तीन तलाक बिल पर मोदी सरकार के साथ नहीं है जदयू, क्या बढ़ेंगी तल्खियां ? 

देश
Updated Jul 30, 2019 | 10:55 IST | मनोज यादव

भाजपा के सहयोग से बिहार में सरकार चला रहे नीतीश कुमार खुद को सेक्यूलर साबित करने के लिए तीन तलाक बिल पर केंद्र का समर्थन नहीं कर रहे हैं। इससे यह साफ हो रहा है कि आने वाले समय में दोनों दलों के बीच तल्खियां बढ़

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राज्यसभा में तीन तलाक बिल होगा पेश 
मुख्य बातें
  • लोकसभा से पारित होने के बाद तीन तलाक बिल राज्य सभा में होगा पेश
  • लोकसभा में विरोध के बाद जेडीयू ने राज्यसभा में भी विरोध करने का किया फैसला
  • राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर सरकार के समर्थन में बीजू जनता दल

तीन तलाक बिल आज राज्यसभा में पेश किया जाएगा। सरकार ने इसे सदन की कार्यसूची में डाल दिया है। सत्ताधारी पार्टी की तरफ से अपने सांसदों की सदन में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए व्हिप भी जारी कर दिया है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि सरकार तीन तलाक बिल को पास करवाने के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध है। इससे पहले यह बिल लोकसभा में पास हो चुका है। 

तीन तलाक बिल पर सरकार के साथ नहीं हैं नीतीश कुमार
इसके पूर्व सूचना का अधिकार बिल (संशोधन) राज्यसभा में भारी बहुमत से पास हो चुका है। इसके बाद सरकार की कोशिश रहेगी कि तीन तलाक बिल को भी भारी बहुमत से पारित करवाया जाए। राज्यसभा में सरकार के पास अभी भी स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसके अलावा केंद्र से लेकर बिहार तक सरकार की सहयोगी पार्टी जदयू ने इस बिल का विरोध किया है। जदयू का कहना है कि सरकार इस बिल को संशोधित करके ले आए तभी हम साथ दे सकते हैं। लेकिन विपक्षी दलों में आपसी तालमेल का अभाव है। विपक्षी दलों में एकमत नहीं होने से सरकार को इस बात का भरोसा है कि वह राज्यसभा में भी इसे पास कराने में कामयाब हो जाएगी। 

भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने वाली पार्टी सेक्यूलर कैसे हो सकती है? 
केंद्र में सरकार का समर्थन करने वाली और बिहार में भाजपा के समर्थन पर टिकी जनता दल यूनाइटेड को इतनी ताकत कहां से मिल रही है कि वह तीन तलाक बिल पर सरकार के साथ नहीं रहने का ऐलान कर चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के बल पर राज्य में सरकार चला पा रहे हैं। अगर भारतीय जनता पार्टी उनसे समर्थन वापस ले ले तो उनकी सरकार तुरंत गिर जाएगी। लेकिन खुद को सेक्यूलर बताने वाले नीतीश कुमार तीन तलाक बिल पर सरकार का साथ नहीं दे रहे हैं। अब सवाल यह है कि इस बिल का नीतीश कुमार के समर्थन नहीं करने से तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। सरकार किसी न किसी तरह से इस बिल को पास करवाने में कामयाब हो जाएगी, क्योंकि इसके लिए सरकार अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुकी है। नीतीश कुमार इस बिल का समर्थन न करके खुद को सेक्यूलर बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन वह एक ऐसी पार्टी के सहयोगी हैं, जिसकी छवि सांप्रदायिक है। अगर वो इतने सेक्यूलर हैं तो भाजपा के सहयोग से उन्हें सरकार ही नहीं चलानी चाहिए। 


क्या नीतीश भाजपा से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हैं? 

क्या नीतीश कुमार भाजपा के साथ दो-दो हाथ करने की जहमत उठाने के लिए तैयार हैं? अगर हाल के दिनों की घटनाओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कम से कम बिहार में तो वह अपनी सहयोगी पार्टी को बख्शने वाले नहीं लगते हैं। अबकी बार केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद भाजपा को नीतीश कुमार की बहुत अधिक जरूरत नहीं लगती है। नीतीश कुमार को केंद्र सरकार ने यह संकेत भी दे दिया है। उनकी पार्टी के किसी सांसद को मंत्रिमंडल में जब जगह नहीं मिली तो दिल्ली में नीतीश कुमार ने तो नाराजगी जाहिर नहीं की, लेकिन बिहार पहुंचने के बाद आनन-फानन में उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का जब विस्तार किया तो उसमें भाजपा के किसी विधायक को जगह नहीं दी। इससे यह साफ हो गया कि नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार के कदम का बदला लिया। उसके बाद बिहार में इन्सेफ्लाइटिस से हो रही मासूमों की मौत पर जब सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा तो नीतीश कुमार ने स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय को इस्तीफा देने के लिए कहा लेकिन भाजपा ने इस बात से इनकार कर दिया। 


नीतीश और भाजपा के बीच बढ़ेंगी अंदरूनी तौर पर तल्खियां

भारतीय जनता पार्टी को अब नीतीश कुमार की बहुत ज्यादा जरूरत भी नहीं है। केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार है और थोड़े दिनों बाद राज्यसभा में भी सरकार के पास स्पष्ट बहुमत होने की उम्मीद की जा रही है। इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की कोशिश है कि अगली बार वह बिहार में अकेले दम पर सरकार बनाने की कोशिश करे, क्योंकि उत्तर भारत में केवल बिहार ही ऐसा राज्य है जहां पर भाजपा अभी तक अकेले दम पर सरकार बनाने में असर्थ रही है। इसलिए आरएसएस की तरफ से यह प्रयास किया जा रहा है कि अगली बार बिहार में भाजपा अकेले दम पर अपनी सरकार बनाये। इससे यह साफ होने लगा है कि नीतीश कुमार और भाजपा के बीच अंदरूनी तौर पर तल्खियां बढ़ेंगी।    
(डिस्क्लेमर : मनोज यादव अतिथि लेखक हैं और ये इनके निजी विचार हैं। टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)

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