Bharatiya Janata Party: दिल्ली बीजेपी में सन्नाटे से क्या निकलेगा समाधान? 

BJP Delhi elections Aam Aadmi Party Arvind Kejriwal:दिल्ली चुनाव के बाद बीजेपी में सन्नाटा है लेकिन एक सवाल यह भी है कि AAP को मात देने के लिए क्या बीजेपी अगले चुनाव तक कोई ताकतवर चेहरा ढूंढ पाएगी।

Prime Minister Narendra Modi, Home Minister Amit Shah
दिल्ली में करारी हार के बाद बीजेपी में वो हुआ जो आज तक नहीं हुआ।  |  तस्वीर साभार: AP

ओम तिवारी

बीजेपी में इतना सन्नाटा क्यों है? मनोज तिवारी, परवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा जैसे बयानवीर अचानक खामोश हो गए हैं। क्या एक के बाद एक हार से बीजेपी में आत्मचिंतन का दौर शुरू हो गया है? क्या बीजेपी ने ये समझ लिया है कि नफरत वाले बयानों से पार्टी को फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है? 

दिल्ली में करारी हार के बाद बीजेपी में वो हुआ जो आज तक नहीं हुआ। सबसे पहले बीजेपी के ‘चाणक्य’ अमित शाह ने खुद ये मान लिया कि पार्टी नेताओं के अनाप-शनाप बयान से बड़ा नुकसान हो गया। दिल्ली चुनाव से पहले जिस तरह से बीजेपी आक्रामक हो गई थी। ‘गोली मारो’ से लेकर ‘शाहीन बाग के रेपिस्ट’ जैसे बयान आ रहे थे। कई जानकारों को लग रहा था कि बीजेपी कम से कम 15-20 सीटें आराम से निकाल ले जाएगी। लेकिन जनता का मूड तो कुछ और ही था। हकीकत सामने आया तो सारे विश्लेषण भी बदल गए। 

राजधानी में पीएम मोदी का जादू नहीं चला 

2014 में पूरे देश में मोदी लहर चली। केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनी। लेकिन 7-8 महीने बाद दिल्ली के चुनाव में बाजी पलट गई। इसके बाद 2019 में मोदी प्रचंड बहुमत के साथ सरकार में लौटे। पूरे देश में जीत का डंका बजाया। दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों पर बीजेपी ही जीती। लेकिन 7-8 महीने में हवा का रुख बदल गया। विधानसभा चुनाव में बीजेपी फिर मात खा गई। साफ है जनता सब जानती है। किसे पीएम बनाना है, किसे सीएम बनाना है ये कोई लहर नहीं, जनता तय करती है। 

विकासवाद के सामने राष्ट्रवाद फेल हो गया 

जैसे-जैसे दिल्ली चुनाव की तारीख सामने आई, राष्ट्रवाद ने जोर पकड़ लिया। शाहीन बाग के एक कोने से ऐसी आंधी चलाने की कोशिश हुई कि केजरीवाल की सरकार तिनकों की तरह उड़ जाए। अमित शाह से लेकर योगी आदित्यनाथ तक सभी मैदान में कूद पड़े। दूसरी कतार के नेताओं ने तो सारी हदें पार कर दी। लेकिन राष्ट्रवाद का ये नारा बीजेपी के काम नहीं आया। केजरीवाल का विकासवाद विजयी हो गया। 
 
हिंदू-मुसलमान की राजनीति मुंह के बल गिरी 

दिल्ली के चुनाव में हिंदूवाद बीजेपी का आखिरी हथियार था। जो नतीजे सामने आए वो 2015 से बेहतर तो थे लेकिन ज्यादा अलग नहीं थे। जहां 2015 में बीजेपी का वोट प्रतिशत 32.7 रहा, 2020 में इसआंकड़े में महज करीब 6% का सुधार हुआ। बीजेपी का वोट प्रतिशत इस बार 38.5 रहा और पार्टी ने पिछले बार के मुकाबले 5 ज्यादा सीटें हासिल की। लेकिन दोनों बार ये साबित हुआ कि आम आदमी पार्टी ने सारे बीजेपी-विरोधी वोट मार लिए। दिल्ली में करीब 12.8% मुसलमान हैं। जाहिर है मुसलमानों का सारा वोट कांग्रेस से खिसककर AAP के खाते में गया। लेकिन केजरीवाल की पार्टी को हासिल 53.61% वोट शेयर में इससे कहीं ज्यादा हिंदू वोट शामिल थे। बावजूद इसके कि बीजेपी के नेताओं ने हिंदू-मुसलमान की राजनीति में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 

