क्या पंजाब चुनाव में रंग दिखा पाएगी BSP-SAD की युगलबंदी, पुराने प्रदर्शन की बदौलत करीब आए दोनों दल  

पंजाब में 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए शिरोमणि अकाली दल और बसपा ने गठबंधन किया है। BSP-SAD अलायंस का चुनाव में कैसा प्रदर्शन रहने वाला है, इस पर सबकी नजरें रहेंगी।

Will BSP-SAD alliance make any difference in Punjab assembly elections
पुराने प्रदर्शन की बदौलत करीब आए शिअद और बसपा।  |  तस्वीर साभार: ANI

मुख्य बातें

  • इस बार विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ेंगे शिअद और बसपा
  • पंजाब में दलितों की आबादी अच्छी-खासी करीब 32 प्रतिशत है
  • साल 1996 का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ चुके हैं दोनों दल

नई दिल्ली : पंजाब में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। चुनाव को लेकर पंजाब में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है। वर्षों तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने इस बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन किया है। विधानसभा की 117 सीटों पर शिअद और बसपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। दरअसल, नए कृषि कानूनों पर भाजपा से अलग हुआ शिअद चुनाव में बसपा के सहारे सत्ता तक पहुंचना चाहता है। 

पंजाब से ही थे बसपा के जनक कांशीराम
बसपा राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ती आई है लेकिन मायावती की इस पार्टी ने अपने प्रदर्शन से राज्य की राजनीति पर प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाई है। साल 1997 के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत 13.28 प्रतिशत था। राज्य में दलितों की आबादी करीब 32 प्रतिशत है। इस राज्य में दलितों की सबसे ज्यादा आबादी बताया जाता है। बसपा के संस्थापक कांशीराम भी इसी राज्य से थे लेकिन उनके निधन के बाद बसपा दिनोंदिन कमजोर होती गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में दलितों का वोट बैंक बंटा हुआ है, वे किसी एक पार्टी को वोट नहीं करते। बसपा के साथ गठबंधन कर शिअद ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ और पहुंच दोनों मजबूत करना चाहता है।

बसपा का वोट प्रतिशत

  1. 2017- 1.59 प्रतिशत वोट
  2. 2012-4.3 प्रतिशत वोट
  3. 2007-4.17 फीसदी वोट
  4. 2002- 6.61 प्रतिशत वोट
  5. 1997-13.28 फीसदी वोट

लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़े हैं बसपा-शिअद 
साल 1996 के लोकसभा चुनाव में शिअद ने बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में शिअद को 13 सीटों में से 11 सीटों पर जीत मिली थी। शिअद ने नौ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें से आठ सीटों पर उसे जीत मिली जबकि बसपा ने चार सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसके खाते में तीन सीटें आईं। गत शनिवार को शिअद-बसपा गठबंधन के बारे में घोषणा करते हुए सुखबीर बादल और बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने 1996 की सफलता का जिक्र किया। शिअद के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि नए कृषि कानूनों के मुद्दे पर भाजपा से अलग होने के बाद पार्टी ने विधानसभा चुनाव के लिए बसपा के साथ गठबंधन करने की संभावनाओं पर काम करना शुरू किया।

कई सीटों पर है बसपा का अच्छा-खासा प्रभाव
रिपोर्टों के मुताबिक शिअद नेता का कहना है कि बसपा से गठबंधन करने के बारे में पार्टी ने राज्य में सर्वे कराया और पार्टी के नेताओं से राय ली। सर्वे और राय दोनों को देखने के बाद शिअद ने बसपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया। शिअद नेता का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कम से कम 20 सीटें ऐसी रहीं जहां पार्टी के उम्मीदवार 1000 से कम वोटों से हार गए। इन सीटों पर बसपा के समर्थकों की संख्या 2500 से 10,000 के बीच है। नेता ने कहा कि 2017 के चुनाव में यदि बसपा के साथ गठबंधन होता नतीजे कुछ दूसरे होते। कम से कम शिअद एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरा होता। पिछले चुनाव में शिअद को 15 सीटों पर जीत मिली।


 

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