Mahatma Gandhi: 'बापू' की जिंदगी से जुड़े तमाम रोचक प्रसंग जो आज भी हैं प्रासंगिक

देश
Updated Sep 19, 2019 | 18:37 IST

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को मनाने की तैयारियां चल रही हैं यहां हम आपको उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक प्रसंगों से अवगत करायेंगे जो आज भी प्रासंगिक हैं। 

MAHATAMA GANDHI
महात्मा गांधी की जिंदगी के कई रोचक वाकये ऐसे हैं जो लोगों के लिए आज भी प्रासंगिक हैं 

नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश की आजादी दिलाने में अहम योगदान दिया था, उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था जिसकी वजह से वो आज भी लोगों के दिलों से पर राज करते हैं। बापू ने अपने जीवनकाल में तमाम शिक्षायें दीं जिनको लोग अमल में ला रहे हैं वहीं उनकी जिंदगी से जुड़े तमाम कहे अनकहे प्रसंग हैं जो लोगों के लिए वर्तमान दौर में भी बेहद शिक्षाप्रद हैं। 

'बापू' के नाम से लोगों के दिलों में पर राज करने वाले महात्मा गांधी का अधिकांश जीवन लोगों को शिक्षा देते हुए बीता, उनकी जिंदगी के कई रोचक वाकये ऐसे हैं जो लोगों के लिए आज भी प्रासंगिक हैं जिनसे वो ज्ञान ले सकते हैं। 

एक नजर 'बापू' के ऐसे ही रोचक प्रसंगों पर

1-यह बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी राजकोट में रहते थे जहाँ वो रहते थे वही उनके पड़ोस में एक सफाईकर्मी भी रहता था। एक बार किसी समारोह के मौके पर गाँधी जी को मिठाई बाँटने का काम सौंपा गया, गाँधी जी सबसे पहले मिठाई पड़ोस में रहने वाले सफाईकर्मी को देने लगे। 
जैसे ही गाँधी जी ने उसे मिठाई दी वह गाँधी जी से दूर हटते हुए बोला कि 'मैं अछूत हूँ इसलिए मुझे मत छुएं।' गाँधी जी को यह बहुत खराब लगा और उन्होंने उस सफाई वाले का हाथ पकड़कर मिठाई पकड़ा दी और उससे बोले कि 'हम सब इंसान है, छूत-अछूत कुछ भी नहीं होता।'

2- गांधीजी के एक अनुयायी थे आनंद स्वामी, जो सदा उनके साथ ही रहा करते थे, एक दिन किसी बात को लेकर उनकी एक व्यक्ति से तू-तू, में-में हो गई। वह व्यक्ति कुछ दीन-हीन था, आनंद स्वामी को जब अधिक क्रोध आया तो उन्होंने उसको एक थप्पड़ मार दिया।
गांधीजी को आनंद स्वामी की यह हरकत बुरी लगी, वह बोले, 'यह एक सामान्य-सा व्यक्ति है, इसलिए तुमने इसे थप्पड़ रसीद कर दिया | यदि यह बराबर की टक्कर का होता तो क्या तुम्हारी ऐसी हिम्मत होती ? चलो, अब तुम इससे माफ़ी मांगो।'
जब आनंद स्वामी उस व्यक्ति से माफ़ी माँगने को राजी न हुए तब गांधीजी ने कहा, 'यदि तुम अन्याय-मार्ग पर चलोगे तो तुम्हे मेरे साथ रहने का कोई हक़ नहीं है।' अंतत: आनंद स्वामी को उस व्यक्ति से माफ़ी मांगनी ही पड़ी।

 3-गांधीजी भोजन के साथ शहद का भी नियम पूर्वक सेवन करते थे, एक बार उन्हें लंदन के दौरे पर जाना पड़ा, मीरा बहन भी साथ जाया करती थीं,भूलवश लंदन दौरे के समय वह शहद की शीशी ले जाना भूल गई। जिसके बाद मीरा बहन ने शहद की नई शीशी वहीँ से खरीद ली, बाद में जब गांधीजी भोजन करने बैठे तो नई शीशी देख कर मीरा बहन पर बिगड़ गए और बोले, ‘तुमने यह नई शीशी क्यों मंगवाई ?

मीरा बहन ने कहा, 'बापू में शहद की वह शीशी लाना भूल गई थी।' बापू बोले 'यदि एक दिन में भोजन न करता तो क्या मर जाता ? तुम्हें पता होना चाहिए की हम लोग जनता के पैसे से जीवन चलाते हैं और जनता का एक-एक पैसा बहुमूल्य होता हैं , वह पैसा फिजूल खर्च नहीं करना चाहिए।'

4- गांधीजी एक छोटे से गांव में पहुंचे तो उनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी, गांधीजी ने लोगों से पूछा, इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं ?'
भीड़ में से एक वृध्द व्यक्ति आगे आया और बोला, 'आप तो बड़े ज्ञानी हैं, क्या आप इतना भी नहीं जानते की जेठ के महीने में खेतों में कोई फसल नहीं होती , इन दिनों हम खाली रहते हैं।
गांधीजी ने पूछा, जब फसल बोने व काटने का समय होता है, तब क्या बिलकुल भी समय नहीं होता ?'
वृध्द बोला, 'उस समय तो रोटी खाने का भी समय नहीं होता।'
गांधीजी बोले, 'तो इस समय तुम बिलकुल निठल्ले हो और सिर्फ गप्पें हाँक रहे हो। यदि तुम चाहो तो इस समय भी कुछ बो और काट सकते हो।' गाँव वाले बोले, 'कृपा करके आप ही बता दीजिये की हमें क्या बोना और क्या काटना चाहिए ?'
तब गांधीजी गंभीरतापूर्वक बोले-
'आप लोग कर्म बोइए और आदत को काटिए,आदत को बोइए और चरित्र को काटिए।
चरित्र को बोइए और भाग्य को काटिए। तभी तुम्हारा जीवन सार्थक हो पायेगा।'

5- एक अंग्रेज ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा। उसमें गालियों के अतिरिक्त कुछ था नहीं।गांधीजी ने पत्र पढ़ा और उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। उसमें जो आलपिन लगा हुआ था उसे निकालकर सुरक्षित रख लिया।वह अंग्रेंज गांधीजी से प्रत्यक्ष मिलने के लिए आया। आते ही उसने पूछा- महात्मा जी! आपने मेरा पत्र पढ़ा या नहीं?

महात्मा जी बोले- बड़े ध्यान से पढ़ा है।उसने फिर पूछा- क्या सार निकाला आपने? महात्मा जी ने कहा- एक आलपिन निकाला है। बस, उस पत्र में इतना ही सार था। जो सार था, उसे ले लिया। जो असार था, उसे फेंक दिया।

6- दांडी यात्रा के समय बापू एक स्थान पर रुके। जब वह चलने को हुए तो उनका एक अंग्रेज प्रशंसक उनसे मिलने आया और बोला, ‘हेलो मेरा नाम वाकर है।' चूँकि बापू उस समय जल्दी में थे, इसलिए चलते हुए ही विनयपूर्वक बोले, में भी तो वाकर हूँ। इतना कहकर वह जल्दी-जल्दी चलने लगे।

तभी एक सज्जन ने पूछा, ‘बापू यदि आप उससे मिल लेते तो आपकी प्रसिध्दि होती और अंग्रजी समाचार-पत्रों में आपका नाम सम्मानपूर्वक छपता। बापू बोले मेरे लिए सम्मान से अधिक समय कीमती है।

 

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