जाति और प्रांत का फॉर्मूला भी काम नहीं आया 

2015 में जब दूसरी बार AAP की सरकारबनी तो ज्यादातर जानकारों की राय थी कि दिल्ली में बिहार और यूपी से आए बाहरी लोगों ने केजरीवाल को जिताया। राजधानी के करीब 1.46 करोड़ मतदाताओं में से 40 लाख पूर्वांचल के लोग हैं। बीजेपी ने सीधा हिसाब लगाया अगर दिल्ली में पूर्वांचल का कोई चेहरा पार्टी का नेतृत्व संभाल ले तो बाजी पलट सकती है। इसलिए पूर्वांचल के साथ-साथ पहाड़ी लोगों में भी मशहूर गायक मनोज तिवारी को बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। मनोज तिवारी ओवरकांफिडेंस दिखे और खूब बजरंगबली की भक्ति भी करते नजर आए। लेकिन ये नुस्खा भी बीजेपी के काम नहीं आया। 

दिल्ली में अब बीजेपी के पास क्या रास्ता है? 

1998 से लेकर अब तक 21 साल बीत चुके हैं। राजधानी में बीजेपी की आखिरी मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज थीं। प्याज के मुद्दे पर सरकार छिनने के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकी। पहले शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने तीन पारियां खेली। फिर करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन को छोड़ दें। तो लगातार केजरीवाल की सरकार बनी है। सवाल ये है क्या  राजधानी की सत्ता में सेंध लगाने के लिए बीजेपी की रणनीति में बदलाव का वक्त आ गया है?  
 
विकास के अलावा कोई विकल्प नहीं 

बीजेपी की नींव हिंदूवाद और राष्ट्रवाद से पड़ी। अयोध्या आंदोलन ने पार्टी को नई ताकत दी तो सत्ता भी मिली, लेकिन गठबंधन के सहारे। फिर गुजरात के विकास का मॉडल दिखा कर नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र की बागडोर संभाली। और दोबारा अपने दम पर सरकार बनाने की ताकत मिली तो सिर्फ और सिर्फ विकास का मंत्र ही काम आया। 

सवाल ये है कि जब बीजेपी के पास सत्ता नहीं है तो दिल्ली का विकास कैसे कर सकती है? इसका जवाब है MCD। पिछले चार बार से MCD पर बीजेपी का राज है। 2017 के MCD चुनाव में टक्कर AAP से था। लेकिन पार्टी ने सारे नए चेहरे पर दांव लगाया और इसका फायदा भी हुआ। AAP को बुरी तरह पछाड़ कर बीजेपी फिर से MCD पर काबिज हो गई।  

अगर AAP की सरकार ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प कर दिया तो राजधानी के प्राइमरी स्कूलों की देखरेख MCD के हाथों में होती है। बीजेपी यहां कमाल कर सकती है, इन स्कूलों की हालत सुधार कर अपनी इमेज बना सकती है। अगर मोहल्ला क्लीनिक के बूते केजरीवाल सरकार सत्ता में लौट सकती है, तो दिल्ली की छोटी-छोटी डिस्पेंसरी और छोटे हॉस्पीटल MCD की निगरानी में आती है। इनकी तस्वीर दुरुस्त कर बीजेपी मिसाल पेश कर सकती है। 

इसके अलावा पानी की सप्लाई, ड्रेनेज सिस्टम, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, पार्क, पार्किंग एरिया, सड़कों की साफ सफाई, स्ट्रीट लाइट की देखरेख, सड़कों और पुलों को मेंनटेनेंस, पब्लिक टॉयलेट की साफ-सफाई ये सब MCD के दायरे में आते हैं। प्रदूषण की बात आती है तो केजरीवाल सरकार ठीकरा पड़ोसी राज्यों और MCD के सिर पर फोड़कर पल्ले झाड़ लेती है। यानि मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली फिर भी बीजेपी MCD के जरिए दिल्ली की दिल जीत सकती है। फिर विकास के इसी मंत्र से दिल्ली के अगले चुनाव में बीजेपी की दावेदारी दोगुनी हो सकती है। 

