बंद कमरे में होगी खुली चर्चा, यही तो सियासत है

देश
ललित राय
Updated Feb 21, 2020 | 09:30 IST

पीएम नरेंद्र मोदी से उद्धव ठाकरे पहले भी मिलते थे और मिल भी रहे हैं, पहले अगल बगल बैठते थे और अब बैठने की दिशा बदल गई है। पहले असहमति पर सहमति भारी पड़ती थी। लेकिन अब तो दोनों के खाते में सिर्फ असहमति है।

बंद कमरे में होगी खुली चर्चा, नरेंद्र मोदी से मिलेंगे उद्धव ठाकरे
महाराष्ट्र के सीएम हैं उद्धव ठाकरे 

मुख्य बातें

  • ढाई ढाई साल सीएम पद के मुद्दे पर बीजेपी और शिवसेना का रिश्ता टूट गया था
  • शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी की सरकार चला रही है
  • सीएए, एनपीआर जैसे मुद्दों पर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस में आपसी सहमति नहीं

नई दिल्ली। शिवसेना के झंडे का रंग तो वही है। लेकिन जिस 'कमल' के साथ उसका 25 साल पुराना नाता था वो कुर्सी के लिए टूट गया। यह सवाल वाजिब है कि क्या कुर्सी की लड़ाई में विचाराधारा को त्याग देना चाहिए तो जवाब 50-50 है। राज करने की नीति ही यह कहती है कि कभी कुछ स्थाई नहीं होता है यहां तक कि दोस्त, दुश्मन, अपने, पराए और यहां तक कि विचार। अब अगर इसे देखें तो शिवसेना ने गलत क्या किया। उद्धव ठाकरे ने वही किया जो पिछले 70 वर्षों में राजनीति की उजली चद्दर पर काली स्याही से न भूलने वाली इबारतें लिखी गईं। 

सीएम कुर्सी के लिए राह हुई जुदा
शिवसेना को सीएम की कुर्सी चाहिए थी। बकौल उद्धव ठाकरे मुंबई के बंद कमरे में बीजेपी के शाह यानि अमित भाई शाह से बातचीत हो चुकी थी अब बंद कमरे में दो लोगों के बीच क्या बात हुई इसके बारे में तो दीवारें ही बता सकती हैं क्योंकि उन खास लमहों की साक्षी तो वो दीवारें ही थीं। उद्धव ठाकरे और उनके वजीर संजय राउत हर एक दिन कैमरे के सामने, फेसबुक और ट्विटर पर अपने गम, गुस्से का इजहार किया करते थे लेकिन बड़े भाई यानि बीजेपी के नेता भी पीछे नहीं रहते थे। ये बात अलग है चाल, चरित्र की बात करने वाली बीजेपी बंद कमरों की बातों को जगजाहिर नहीं करने की दुहाई देती थी और संस्कार का मुलम्मा चढ़ाती हुई नजर आती थी।  

राज करने की नीति में रिश्ता टूटा
जब शिवसेना के नेता हमलावर होते थे तो बीजेपी संस्कार की दुहाई देने लग जाती थी। लेकिन अलसुबह जिस तरह से लोकतंत्र का हरण हुआ उसे बीजेपी संवैधानिक व्यस्था का हिस्सा बताते हुए खुद को संस्कारी मसीहा होने का दावा करती थी। शिवसेना को एक झटके में महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने की कोशिशों से बाहर कर दिया। लेकिन होइहें वही राम रचि जो राखा को कौन टाल सकता है, उद्धव की किस्मत में सात टापुओं वाली मुंबई का मंत्रालय इंतजार कर रहा था। वो दिन और घड़ी आई जब छोटे भाई लोक सत्ता के मंच पर शपथ ले रहा था और दूर दिल्ली से बड़ा भाई उन दिनों को याद कर रहा था कि कुछ भी हो जाए भाईचारे के रिश्ते पर कुटील चाल की कैंची कभी नहीं चलेगी।

एक बार फिर बंद कमरे में बातचीत
अब तीन महीने के बाद छोटा भाई अपने बड़े भाई यानि नरेंद्र मोदी से मिलने जा रहा है, रंज भी होगा गम भी होगा, खुशी भी होगी उम्मीद भी होगी और एक बार फिर बंद कमरा भी होगा। जिस बंद कमरे की राजनीति को बीजेपी अपने पक्ष में नहीं कर सकी वही बंद कमरा आगे की क्या पटकथा लिखेगा देखने वाली बात होगी क्योंकि भगवा रंग इस दफा एक दूसरे के बगल में नहीं बैठेंगे बल्कि आमने-सामने होंगे। सवाल यह है कि क्या मोदी-शाह की जोड़ी  इतनी आसानी से तीन महीने पुरानी तल्खी को भूल जाएगा। इस सवाल का जवाब आसान और कठिन दोनों है, क्योंकि मायावती-अखिले।, नीतीश- लालू का एक साथ आना नदियों के दो किनारों के मिलने जैसे था तो दूर जाना उस बड़ी लहरों की तरह जो छोटी छोटी लहरों को कभी मिलने नहीं देती हैं।


(प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)

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