थल कानून के सेक्शन 3 का उल्लंघन हुआ है। हुजेफा अहमदी की इस दलील पर जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने साफ कह दिया कि 1991 के कानून में धार्मिक स्वरूप का पता लगाने पर रोक नहीं है। कोर्ट ने ये कॉमेंट करने से पहले 1991 के एक्ट की कॉपी मंगवाई थी। यानी कोर्ट ने 1991 के कानून के आधार पर सर्वे को खारिज करने की दलील को सही नहीं माना है। 

वैसे आज सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी कोर्ट में चल रहे मामले को जिला जज अजय कृष्ण विश्वेशा की अदालत में ट्रांसफर कर दिया। लेकिन ना तो वजू स्थल को सील करने के 17 मई के आदेश को रद्द किया और ना ही वाराणसी कोर्ट में चलने वाली सुनवाई को। लेकिन जब 1991 के पूजास्थल कानून को ज्ञानवापी विवाद में सबसे बड़ा रोड़ा बनाने की कोशिश हो रही है, तब हिंदू पक्ष की दलीलों को जानना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष ने एक स्पेशल लीव पिटिशन डाली है। और इसकी एक कॉपी हमारे पास है। इसके पेज 31 के प्वाइंट नंबर 60 में हिंदू पक्ष कहता है कि 5 कोस स्थान में आदि विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा अनंतकाल से होती है। इसी पेज का प्वाइंट नंबर 61 है -यानी अगर मंदिर का कोई हिस्सा तोड़ा गया तो पूजास्थल का धार्मिक स्वरूप नहीं बदलता।

प्वाइंट 62 कहता है कि मंदिर का ऊपरी हिस्सा तोड़ा गया लेकिन अन्य स्थलों पर हिंदुओं की पूजा जारी रही। प्वाइंट 63 में कहा गया कि 1936 के मुकदमे में साबित हुआ कि 5 कोस इलाके में सनातन का धार्मिक स्वरूप मौजूद है। पेज नंबर 36 पर प्वाइंट नंबर 74 में लिखा गया है -यानी मस्जिद सिर्फ वक्फ की संपत्ति पर बन सकती है। वक्फ बनाने का अधिकार उसको है, जिसका संपत्ति पर अधिकार हो, औरंगजेब ने इसके लिए कोई वक्फ नहीं बनाया। इसी पेज पर प्वाइंट नंबर 73 पर कहा गया है कि हिंदू कानून के मुताबिक पूजास्थल के मालिक खुद भगवान होते हैं। पूजास्थल पर जबरन कब्जे से उस पर किसी का अधिकार नहीं बनता।

मुस्लिम पक्ष को हिंदू पक्ष की इन दलीलों को नकारने की चुनौती है। कोर्ट में मुस्लिम पक्ष क्या करेगा, ये देखना होगा। फिलहाल तो शक्ति प्रदर्शन हो रहा है। आज ज्ञानवापी में जुमे की नमाज के लिए जरूरत से ज्यादा भीड़ आ गई। इतनी भीड़ आई कि मस्जिद कमेटी को लोगों से घर जाने को कहना पड़ा। ये संयोग हो सकता है। लेकिन जब 6 मई को सर्वे शुरू हुआ था। उस दिन भी जुमे की नमाज के लिए सामान्य से तकरीबन 20 गुना ज्यादा भीड़ आई थी। लेकिन इस पूरी लड़ाई में पब्लिक क्या कह रही है।

सवाल पब्लिक का

1. क्या 1991 के पूजास्थल कानून का सहारा ले रहे मुस्लिम पक्ष को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा?

2. क्या विवादित स्थल के 5 कोस इलाके का धार्मिक स्वरूप सनातन है?

3. क्या ज्ञानवापी में सामने आए सबूतों से ही मंदिर साबित हो जाएगा?

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