कराह रहा है देश का मशहूर विश्वविद्यालय JNU,आखिर कौन है जिम्मेदार ?

देश
ललित राय
Updated Jan 06, 2020 | 09:58 IST

रविवार को जवाहर लाल नेहरू विश्विविद्यालय में कुछ नकाबपोश दाखिल हुए और जबरदस्त हिंसा की। इस विषय पर अब राजनीति भी तेज हो चुकी है। लेकिन सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्यों है कि जेएनयू चर्चा के केंद्र में है।

कराह रहा है देश का मशहूर विश्वविद्यालय JNU, आखिर कौन है जिम्मेदार ?
जेएनयू एक बार फिर चर्चा के केंद्र में 

मुख्य बातें

  • जेएनयू हिंसा में दिल्ली पुलिस ने दर्ज की एफआईआर
  • हिंसा मामले में सियासत भी तेज, गिरिराज सिंह बोले- लेफ्ट के छात्र विश्वविद्यालय का नाम कर रहे हैं खराब
  • जेएनयू हिंसा में कुल 25 छात्रों को आई चोट, दंगा करने और पब्लिक प्रापर्टी नुकसान करने का मामला

नई दिल्ली। देश का मशहूर विश्वविद्यालय जेएनयू एक बार फिर चर्चा के केंद्र है। जेएनयू पर अपनों की नजर लग गई है या किसी और की यह सवालों के घेरे में है। लेकिन एक बात साफ है कि शिक्षा का यह केंद्र हिंसा का गवाह बन चुका है। छात्रावासों में फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर छात्रों के आंदोलन को देश और दुनिया पहले ही देख चुकी है।इस सिलसिले में विरोध अभी भी जारी है। लेकिन रविवार को कैंपस में जो कुछ हुआ वो शर्मसार करने वाली है। यहां जानना जरूरी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब डेढ़ घंटे तक कुछ नकाबपोशों ने विश्वविद्यालय को बंधक बना लिया। लड़कियों के छात्रावासों को निशाना बनाया गया। जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष समेत 25 छात्र हिंसा की जद में आ गए। 

सरस्वती ढाबा से शुरू हुई हिंसा की वारदात
जेएनयू में रविवार को हिंसा की शुरुआत सरस्वती ढाबे से शुरू हुई। छात्रों के एक ग्रुप का आरोप है कि वाम समर्थित संगठन आम छात्रों को रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में शामिल होने में दीवार बन गए हैं। इस तरह की बातों के बीच कुछ नकाबपोश विश्वविद्यालय कैंपस में दाखिल होते हैं और हिंसा का वो खेल शुरू होता है जिसका वीडियो देखने के बाद किसी की भी रुह कांप जाए। नकाबपोशों के हमले में जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष को चोट आती है और कई दूसरे छात्र भी उत्पातियों के शिकार बन गए। जानकारी मिलने पर दिल्ली पुलिस भी मौके पर पहुंचती है। लेकिन आइसा और दूसरे संगठनों का कहना है कि वाइस चांसलर ने पुलिस को कैंपस में दाखिल नहीं होने की इजाजत दी।

राजनीतिक दल भी हुए सक्रिय
जेएनयू में हिंसा की इस ताजा घटना पर राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए। कांग्रेस ने कहा कि ये तो मोदी और शाह को छात्रों के लिए गुजरात मॉडल है, तो बीएसपी मुखिया मायावती ने न्यायिक जांत की मांग की। कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह ने तो गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग तक कर डाली। इसके साथ ही केरल के सीएम पी विजयन भी कूद पड़े। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में शिक्षण संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा बनाया जा रहा है। 

ये है जेएनयू के छात्रों की राय
इस विषय पर जेएनयू से जुड़े कुछ छात्रों से समझने की कोशिश की गई। संजय कुमार नाम के एक छात्र का कहना है कि दरअसल यह छात्रों के दो गुटों में वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की है। रविवार को जो हिंसा हुई उसके लिए सीधे तौर पर कौन जिम्मेदार है, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन एबीवीपी और उसके प्रतिद्वंदी संगठनों के बीच की अदावत जगजाहिर है। लेकिन वो कहते हैं कि वाइस चांसलर को जितनी तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए उन्होंने नहीं की। 

क्या कहते हैं जानकार
जेएनयू हिंसा के संबंध में पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में प्रोफेसर रहे वी डी मिश्रा कहते हैं कि उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में वाद विवाद की खबरें आती रहती हैं। लेकिन जेएनयू में जो कुछ हो रहा है वो चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि छात्रों के मामले में जब प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर शिक्षक शामिल होते हैं तो दिक्कतें बढ़ जाती हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन फीस या किसी दूसरे विषय पर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। इस विषय पर विरोध भी मुनासिब है। जब छात्रों का आंदोलन बाहरी ताकतों से नियंत्रित होने लगता है तो जेएनयू से जिस तरह की खबर आ रही है उसका होना स्वाभाविक है। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही और बढ़ जाती है क्योंकि शैक्षणिक संस्थानों को कुछ गुंडों के हाथों में बंधक बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

 

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