आखिर हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने में क्यों है ऐतराज ?

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Updated Sep 17, 2019 | 18:24 IST | बीरेंद्र चौधरी

गृहमंत्री अमित शाह ने एक कार्यक्रम में कहा था कि एक राष्ट्र और एक भाषा की जरूरत है। उनके इस बयान के बाद विरोधी दलों ने खासतौर से क्षेत्रीय दलों ने कहा कि वो हिंदी को थोपने का विरोध करेंगे।

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हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की अपील पर विपक्षी दलों का विरोध 

14 सितंबर 2019, हिन्दी दिवस के अवसर पर भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने ‘एक देश एक भाषा’ की वकालत करते हुए कहा कि पूरे देश की एक भाषा होना बहुत जरूरी है, जो एकता की डोर में बांधे ...विश्व में भारत की पहचान बने। यह काम हिंदी ही कर सकती है। साथ ही अमित शाह ने ट्वीट करते हुए  कहा कि हम अपनी मातृभाषा के प्रयोग को बढाएं, साथ में हिंदी का भी प्रयोग कर देश की एक भाषा के महात्मा गांधी और सरदार पटेल के स्वप्न को साकार करने में योगदान दें।

 इस बयान के बाद भाषा के नाम पर राजनीति शुरू हो गई और इसकी शुरुवात हुई दक्षिण के राज्य तमिलनाडु से.

स्टालिन, ओवैसी, वाइको, ममता और कमल हासन का विरोध

 सबसे पहला विरोध तमिलनाडु से शुरू हुआ। डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन ने कहा कि गृह मंत्री के बयान ने हमें झटका दिया है, इससे देश की एकता पर असर पड़ेगा। हम शाह से बयान वापस लेने की मांग करते हैं। देश में एक भाषा की कोई जरूरत नहीं है।

एमडीएमके अध्यक्ष  वाइको ने धमकी देते हुए  कहा कि भारत में अगर हिंदी थोपी गई, तो देश बंट जाएगा। हमारे पास केवल एक ‘हिंदी इंडिया' होगा।
एआईएमआईएम के अध्यक्ष  असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करते हुए कहा की- हिंदी सभी भारतीयों की मातृभाषा नहीं है। क्या आप कृपया इस देश की विभिन्नता और अलग-अलग मातृभाषाओं की सुंदरता की तारीफ कर सकते हैं। अनुच्छेद 29 हर भारतीय को अलग भाषा, लिपि और संस्कृति का अधिकार देता है। भारत हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व से काफी बड़ा है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि हमें सभी भाषाओं और संस्कृतियों का बराबर सम्मान करना चाहिए। हम भले ही दूसरी भाषाएं सीख लें, लेकिन अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।

अभिनेता से नेता बने मक्कल निधि मैय्यम अध्यक्ष कमल हासन ने एक विडियो जारी कर अमित शाह की 'एक राष्ट्र, एक भाषा' की मांग का विरोध करते हुए धमकी दिया कि अगर इसे बढ़ावा दिया गया तो जल्लीकट्टू विरोध प्रदर्शन से भी बड़ा आंदोलन होगा। एक विडियो जारी कर कमल ने अप्रत्यक्ष रूप से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर हमला करते हुए कहा है कि भारत 1950 में 'अनेकता में एकता' के वादे के साथ गणतंत्र बना था और अब कोई 'शाह, सुल्तान या सम्राट' इससे इनकार नहीं कर सकता है।

तमिलनाडु में हिंदी विरोध
तमिलनाडु में हिन्दी विरोध का एक इतिहास रहा है। तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 में शुरू हुआ । उसके बाद 1963 में जब संसद में राजभाषा विधेयक पेश हुआ, तो तत्कालीन राज्यसभा सांसद और डीएमके नेता अन्नादुरई ने इसका विरोध किया था। जब संसद में राजभाषा विधेयक पास हुआ, तो तत्कालीन मद्रास राज्य की सड़कों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए और मदुरै में दंगा भड़क उठा था। आखिरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को राज्य में हिंदी की अनिवार्यता से अलग त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने की बात कहनी पड़ी थी।
जनगणना 2011 क्या कहता है?


जनगणना 2011 के अनुसार  भारत में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है यानि  भारत में 43.63% लोग हिन्दी बोलते हैं। वहीं दूसरे स्थान पर बांग्ला भाषा यानि 8.03% है, उसके बाद तीसरे स्थान पर मराठी 6.86%, चौथे स्थान पर तेलुगू 6.70 और पांचवें स्थान पर तमिल 5.70 है। उपरोक्त आंकड़े अष्टम सूची में सूचीबद्ध  22 भाषाओं का संकलन है।

आखिर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में क्यों है ऐतराज ?

