कर्नाटक विधानसभा में येदियुरप्पा को विश्वासमत हासिल, फर्क सिर्फ इतना है

देश
Updated Jul 29, 2019 | 11:59 IST | ललित राय

कर्नाटक के सीएम येदियुरप्पा शक्ति परीक्षण में कामयाबी हासिल की। उन्होंने कहा कि अब कर्नाटक को नई दिशा मिली है और वो राज्य के विकास को नया आयाम देंगे।

yediurappa floor test
कर्नाटक के सीएम हैं बी एस येदियुरप्पा 
मुख्य बातें
  • कर्नाटक के सीएम बी एस येदियुरप्पा ने हासिल किया विश्वासमत
  • संख्या बल में बीजेपी को बढ़त हासिल
  • 17 बागी विधायकों को स्पीकर ने ठहराया अयोग्य

नई दिल्ली। Yediurappa floor test कर्नाटक में येदियुरप्पा सरकार ने शक्ति परीक्षण में कामयाबी हासिल कर ली है। शुक्रवार को शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा था की उनकी सरकार सोमवार को विश्वासमत हासिल करेगी। अगर संख्याबल को देखें तो इस दफा येदियुरप्पा की राह आसान है। कर्नाटक विधानसभा में बीजेपी के पास विधायकों की संख्या 105 और उन्हें एक निर्दलीय विधायक का समर्थन भी हासिल है। यहां हम आपको बताएंगे कि येदियुरप्पा जब 2018 में विश्वासमत हासिल कर रहे थे और जब आज वो एक बार फिर फ्लोर टेस्ट का सामना करेंगे तो दोनों में क्या फर्क है।

वर्ष 2018 में कर्नाटक विधानसभा का चुनाव संपन्न हो चुका था और जो नतीजे सामने आए थे उसमें बीजेपी 105 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। कांग्रेस के खाते में 80 और जेडीएस के खाते में 37 विधायक थे। यहां ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि राज्यपाल को किसे सरकार बनाने के लिए बुलाना चाहिए। बीजेपी का तर्क था कि वो सबसे बड़ी पार्टी है और परंपरा के तहत उन्हें सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए। लेकिन कांग्रेस और जेडीएस का कहना था कि राज्यपाल को सरकार के स्थायित्व पर भी ध्यान देना चाहिए।


इस बीच कांग्रेस और जेडीएस में तोड़फोड़ की खबरें आईं। विधायक आनंद सिंह के गायब होने का हवाला देते हुए कांग्रेस की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। इस बीच राज्यपाल ने परंपरा का हवाला देते हुए येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दिया। येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण की और फ्लोर टेस्ट के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक महीने का समय मांगा। ये बात दीगर है कि कांग्रेस ने अदालत से आपत्ति जाहिर की और खरीदफरोख्त का हवाला देते हुए एक महीने का समय देने से इनकार कर दिया।

अदालत ने येदियुरप्पा सरकार को विश्वासमत हासिल करने के लिए 15 दिन का समय दिया। येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण के तीन बाद ही सदन में विश्वासमत हासिल करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन उन्हें पता था कि संख्या बल उनके पक्ष में नहीं है लिहाजा सदन के अंदर उन्होंने कहा कि वो राज्य की सेवा करना चाहते थे। लेकिन कुछ दूसरे राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा आड़े आ गई और सदन में इस्तीफा देने की घोषणा की। 


येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई जिसके चेहरा एच डी कुमारस्वामी बने। लेकिन सरकार गठन के कुछ महीनों के बाद ही कांग्रेस और जेडीएस के संबंधों में उतार चढ़ाव का दौर शुरू हो गया। समय समय पर एच डी कुमारस्वामी कहते रहे कि वो विषपान कर रहे हैं लेकिन कर्नाटक की जनता की सेवा के लिए वो प्रतिबद्ध हैं। कई दफा सार्वजनिक तौर पर अपनी पीड़ा को नहीं छुपा सके। दोनों दलों के बीच मतभेदों का असर ये हुआ कि जुलाई 2019 में कांग्रेस के 13 और जेडीएस के तीन विधायक बागी हो गए और वो मुंबई जा पहुंचे। यही नहीं दो निर्दलीय विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया।

कर्नाटक के नाटक में एक बार फिर सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और तमाम कानूनी पेंच के बीच एच डी कुमारस्वामी सरकार ने 23 जुलाई को फ्लोर टेस्ट में जाने का फैसला किया। लेकिन संख्या बल से ये साफ था कि उनकी सरकार विश्वासमत हासिल नहीं कर सकेगी। इस सच्चाई को समझते हुए कुमारस्वामी ने सदन में अपने कार्यकाल का उल्लेख किया और सीएम पद से इस्तीफा दे दिया।

कांग्रेस-जेडीएस के सत्ता से बाहर होने के बाद येदियुरप्पा के सीएम बनने का रास्ता भी साफ हो गया। यही नहीं कांग्रेस और जेडीएस के बागी विधायकों के संदर्भ में स्पीकर के आर रमेश कुमार फैसला कर चुके हैं। बागी विधायक अयोग्य ठहराए जा चुके हैं, अब उनके पास अदालत का रास्ता बचा है। लेकिन इन सबके बीच येदियुरप्पा सरकार के लिए विश्वासमत हासिल करने का रास्ता भी आसान हो चुका है।

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