कुछ ऐसा रहा है प्लास्टिक का इतिहास, समय के साथ बदलता रहा है इसका रूप

देश
श्वेता कुमारी
Updated Oct 02, 2019 | 11:15 IST

सरकार ने सिंगल यूज प्‍लास्टिक का इस्‍तेमाल बंद करने को कहा है, ताकि पर्यावरण और इंसानों पर होने वाले इसके दुष्‍प्रभाव को कम किया जा सके। आखिर क्‍या है सिंगल यूज प्‍लास्टिक? डालें इसके अब तक के इतिहास पर एक नजर:

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Representative image  |  तस्वीर साभार: Getty Images

मुख्य बातें

  • प्‍लास्टिक का इस्‍तेमाल आज दुनियाभर में धड़ल्‍ले से हो रहा है
  • आज यह पूरी दुनिया में पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन गया है
  • इंसानी स्‍वास्‍थ्‍य, पशु-पक्षियों पर भी इसका बुरा असर हो रहा है

नई दिल्‍ली : प्‍लास्टिक का इस्‍तेमाल भले ही लोगों के लिए सहज हो, लेकिन इसका पर्यावरण और इंसानों पर भी काफी बुरा हो रहा है और पशु-पक्षी भी इससे परेशान हैं। पूरी दुनिया में प्‍लास्टिक का उत्‍पादन जिस गति से बढ़ा है, उसने एक नया संकट पैदा कर दिया है। इसी संकट को जानते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्‍टूबर को राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती से 'सिंगल यूज प्लास्टिक' का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने की बात कही है। सरकार का मकसद इसे 2022 तक पूरी तरह समाप्‍त करने का है।

क्‍या है सिंगल यूज प्‍लास्टिक?
सिंगल यूज प्लास्टिक का अर्थ है, एक ही बार इस्तेमाल होने लायक प्लास्टिक। प्लास्टिक की थैलियां, प्लेट, छोटी बोतलें, स्ट्रॉ, पाउच आदि इसके कुछ उदाहरण हैं, जिनका केवल एक बार ही इस्‍तेमाल होता है, दूसरी बार नहीं। एक बार इस्‍तेमाल के बाद इन्‍हें फेंक दिया जाता है। यूं तो इंसानों के लिए इसका इस्‍तेमाल बेहद सहज होता है और इसके उत्‍पादन पर खर्च भी कम ही आता है, पर इसके अंदर जो रसायन होते हैं, वे इंसानों के स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित करने के साथ-साथ पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं।

रिसाइक्लिंग है बड़ी समस्‍या 
यहां-वहां फेंके गए प्लास्टिक के कचरे से निकलने वाला केमिकल बारिश के पानी के साथ जलाशयों में जाता है, जो बेहद खतरनाक होता है। प्‍लास्टिक का इस्‍तेमाल पूरी दुनिया में किस तरह धड़ल्‍ले से होता है, उसका अंदाजा भी इसी से लगाया जा सकता है कि एक आकलन के मुताबिक, दुनियाभर में लोग हर एक मिनट पर प्‍लास्टिक की 10 लाख बोतलें खरीदते हैं। इसकी रिसाइक्लिंग भी एक बड़ी समस्‍या है। करीब 91 फीसदी इस्‍तेमाल हो चुके प्‍लास्टिक को रिसाइकल नहीं किया जा सकता। प्‍लास्टिक के इस्‍तेमाल से परिंदे भी बीमार होकर दम तोड़ रहे हैं।

कब हुआ प्‍लास्टिक का अविष्‍कार?
प्‍लास्टिक का अविष्‍कार अमेरिका में 1907 में बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक लियो बेकलैंड ने किया था। उन्‍होंने इसे बेकलाइट नाम दिया था, जो इससे पहले बनी ऐसी हर चीज से अलग थी, जिनका इस्‍तेमाल सामानों को रखने या पैक करने के लिए होता था। बेकलाइट के अविष्‍कार के बाद बेकलैंड ने एक जर्नल में लिखा था कि उनकी यह खोज 'भविष्य के लिए काफी अहम' साबित होगी। पूरी तरह से सिंथेटिक तत्‍व बेकलाइट से जल्द ही पंखे, रेडियो, कलम आदि बनाए जाने लगे और इसके साथ ही दुनिया में प्लास्टिक युग का आगाज हो चुका था।