पहला, भारत में लगभग 44% लोग हिन्दी बोलते हैं जबकि दूसरे स्थान पर बंगला बोलने वाले 8% हैं। सवाल उठता है की यदि हिन्दी को राष्ट्रभाषा न बनाई जाए तो फिर किसी भाषा को ये दर्जा मिले।

दूसरा, सम्पूर्ण भारत में शायद ही कोई राज्य हो जहां हिन्दी न बोली जाती हो भले संख्या जितनी हो। उदाहरण के लिए तमिलनाडू। क्या यह संभव है कि तमिलनाडू में हिन्दी बोलने वाले एक भी न हों।

तीसरा, पूरी दुनियाँ में सबसे ज्यादे संख्या में बोली जाने वाली भाषा चीनी, दूसरे नंबर पर अँग्रेजी और तीसरे नंबर पर  हिन्दी है। सच तो ये है कि भारत और हिन्दी एक दूसरे के प्रयाय बन गए हैं। पूरे विश्व में हिन्दी को हिंदुस्तान की ही भाषा माना जाता है फिर ऐसी स्थिति में हिन्दी को राष्ट्र भाषा क्यों न बनाई जाय।

चौथा, यदि हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा बन जाती है तो क्या भारत की 21 सूचीबद्ध अन्य भाषा को तिलांजलि दे दी जाएगी। क्या ये संभव है? बिलकुल असंभव है।

पांचवां, ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु  में सब के सब हिन्दी विरोधी हैं। बल्कि तमिलनाडु के बहुत सारे पैरेंट्स हैं जो अपने बच्चे को अँग्रेजी और तमिल के साथ साथ हिन्दी पढ़ाना चाहते है क्योंकि उन्हें पता चल गया है कि हिन्दी सीखने से बच्चों को फायदा होता है।

छठा, हम आपको दो उदाहरण देना चाहते हैं। पहला, मैं स्वयं दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ाई  किया हूँ जहां देश के कोने कोने से छात्र पढ़ने आते हैं उसमें तमिलनाडु भी शामिल है। तमिलनाडु के बहुत सारे छात्र शुरू शुरू में हिन्दी बिलकुल नहीं जानते हैं लेकिन साल दो साल में तमिल छात्र हिन्दी बोलना सीख जाते हैं। मैं इसका दर्जनों उदाहरण दे सकता हूँ। दूसरा, मद्रास विश्वविद्यालय में मेरे एक तमिल मित्र प्रोफेसर हैं वो आज भी हिन्दी बोलना तो दूर हिन्दी समझ भी नहीं पाते लेकिन कुछ महीन पूर्व उनसे फोन पर बातचीत हो रही थी उन्होने एकाएक हमसे कहा कि अब आप मेरे पुत्र से बात करिए वो बहुत अच्छी हिन्दी बिलाता है और जब मैं उस बच्चे से हिन्दी में बात करने लगा और हमारी खुशी का अंत नहीं था कि वह बच्चा इतनी हिन्दी कैसे बोलने लगा। जब हमने अपने मित्र से इसका राज पूछा तो उसका जवाब था कि बच्चे के भविष्य के लिए हिन्दी जानना बहुत जरूरी है इसलिए हमने उसे हिन्दी सिखाया है। मेरे प्रोफेसर मित्र का कहना था कि तमिलनाडु हिन्दी विरोध मात्र एक राजनीति का टूल बन कर रह गया है। अर्थात हिन्दी बोलना और लिखना बहुर जरूरी है। माफ करेंगे हम यहाँ अपने मित्र का नाम लिखना उचित नहीं समझते हैं।

सातवां, हमने अपने ट्विटर हैंडल से एक  ट्विटर पोल किया जिसका प्रश्न था कि  क्या हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा होनी चाहिए? परिणाम देखिए: हाँ में 85 % लोगों ने वोट किया है जबकि ना में 15%. कुल मिलकर इस पोल में लगभग 5000 लोगों ने वोट डाला है. 57 लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं , 126 लोगों ने रीट्वीट किया है जबकि 179 लोगों ने लाइक किया है. इसका मतलब यही है कि 85% भारत के लोग हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में देखना चाहते हैं।

अंत में, हम जरूर चाहते है कि हिन्दी भारत की  राष्ट्र भाषा बने लेकिन इसका अर्थ ये कतई नहीं कि अन्य भाषा का विकास न हो। भारत की सभी भाषाएँ भारत का धरोहर था, धरोहर है और धरोहर रहेगा। इसलिए  मेरा मानना है कि हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने में कोई  ऐतराज नहीं होनी चाहिए।

(लेखक बीरेंद्र चौधरी टाइम्स नाउ में न्यूज एडिटर हैं)

(डिस्क्लेमर: इस प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)

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