हरियाणा चुनाव: सोनिया के सहारे फिर खड़ी हुई कांग्रेस, तंवर के पार्टी छोड़ने का मिला फायदा 

सोनिया गांधी के दोबारा कांग्रेस की कमान संभालने के बाद रेंगती दिख रही कांग्रेस हरियाणा और महाराष्ट्र में उठ खड़ी हुई है। जानिए किन बातों का मिला कांग्रेस को फायदा।

Bhupinder Hooda Sonia Gandhi
Bhupinder Hooda Sonia Gandhi 

नई दिल्ली: हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी भले ही जीत दर्ज नहीं कर सकी लेकिन दोनों ही राज्यों के परिणाम कांग्रेस पार्टी के लिए संजावनी बूटी से कम नहीं हैं। राहुल गांधी की अध्यक्षता में लोक सभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के बाद ऐसा लग रहा था कि पीएम मोदी एक बार फिर कांग्रेस मु्क्त भारत के अपने सपने को पूरा करने के करीब पहुंच गए हैं। इसके बाद राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस पार्टी एक नई परेशानी में फंसती दिख रही थी। ऐसे में सोनिया गांधी ने बीमार होने के बावजूद एक बार फिर अध्यक्ष का पद संभाला और पार्टी को एक बार फिर से पटरी पर लौटाने में सफल हुईं। 

एक तरह से कहा जाए तो राहुल गांधी के गुस्से ने भी नेताओं को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर कर दिया था। इसके बाद अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोगों में जोश भरकर नए सिरे से विधानसभा चुनाव की तैयारी करने का फरमान जारी कर दिया। ऐसे में उन्होंने अपने पुराने सिपहसलारों पर भरोसा जताते हुए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलेजा के हाथों में विधानसभा चुनाव की कमान सौंप दी। 

सोनिया गांधी के इस निर्णय के बाद हुड्डा के धुर विरोधी माने जाने वाले अशोक तंवर ने आनन-फानन में भाजपा का दामन थाम लिया। कांग्रेस पार्टी के लिए इसे एक बड़ा झटका माना जा रहा था। हरियाणा राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले लोगों का कहना था कि कांग्रेस के वोट बैंक में तंवर सेंध लगाने में कामयाब रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तंवर के जाने से पार्टी में पनप रही गुटबाजी खत्म हो गई और एक नेता के निर्देश के अनुरूप काम करना भा पार्टी वर्कर्स के लिए आसान रहा।

कुमारी शैलेजा और हुड्डा की जोड़ी जाट और दलित वोटरों को अपने पाले में करने में सफल रही। जाट वोटरों ने अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार कांग्रेस और जेजेपी के प्रत्याशियों में से किसी एक का चुनाव कर उसके पक्ष में वोट डाला और दलित वोटरों ने भी कांग्रेस के पक्ष में वोट किया। जिसका फायदा कांग्रेस को मिला और वो 31 सीट हथियाने में सफल हुई। 

गैर जाट और दलित वोटरों के सहारे ही पिछली बार भाजपा सत्ता पर काबिज हुई थी। ऐसे में यही वोटर इस बार उसके 47 से 40 सीट पर समेटने का मुख्य कारण रहे। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की वजह से गैरजाट वोट भाजपा के साथ रहा लेकिन जाट वोटरों का लामबंद होना पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन गया और कांग्रेस अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही। 
 

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