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मुंबई को पहली बार मिलेगा BJP का मेयर, ठाकरे भाइयों के गढ़ में खिल गया 'कमल'

बीएमसी चुनाव के लिए उद्धव टाकरे ने कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा को छोड़कर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ हाथ मिलाया था लेकिन ठाकरे भाइयों की यह जोड़ी मुंबईवासियों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पाई। चुनाव में दोनों भाइयों ने 'मराठी मानुष' का भावनात्मक कार्ड भी खेला।

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Photo : PTI
बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे को लगा बड़ा झटका। तस्वीर-PTI

BMC Election Result 2026: बृह्नमुंबई महानगर पालिका (BMC) के चुनाव नतीजे 16 जनवरी को आए। मतों कि गिनती शुरू होते हुई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाली महायुति ने बढ़त बना ली और यह बढ़त अंत तक कायम रही। दोपहर होते-होते भाजपा-शिंदे शिवसेना गुट बहुमत के आंकड़े 114 को पार कर गया। बीएमसी चुनाव में भाजपा का अब तक का यह सबसे शानदार प्रदर्शन है। इस कामयाबी के साथ बीएमसी में अपना मेयर बनाने का भाजपा का सपना पूरा हो गया है। अब बीएमसी में पहली बार भाजपा का मेयर होगा। तो वहीं, इस चुनाव में सबसे बड़ा झटका उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना यूबीटी को लगा है। बीएमसी की कुर्सी उसके हाथ से निकल गई है।

..तो नुकसान कर गया MNS का साथ!

बीएमसी चुनाव के लिए उद्धव टाकरे ने कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा को छोड़कर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ हाथ मिलाया था लेकिन ऐसा लगता है कि ठाकरे भाइयों की यह जोड़ी मुंबईवासियों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पाई। चुनाव में दोनों भाइयों ने 'मराठी मानुष' का भावनात्मक कार्ड भी खेला लेकिन यह भी काम नहीं कर पाया। बीएमसी शिवसेना का गढ़ रही है। करीब ढाई दशकों तक इस पर शिवसेना का एकछत्र राज रहा है लेकिन इस बार वह अपने दबदबे को कायम नहीं रख पाई।

गैर-मराठी वोटरों का नहीं मिला पूरा साथ

बीएमसी चुनाव में उद्धव एवं राज ठाकरे की हार की दो प्रमुख वजहें हैं। पहला है एकनाथ शिंदे का शिवसेना से अलग होना और दूसरा है राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस का खराब प्रदर्शन। मुंबई में बीएमसी की सत्ता में काबिज होने के लिए मराठी कोर वोटरों के साथ-साथ गैर-मराठी वोटरों का साथ मिलना जरूरी है। केवल मराठी वोटरों से बीएमसी की सत्ता में नहीं पहुंचा जा सकता। मुंबई में मराठी वोटर करीब 38 प्रतिशत बताए जाते हैं जबकि उत्तर भारतीय, गुजराती एवं अन्य समुदाय के वोटरों की संख्या 30 से 35 प्रतिशत तक जाती है। मुंबई में मुस्लिम वोट की तादाद भी अच्छी खासी है।

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बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे को लगा झटका। तस्वीर-PTI

कम नहीं हुआ एकनाथ शिंदे का प्रभाव

शिवसेना से अलग होने के बाद एकनाथ शिंदे ने मराठी वोटरों में अपनी पकड़ बनाए रखी है। यह बात विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में साबित हो चुकी है। बीएमसी चुनाव में भी वह बेहतर प्रदर्शन करते हुए दिखे हैं। चुनाव नतीजों से साफ लगता है कि शिंदे ने कोर मराठी वोटरों को छिटकने नहीं दिया है। उद्धव एवं राज की युगलबंदी और उनके मराठी कार्ड के बावजूद वह इस समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब रहे हैं। खासकर, ठाणे में अच्छी पकड़ रखने वाले शिंदे का मुंबई के कई इलाकों में अच्छा प्रभाव माना जाता है।

काम नहीं आया मराठी वोटरों को डराकर वोट लेने का दांव

दूसरा, उद्धव ठाकरे का राज के साथ आना मराठी वोटरों को ज्यादा अपील नहीं कर पाया। एमनएनस अपनी शुरुआत के बाद महाराष्ट्र और मुंबई की राजनीति में लागातार कमजोर होती आई है। पिछले बीएमसी चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला। विधानसभा चुनाव में भी वह कोई सीट नहीं जीत पाई। घटे हुए जनाधार वाली एमएनएस के साथ जाना उद्धव का फैसला सही साबित नहीं हुआ। दोनों भाइयों ने साथ आकर एक दांव खेला। वह दांव था कि मुंबई का कोर मराठी वोटर। दोनों भाइयों ने हिंदी थोपे जाने और मुंबई के छीने जाने का डर दिखाकर मराठी वोटरों को अपने साथ लाने की जी-तोड़ कोशिश की। दोनों ने अपना पूरा चुनाव प्रचार कोर मराठी वोटरों पर केंद्रित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि गैर-मराठी वोटर तो इनसे दूर तो हुए ही कोर मराठी वोटरों का पूरा साथ भी इन्हें नहीं मिला।

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बीएमसी में पहली बार होगा भाजपा का मेयर। तस्वीर-PTI

फायदा से ज्यादा नुकसान कर गए राज ठाकरे?

जानकार मानते हैं कि उद्धव यदि कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े होते तो नतीजा कुछ दूसरा हो सकता था। मुंबई में कांग्रेस का अच्छा प्रभाव है। कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने पर उन्हें मुस्लिम वोटरों का वोट भी मिल सकता था लेकिन कांग्रेस, शरद पवार की राकांपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बजाय उन्होंने कमजोर हो पड़ चुकी एमएनएस का साथ चुना। एमएनएस के साथ जाना उद्धव ठाकरे की रणनीतिक गलती है। राज का साथ फायद पहुंचाने की जगह उन्हें नुकसान कर गया। इस हार के साथ बीएमसी पर से उनके दबदबे का अंत हो गया और इस तरह उनका आखिरी किला भी ढह गया। भाजपा अब पहली बार बीएमसी में अपना मेयर बनाएगी। इस जीत के साथ उसका दशकों का सपना साकार हुआ है।

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