जानिए-कर्नाटक में भाजपा के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं येदियुरप्पा?

देश
Updated Jul 27, 2019 | 13:50 IST | मनोज यादव

Karnataka politics and BS Yediyurappa : दक्षिण के राज्यों में भाजपा की उपस्थिति लगभग न के बराबर है। अब कर्नाटक में सरकार बनने के बाद एक बार फिर से यह दक्षिण के राज्यों में सरकार बनाने के लिए रास्ते बनेंगे।

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कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिरने पर भाजपा को सरकार बनाने का मिला मौका।  |  तस्वीर साभार: PTI

मुख्य बातें

  • जुलाई के पहले सप्ताह से कर्नाटक में जारी था सियासी उथल-पुथल
  • मई 2018 में कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर बनाई थी सरकार
  • कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों के इस्तीफे के बाद उभरा सियासी संकट

2014 के बाद से देश में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी का चेहरा रहे हैं। लेकिन मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान कर्नाटक की राजनीति में अच्छी खासी पकड़ रखने वाले बीएस येदियुरप्पा को भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया गया। इससे यह साबित होता है कि कर्नाटक की राजनीति के लिए येदियुरप्पा भाजपा के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं? 

लिंगायतों पर येदियुरप्पा की गहरी पकड़
कर्नाटक की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले लिंगायतों का बीएस येदियुरप्पा को भरपूर समर्थन मिलता है। बीएस येदियुरप्पा ने भाजपा छोड़कर 'कर्नाटक जनता पक्ष' नामक पार्टी की गठन किया था, लेकिन 2014 के आम चुनावों से पूर्व उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय काफी मजबूत जाति मानी जाती है। राज्य में इनकी हिस्सेदारी 21 प्रतिशत के आसपास है। इस जाति पर येदियुरप्पा की गहरी पकड़ मानी जाती है।  

2008 में पहली बार दक्षिण भारत के किसी राज्य में भाजपा का कमल खिला और बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए। लेकिन 2011 में येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे उसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन यह आरोप सिद्ध नहीं हो पाए और 2016 में वे दोषमुक्त हो गए। उसके बाद येदियुरप्पा ने भाजपा छोड़कर खुद की 'पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष' बना ली। वे साल 2007 में जद (एस) के साथ गठबंधन टूटने से पहले भी थोड़े समय के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे।

2016 में बनाये गए कर्नाटक में भाजपा के अध्यक्ष
2016 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीद्वार घोषित करके 2018 में कर्नाटक विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी 104 सीटें जीत पाई और बहुमत से आठ सीटें कम रह गयीं। 19 मई 2018 को मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने विश्वास मत का सामना किये बिना ही इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। 

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2008 में 'ऑपरेशन लोटस' के तहत बनाई सरकार 
2008 में येदियुरप्पा ने बहुमत के साथ राज्य में सत्ता संभाली, लेकिन उस दौरान उनके सामने कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। येदियुरप्पा को बागी और निर्दलीय विधायकों के समर्थन वापस लेने के कारण दो बार विश्वास मत हासिल करना पड़ा। 'ऑपरेशन लोटस' के तहत येदियुरप्पा ने राज्य में जीत हासिल की थी। लेकिन पिछले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा और येदियुरप्पा के अलग होने के कारण दोनों की ताकत घट गई और राज्य में कांग्रेस को जीत हासिल हुई।

विवादों से रहा है पुराना नाता
येदियुरप्पा का विवादों से पुराना नाता है। खनन घोटोले को लेकर उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। साल 2010 में उन पर बेटों को जमीन आवंटित करने के लिए पद के दुरुपयोग का भी आरोप लगा। हालांकि, बाद में उन्हें विवादित मामलों में न्यायालय से राहत मिल गई।

76 वर्षीय येदियुरप्पा पर नहीं लागू होता है नियम   
भारतीय जनता पार्टी 75 साल से ऊपर के नेताओं को अक्सर मार्ग दर्शक मंडल का सदस्य बना देती है। लेकिन यह नियम येदियुरप्पा पर लागू नहीं होता है। नियम बनते ही हैं तोड़ने के लिए और राजनीति में अक्सर अपवाद भी देखने को मिलता है। बीएस येदियुरप्पा जिनकी उम्र 76 वर्ष हैं वो कर्नाटक की जिम्मेदारी को संभालने वाले हैं और इस दिशा की तरफ उन्होंने कदम उसी वक्त बढ़ा दिया था जब कुमारस्वामी सरकार अपना बहुमत साबित नहीं कर पाई थी। 

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गिरने के हफ्ते भर के अंदर सरकार बनने की प्रक्रिया तेज 
सप्ताह की शुरुआत में सरकार गिरती है और सप्ताहांत तक नई सरकार के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मौजूदा हालात का जिक्र पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ किया और बाद में उन्होंने येदियुरप्पा के नाम को मंजूरी दे दी कि वह राज्य का कार्यभार संभालेंगे। राजनीतिक दृष्टि से कर्नाटक भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण राज्य है। यहां सरकार बनने के बाद भाजपा के लिए दक्षिण में सरकार बनाने के रास्ते खुलेंगे। दक्षिण के राज्यों में भाजपा की उपस्थिति अभी न के बराबर थी। इसलिए येदियुरप्पा भाजपा के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं। 

(डिस्क्लेमर : मनोज यादव अतिथि लेखक हैं और ये इनके निजी विचार हैं। टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)
 


 

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