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850 सीटें और 272 महिला सांसद, आसान भाषा में समझें महिला आरक्षण बिल का पूरा गणित

Women Reservation Bill 2026: केंद्र सरकार ने संसद में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए तीनों अहम विधेयक पेश किए हैं, जिनका मकसद 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को जमीन पर उतारना है। इन विधेयकों के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने, सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन लागू करने की तैयारी है। आइए इन तीनें विधेयक के महत्व को आसान भाषा में समझते हैं।

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महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल लोकसभा में पेश किए गए। AI IMAGE
Authored by: Piyush Kumar
Updated Apr 17, 2026, 14:08 IST

Women Reservation Bill 2026: केंद्र सरकार ने संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल लोकसभा में पेश किए। संशोधन विधेयकों के जरिए राजनीति में महिलाओं को 33% आरक्षण लागू करने, सीटों के परिसीमन और संरचना में बदलाव की तैयारी है।

इनका उद्देश्य 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को पूरी तरह लागू करना है, ताकि भविष्य में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। संसद में इस बिल पर मुहर लगने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने की शुरुआत हो जाएगी।

आसान भाषा में समझें तीनों विधेयक

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026

यह विधेयक तीनों प्रस्तावों में सबसे अहम माना जा रहा है। इसके जरिए संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन कर नई जनसंख्या के आंकड़ों और उनकी परिभाषा को स्पष्ट करने की तैयारी है। साथ ही, बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए लोकसभा की अधिकतम सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया है।

इसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित करने की बात कही गई है। इसके अलावा, नई सीटों के निर्धारण के लिए परिसीमन प्रक्रिया लागू करने का भी प्रावधान इस विधेयक में शामिल है।

लोकसभा में मौजूद सांसदों की फोटो। Sansad TV

लोकसभा में मौजूद सांसदों की फोटो। Sansad TV

केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026

इस विधेयक के तहत दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की योजना है। इसके साथ ही इन केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों के पुनर्गठन, यानी परिसीमन प्रक्रिया को भी लागू किया जाएगा, ताकि प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाया जा सके।

परिसीमन विधेयक, 2026

सरकार का मानना है कि 1976 के बाद लोकसभा सीटों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, इसलिए अब परिसीमन की प्रक्रिया जरूरी हो गई है। इस विधेयक के तहत 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नई सीटों का निर्धारण किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक राज्य में परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग विभिन्न राजनीतिक दलों और हितधारकों से चर्चा के बाद सीटों की अंतिम रूपरेखा तय करेगा।

महिला आरक्षण 2023 में पास हो चुका था, तो सीटें बढ़ाने और परिसीमन की जरूरत क्यों पड़ी?

सितंबर 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। हालांकि, यह आरक्षण तुरंत लागू नहीं हो सकता। इसके लिए पहले परिसीमन जरूरी है, यानी जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करनी होंगी।

दरअसल, 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण लंबे समय से स्थगित था, जिसकी समयसीमा 2026 तक थी। अब सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर जल्द परिसीमन पूरा करना चाहती है। इसका मकसद है कि 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू किया जा सके। अगर नई जनगणना (2026-27) का इंतजार किया जाता, तो इस प्रक्रिया में और देरी हो सकती थी।

लोकसभा की फाइल फोटो।

लोकसभा की फाइल फोटो।

अब आइए महिला आरक्षण बिल को भी समझ लें।

यह बिल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का अधिकार देता है। फिलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और वर्तमान में लोकसभा में महज 74 महिला सांसद हैं। बिल पास होने के बाद लोकसभा सीटों की संख्‍या बढ़ाकर 850 की जाएगी। 850 सीटों वाली लोकसभा में 272 महिला सांसद होंगी। यह बदलाव भारत को दुनिया के सबसे बड़े महिला प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र में शामिल कर देगा।

परिसीमन क्या है और यह कैसे होगा?

परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह तय करना कि हर लोकसभा और विधानसभा सीट पर लगभग समान जनसंख्या हो। वर्तमान में 2011 की जनगणना के आधार पर एक लोकसभा सीट पर औसतन करीब 22–23 लाख लोग आते हैं। अब नई व्यवस्था के तहत एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश करेंगे।

यह आयोग 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में सीटों की नई सीमाएं तय करेगा। आयोग का फैसला अंतिम माना जाएगा और इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। सरकार की योजना है कि राज्यों के मौजूदा प्रतिनिधित्व अनुपात को बनाए रखते हुए लगभग 50% तक सीटें बढ़ाई जाएं, ताकि किसी राज्य को नुकसान न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिल सके।

जानें परिसीमन के बाद संसद में क्या बदल जाएगा।

जानें परिसीमन के बाद संसद में क्या बदल जाएगा।

आखिर सीटों में ये बढ़ोतरी होगी कैसे?

लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 815 करने के लिए जनसंख्या के आधार पर परिसीमन (delimitation) कराया जाएगा, और यह काम परिसीमन आयोग द्वारा होगा। केंद्र सरकार का लक्ष्‍य महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरी तरह लागू करना है।

किन राज्यों में कितनी सीटें बढ़ने की उम्मीद

  • उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120-140 हो सकती हैं।
  • बिहार में 40 से बढ़कर 60-73 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • मध्य प्रदेश में 29 से बढ़कर 44-51 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • Rajasthan में 25 से बढ़कर 38-48 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • गुजरात में 26 से बढ़कर 39-42 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • महाराष्ट्र में 48 से बढ़कर 72-79 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • तमिलनाडु में 39 से बढ़कर 58-60 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • केरल में 20 से बढ़कर 30 सीटें बढ़ सकती हैं।
  • पश्चिम बंगाल में 42 से बढ़कर 63-64 सीटें बढ़ सकती हैं।

महिला आरक्षण बिल से जब देश की राजनीति में महिलाओं की बराबरी का हक देती है तो दक्षिण राज्यों में विरोध क्यों?

दक्षिण भारत के कई राज्य, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, परिसीमन को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पिछले कई दशकों में परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू किया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही।

ऐसे में यदि सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है। अनुमान है कि उनका हिस्सा मौजूदा लगभग 24.3% से घटकर करीब 20.7% तक आ सकता है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर चिंता जताई है। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हुआ तो इसका व्यापक विरोध हो सकता है। इन राज्यों का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था संघीय ढांचे को कमजोर कर सकती है और जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के साथ अन्याय होगा।

सीएम सिद्धारमैया, एम के स्टालिन और रेवंत रेड्डी की फाइल फोटो।

सीएम सिद्धारमैया, एम के स्टालिन और रेवंत रेड्डी की फाइल फोटो।

सरकार का जवाब

वहीं, अमित शाह ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान दक्षिण के राज्यों की चिंता दूर करते हुए निम्न बातें कहीं -

  • कर्नाटक के पास वर्तमान में 28 लोकसभा सीटें हैं, जो कुल 543 का 5.15% है। विधेयक के बाद सीटें बढ़कर 42 होंगी और हिस्सा 5.44% हो जाएगा। इससे साफ है कि राज्य को कोई नुकसान नहीं होगा।
  • आंध्र प्रदेश की 25 सीटें अभी 4.60 फीसद हिस्सेदारी देती हैं। विधेयक लागू होने के बाद सीटें 38 हो जाएंगी और प्रतिशत 4.65% तक बढ़ेगा। यानी राज्य की हिस्सेदारी में हल्की बढ़ोतरी ही देखने को मिलेगी।
  • तेलंगाना की मौजूदा 17 सीटें 3.13% प्रतिनिधित्व देती हैं। नई व्यवस्था में सीटें बढ़कर 26 हो जाएंगी और प्रतिशत 3.18% होगा। इससे स्पष्ट है कि राज्य का प्रतिनिधित्व घटने के बजाय थोड़ा बढ़ेगा।
  • तमिलनाडु के पास अभी 49 सीटें (7.18%) हैं। प्रस्तावित बदलाव के बाद यह 59 सीटें और 7.23% हिस्सेदारी हो जाएगी। इससे यह साफ है कि राज्य को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा।
  • केरल की 20 सीटें अभी 3.68 फीसद हिस्सेदारी देती हैं। विधेयक के बाद सीटें 30 हो जाएंगी, जबकि प्रतिशत 3.67% रहेगा। यानी प्रतिनिधित्व लगभग स्थिर रहेगा और कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।
End of Article