गलवान पर चीन का कबूलनामा: कितने भरोसेमंद हैं चीनी आंकड़े? देर से स्‍वीकारोक्ति का रहा है इतिहास

देश
श्वेता कुमारी
Updated Feb 21, 2021 | 22:57 IST

चीन ने गलवान घाटी में अपने सैनिकों के हताहत होने की बात आठ महीने बाद कबूल की है। यह ऐसा कोई पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी चीन ने कई संघर्षों में हताहतों की संख्‍या को लेकर बहुत बाद में जानकारी दी।

गलवान पर चीन का कबूलनामा: कितने भरोसेमंद हैं चीनी आंकड़े? देर से स्‍वीकारोक्ति का रहा है इतिहास
गलवान पर चीन का कबूलनामा: कितने भरोसेमंद हैं चीनी आंकड़े? देर से स्‍वीकारोक्ति का रहा है इतिहास  |  तस्वीर साभार: AP, File Image

नई दिल्‍ली : पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के साथ जून 2020 में हुई हिंसक झड़प के आठ महीने बाद चीन ने यह कबूला है कि इस घटना में उसके सैनिकों की भी जान गई। उसने इस हिंसक झड़प में जान गंवाने वाले अपने सैनिकों की संख्‍या चार बताई है, जबकि एक सैनिक के घायल होने की बात कही है। गलवान हिंसा के करीब आठ महीने के बाद चीन के इस कबूलनामे को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।

चीन को गलवान में अपने सैनिकों की शहादत को स्‍वीकार करने और उन्‍हें उचित सम्‍मान देने में इतना वक्‍त क्‍यों लग गया? क्‍या चीनी आंकड़ों पर भरोसा किया जा सकता है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो हर किसी के मन में आ रहा है; खास तौर पर ऐसे में जबकि भारतीय ही नहीं, रूसी और अमेरिकी रिपोर्ट्स में भी चीनी हताहतों की संख्‍या भारत के मुकाबले अधिक और दोगुनी तक बताई गई है।

क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ?

चीन ने न केवल गलवान हिंसा के 8 महीने बाद अपने सैनिकों की शहादत को कबूल किया है, बल्कि चीनी अखबार 'ग्‍लोबल टाइम्‍स' ने वीडियो जारी कर सारा आरोप भारत पर मढ़ दिया। लेकिन चीन के रिकॉर्ड को देखते हुए यह साफ तौर पर प्रॉपेगैंडा सा प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि चीन कभी पूरी सच्‍चाई नहीं बताता और जो जानकारी देता है, वह भी काफी देर से सार्वजनिक होती है।

इसे भारत के जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के उस ट्वीट से समझा जा सकता है, जिसमें उन्‍होंने लिखा है कि चीन की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी कभी पूरा सच नहीं बताती और वह दुनिया में सबसे मजबूत प्रॉपेगैंडा मशीन है। उन्‍होंने रूसी समाचार एजेंसी 'तास' की 10 फरवरी की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों से हुई झड़प में 45 चीनी सैन्यकर्मियों की जान जाने की बात कही गई है, तो 1962 के भारत-चीन युद्ध से लेकर अब तक के संघर्षों में शहीद हुए चीनी सैनिकों की संख्‍या को लेकर जानकारी देने में हुई देरी के बारे में भी विस्‍तार से बताया है।

अपने एक ट्वीट में ब्रह्मा चेलानी ने लिखा है, 'चीन ने 1962 की जंग (भारत-चीन युद्ध) में हताहत हुए अपने सैनिकों के बारे में जानकारी 1994 में सार्वजनिक की थी, वह भी करके; जबकि 1979 में वियतनाम के साथ हुई लड़ाई में हताहत हुए सैनिकों की जानकारी उसने अब तक उजागर नहीं की है। अब गलवान में जून 2020 में हुई हिंसक झड़प के आठ महीने बाद उसने अपने चार सैनिकों की जान जाने और एक अधिकारी के घायल होने की जानकारी सार्वजनिक की है और झड़प का प्रॉपेगैंडा वीडियो जारी किया है।'

कोरोना पर भूमिका अब भी संदेह के घेरे में

चीन के ये रिकॉर्ड बताते हैं कि उसने किसी देश के साथ संघर्ष की स्थिति में अपने सैनिकों के हताहत होने के बारे में जानकारी किस तरह देरी से उजागर की। अभी कोरोना वायरस संक्रमण के मसले पर भी ऐसी कई रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं, जिसमें बताया गया कि चीन ने यहां भी सच्‍चाई छिपाने का काम किया। चीन पर आरोप लगा कि वह अपने यहां कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वालों की संख्‍या कम करके बता रहा है। मार्च 2020 में आई ऐसी ही एक रिपोर्ट में यहां कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वालों की संख्‍या 24 हजार से अधिक बताई गई थी। 

रिपोर्ट में सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से वुहान शहर में आग के बड़े गोले के रूप में सल्फर डाई आक्साइड गैस दिखने की बात कही गई थी और कहा गया था कि वैज्ञानिकों के मुताबिक, मेडिकल वेस्ट या बहुत ज्यादा संख्या में शवों को जलाने से सल्फर डाई ऑक्साइड निकलती है। इसके आधार पर ऐसी अटकलें भी लगाई गईं कि चीन संभवत: कोरोना वायरस से मरने वालों को जला रहा है। बहरहाल, अब एक बार फिर चीनी आंकड़े संदेह के घेरे में हैं, जो गलवान में हुई हिंसक झड़प को लेकर है। 

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