केन्द्र सरकार खुलकर दिल्ली के विकास में शामिल हो 

दिल्ली के चुनाव नजदीक आए तो बीजेपी ने केजरीवाल सरकार की तर्ज पर कई वादे किए। ज्यादातर वादे ऐसे थे जिनका खुद पार्टी पूरे पांच साल तक विरोध करती रही। केजरीवाल की ‘फ्री स्कीम’ की पार्टी ने हमेशा आलोचना की। लेकिन मेनिफेस्टो सामने आया तो बीजेपी बिजली-पानी जैसे ज्यादातर मुद्दों पर ‘फ्री स्कीम’ में AAP से होड़ लगा रही थी। पीएम मोदी ने खुद झुग्गी झोपड़ियों की जगह पक्का घर बनवाने का ऐलान कर दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जनता के पास केजरीवाल पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं था।  

अब बीजेपी को बिना वक्त गंवाए आगे की रणनीति बनानी चाहिए। केजरीवाल से आगे बढ़कर दिल्ली में जो भी बदलाव केन्द्र सरकार के दायर में मुमकिन है उन्हें पूरा करना चाहिए। चाहे वोकॉलोनी को नियमित करने का वादा हो या झुग्गी झोपड़ी की जगह पक्का मकान देने का वादा। बीजेपी अगर जनता के लिए काम करेगी। तो जनता अपना कर्ज जरूर लौटाएगी। 

 केजरीवाल की टक्कर का चेहरा कौन?

दिल्ली में बीजेपी की ये परेशानी कोई नई नहीं है। राजधानी में बीजेपी की पहली सरकार राम मंदिर आंदोलन के बाद बने माहौल में (1993) बनी तो दारोमदार मदन लाल खुराना पर आई। लेकिन तीन साल बाद ही उन्हें हवाला कांड की वजह से पद छोड़ना पड़ा और साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के सीएम बने।पार्टी में संतुलन बनाए रखने के लिए खुराना को दिल्ली प्रदेश का बीजेपी अध्यक्ष बना दिया गया। लेकिन गुटबाजी तब और बढ़ गई जब खुराना को एक साल बाद हवाला कांड में क्लीन चिट मिल गई और उन्होंने पार्टी आलाकमान पर सीएम की कुर्सी दोबारा देने का दबाव बनाया। साहिब सिंह वर्मा कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए यथास्थिति बनी रही और बीजेपी की अंदरूनी कलह बढ़ती रही। फिर अगले चुनाव से ठीक दो महीने पहले प्याज के मुद्दे पर फजीहत झेलने के बाद साहिब सिंह वर्मा को कुर्सी छोड़नी पड़ी।  

सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री बनीं लेकिन अपने दम पर पार्टी को दोबारा सत्ता में लौटाने में नाकाम रही। फिर तीन बार लगातार सीएम बनने वाली कांग्रेस की शीला दीक्षित ने बीजेपी को कोई मौका नहीं दिया। इस बीच केन्द्र में सत्ता का स्वाद चख चुकी बीजेपी दिल्ली में पार्टी की अंदरूनी राजनीति पर काबू करने में असफल रही। नतीजा ये रहा कि राजधानी में बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं था जिसके नाम पर चुनाव जीता जा सके। कांग्रेस का सारा वोट अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले केजरीवाल की पार्टी ले गई। पिछली बार 2015 में पार्टी ने दिल्ली की पूर्व आईपीएस किरण बेदी को आगे कर दांव खेला तो इस बार पूर्वांचल के चेहरे मनोज तिवारी राजधानी में पार्टी की कमान संभालकर किस्मत आजमा रहे थे। साहिब सिंह वर्मा के बेटे परवेश वर्मा जैसे नए चेहरों में आक्रमकता तो खूब दिखती है लेकिन वो दमखम नहीं है जो पार्टी का भविष्य संवार सके। 

इसलिए दिल्ली में बीजेपी की ये चुनौती सबसे बड़ी है। पहली चुनौती पार्टी को दिल्ली में पुनर्गठित करना और दूसरी चुनौती जमीन और सीधे लोगों से जुड़े चेहरों को आगे करना। क्योंकि अगर विकास के दम पर आगे की पारी खेलनी है तो खिलाड़ी भी ऐसे ही होने चाहिए। बीजेपी का अगला चेहरा किसी खास जाति या समाज से जुड़ा नेता नहीं, एमसीडी या स्थानीय स्तर पर कुछ बदलाव कर चुका कोई शख्स होना चाहिए। 

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)

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