बिहार विधानसभा।
इस बार का विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। करीब 35 सालों से हावी रहे मंडल केंद्रित राजनीतिक समीकरण चरमराए और वह जाति वर्ग जो सीधे तौर पर सत्ता से दूर था उसकी वापसी हुई। दरअसल, बीते लगभग 35 वर्षों में बिहार में सत्ता के केंद्र में OBC-EBCसमुदाय रहे। इस काल में सवर्ण जातियों जिनमें भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ शामिल थे, सत्ता में उनकी हिस्सेदारी प्रत्यक्ष तौर पर काफी सीमित रही। लेकिन इस बार हुए विधानसभा चुनाव में यह सवर्ण वर्ग राजनीतिक केन्द्र में लौटता दिखा।
बिहार में लंबे समय से पिछड़े वर्ग भले ही सत्ता के केंद्र में था, लेकिन साल 2005 में जब नीतीश कुमार बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में आए तब से यह स्थितियां कुछ हद तक बदलनी शुरू हुईं। उस समय आम जनमानस में भले ही यह बात आम थी कि भले ही सीएम पद पर कुर्मी समाज से आने वाला व्यक्ति बैठा है, लेकिन सरकार और सिस्टम पर सवर्ण समुदाय की पकड़ मजबूत है। इसका कारण यह था कि उस दौर में नीतीश कुमार पर ललन सिंह का काफी प्रभाव था। इसके अलावा, विजय चौधरी का पार्टी नेतृत्व तक पहुंचना और DGPअभयानंद के नेतृत्व में राज्य की कानून–व्यवस्था में सुधार ने सवर्णों की भूमिका को मजबूती दी। उस समय से धीरे-धीरे लोगों में यह समझ पुख्ता हुई कि 'नीतीश राज' में सवर्णों की पकड़ सबसे सुसंगत और प्रभावशाली है।
इस साल हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों ने सवर्ण वर्ग के लिए काफी कुछ साफ कर दिया है। इस बार के नतीजों के जो दो बड़े निष्कर्ष निकले उन्होंने साफ कर दिया कि
वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज का उदय भी बड़ा टर्निंग प्वाइंट रहा। प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक पारी ने सवर्ण, खासकर ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं को नया विकल्प दिया। इसी का नतीजा यह रहा कि भाजपा और जदयू को अपने सवर्ण उम्मीदवारों की संख्या बढ़ानी पड़ी।
इस बार के विधानसभा चुनावों में एनडीए ने अपने उम्मीदवारों में लगभग 35% सवर्ण उम्मीदवार उतारे थे। इनमें भाजपा ने सबसे ज्यादा 49 सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इसके बाद जदयू ने 22, एलजेपी (रामविलास) ने 12, जीतनराम मांझी के नेतृत्व वाली हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पार्टी ने दो और आरएलएसपी ने भी दो सवर्ण उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था।
वहीं, महागठबंधन ने भी पहली बार बड़े पैमाने पर सवर्ण उम्मीदवार उतारे थे। इनमें RJD की रणनीति सबसे उल्लेखनीय रही।
2025 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक रूप से सवर्ण वर्ग के विधायकों की संख्या बढ़ी है। इस बार 73 सवर्ण विधायक जीते हैं। इनमें से 32 राजपूत,25भूमिहार, 14 ब्राह्मण, 2 कायस्थ हैं। सवर्ण वर्ग से आने वाले विधायकों की यह संख्या विधानसभा की 30% सीटों के बराबर है।
वहीं, सरकार गठन में भी 26 मंत्रियों में आठ सवर्ण मंत्री बने। यह संख्या लगभग एक तिहाई है। मंडल राजनीति के बीच सवर्ण राजनीति ने मजबूती से वापसी की है।राजनीतिक दलों के लिए सवर्ण वोट और नेतृत्व अब अनदेखा करना असंभव हो गया है। तीन दशक से ज्यादा समय बाद बिहार की राजनीति में जातीय बैलेंस पहली बार इतनी स्पष्ट रूप से बदला है।
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