सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए स्कूल, पढ़ने वालों ने बताई आपबीती

देश
Updated Jul 28, 2019 | 18:47 IST | टाइम्स नाउ डिजिटल

माओवाद से प्रभावित होकर नक्सल में शामिल होने वाले सैकड़ों लोग सरेंडर करने के बाद स्कूल में पढ़कर अपनी जिंदगी को बेहतर करने में लगे हैं।

Naxals
Naxals  |  तस्वीर साभार: PTI
मुख्य बातें
  • स्कूल में 300 से अधिक सरेंडर करने वाले नक्सली पढ़ रहे हैं, तीन टीचर और पुलिस कर्मी इन्हें पढ़ा रहे हैं
  • सरेंडर करने वाली 32 साल की सुमित्रा साहू ने बताया कि लगता है जीवन ने मुझे दूसरा मौका दिया है
  • माओवादियों ने इनके स्कूलों को नष्ट कर कर संगठन में शामिल कर लिया था इसलिए ये अनपढ़ रह गए थे

रायपुर: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुलिस ने एक स्कूल शुरू किया है। ये नक्सली अब पुलिस फोर्स के हिस्सा हैं। नारायणपुर से एसपी मोहित गर्ग ने कहा कि इस स्कूल में तीन टीचर और 300 से अधिक सरेंडर करने वाले नक्सली हैं। नारायणपुर शहर में पुलिस लाइन एरिया में करीब एक महीने पहले यह स्कूल शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि अधिकांश सरेंडर करने वाले कैडर अध्ययन नहीं कर सकते क्योंकि उनके स्कूलों को माओवादियों द्वारा नष्ट कर दिया गया। कुछ को नक्सल ज्वाइन कराने के लिए स्कूल छोड़ने को मजबूर किया गया। पुलिस फोर्स ज्वाइन करने के बाद  उनलोगों ने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। लक्ष्य यह है कि इन सरेंडर नक्सलियों को बाहरी दुनिया से जोड़ा जाए और एजुकेशन के जरिए उनका आत्मविश्वास बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि इस कदम से उनका वास्तविक पुनर्वास होगा।

एसपी ने कहा कि इससे उन्हें प्रमोशन पाने में मदद मिलेगी और उनके परिवारों की स्थिति बेहतर होगी। लोगों के प्रति उनके व्यवहार में भी सुधार होगा। उन्होंने कहा कि उन्हें तीन ग्रुपों मे बांटा गया है। उनमें एक ग्रुप अनपढ़ है। दूसरे ग्रुप में पांचवीं पास को रखा गया है। तीसरे में सातवीं पास करने वालों को शामिल किया  गया है। एसपी गर्ग ने बताया कि स्कूल में दाखिला लेने वाले 300 कर्मियों में अधिकांश अनपढ़ हैं। वे जिला रिजर्व गार्ड में पोस्टेड और छत्तीसगढ़ एंटी नक्सल फोर्स में तैनात हैं। वे ओपन स्कूल परीक्षाओं में शामिल होंगे। राज्य के शिक्षा विभाग के तीन नियमित शिक्षकों के अलावा पुलिसकर्मी भी क्लास  ले रहे हैं।

इसके नतीजे दिख रहे हैं। नक्सली से पुलिस कर्मी बने 30 साल के अमर पोटाई ने बताया कि साक्षर बनने का मेरा सपना साकार हो गया। उन्होंने कहा कि मैं पढ़ और लिख सकता हूं। बस्तर करीब 30 वर्षों से माओवादियों के विद्रोह से जूझ रहा है। इससे मेरे जैसे बहुत से लोग प्रभावित हो रहे हैं। पोटाई कम उम्र में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में शामिल हो गए थे और वह 2012 में सरेंडर किया था। पोटाई ने कहा, मैं पढ़ना चाहता हूं क्योंकि यह मुझे पुलिस में आगे के रैंक तक पहुंचने मदद मिलेगी और साथ ही मुझे अपने बच्चों को पढ़ाने में मदद मिलेगी।

ऐसा ही कुछ पिछले साल सरेंडर करने वाली 32 साल की सुमित्रा साहू के साथ हुआ। उन्होंने बताया कि वह अपने गांव केरनार में मात्र दो साल के लिए स्कूल गई थी। यह इलाका अबूझमार में स्थित है। यह इलाका माओवादियों का बहुत ही मजबूत एरिया है। साहू ने बताया कि सशस्त्र नक्सलियों ने मेरे स्कूल को बर्बाद कर दिया। बाद में उन लोगों ने मुझे अपने संगठन में शामिल करने के लिए ले गए। लगता है जीवन ने मुझे दूसरा मौका दिया है। मैं खुश हूं कि जीवन ने मुझे पढ़ने का एक और अवसर दिया है।

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