...और प्‍लास्टिक की दुनिया में आ गई क्रांति
बेकलाइट के अतित्‍व में आने के बाद दुनिया के कई अन्‍य वैज्ञानिक भी इस तरह के प्रयास में जुट गए थे। नायलॉन, पॉलीएथिलीन, पॉलीस्टाइलिन जैसे कई तरह के प्लास्टिक तत्वों से दुनिया का साबका पड़ा। यह वह दौर था जब तकरीबन हर देश से नए तरह के प्‍लास्टिक तत्‍व सामने आ रहे थे। छोटे-छोटे समानों से लेकर हवाई जहाज और कई बड़ी गाड़‍ियों के कल-पुर्जे भी इसकी मदद से बनाए जाने लगे। इसका बड़े पैमाने पर उत्‍पादन शुरू हुआ तो इस पर आने वाली क‍म लागत और लोगों के लिए इसकी सहजता ने भी इसे खूब लोकप्रियता दी और 1930 के दशक तक पूरी संस्‍कृति ही बदल गई।

कभी आई थी मांगों में कमी
द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान हालांकि प्‍लास्टिक की मांग में कुछ कमी आई, क्‍योंकि युद्ध के हालात में प्‍लास्टिक से कहीं अधिक जरूरी अन्‍य चीजें हो गई थीं। लेकिन युद्ध समाप्‍त होने के कुछ ही वर्षों बाद प्‍लास्टिक उद्योग से जुड़ी कंपनियां विज्ञापनों के जरिये लोगों को यह बताने में कामयाब रहीं कि इसकी कई अच्‍छाइयां हैं और यह लोगों के लिए सहज होने के साथ-साथ किफायती भी है। प्लास्टिक के सामानों से बाजार और लोगों के घर भर रहे थे तो दुनियाभर में कचरों का ढेर भी जमा रहो रहा था, जो आज पर्यावरण, इंसानी स्‍वास्‍थ्‍य, पशु-पक्षियों के लिए बेहद खतरनाक और कई मायनों में जानलेवा होता जा रहा है।

बड़ी चुनौती बन गया है प्लास्टिक का कचरा
जिस तेजी से दुनियाभर में प्‍लास्टिक का प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तेजी के साथ लोग इसके दुष्‍परिणों से भी अवगत हो गए। 1970 का दशक आते-आते इसके खिलाफ आवाज उठने लगी थी, जो आज भी जारी है। लेकिन यह जिस तरह से आम लोगों की जिंदगी में शामिल हो गया है, इसे हटाना भी आसान नहीं रह गया है। आज सिर्फ अमेरिका और यूरोप में ही नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भी प्लास्टिक का कचरा एक बड़ी चुनौती बन गया है। खासकर प्लास्टिक की थैलियां, प्‍लेट, गिलास और पैक करने के लिए इस्‍तेमाल होने वाला प्लास्टिक पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद इनका इस्तेमाल थमने का नाम नहीं ले रहा।

चीन में होता है सर्वाधिक उत्‍पादन
आज प्‍लास्टिक का सबसे अधिक उत्‍पादन चीन में होता है, लेकिन दुनिया के बाजार पर इसका जिस तरह का दबदबा है, उसे देखते हुए यह आसान नहीं लगता कि कोई देश या वैश्विक संस्‍था बीजिंग पर इसे रोकने या कम करने के लिए दबाव बना सके। आज इसका इस्‍तेमाल फोन, रेडियो, बंदूकों से लेकर कॉफी पॉट और तमाम तरह के गहनों में भी होने लगा है। पूरी दुनिया में लोग इसके इस्‍तेमाल को लेकर जितने सहज हैं और जिस तरह धड़ल्‍ले से इसका इस्‍तेमाल कर रहे हैं, उसके आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि अगले एक साल में यानी 2020 तक पूरी दुनिया में 12 अरब टन प्लास्टिक कचरा जमा हो जाएगा और इसे साफ करने में कई सौ साल साल लग जाएंगे।

बहरहाल, 2022 तक 'सिंगल यूज प्‍लास्टिक' का इस्‍तेमाल बंद करने को लेकर मोदी सरकार की पहल पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके दुष्‍परिणों को कुछ हद तक ही सही नियंत्रित करने को लेकर एक उम्‍मीद जताती है, जिसका लाभ अंतत: पूरी मानव जात‍ि को मिलेगा। पॉलिथीन खाने से गायों की मौत और समुद्र की तलहटी में इससे उलझकर छोटे-छोटे जंतुओं के जान गंवाने जैसी घटनाओं पर भी इससे कुछ हद तक ही सही, अंकुश लगने की उम्‍मीद है।

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