क्या अपने तेवर की वजह से अलग-थलग पड़ेंगे ट्रंप? एक-एक कर दूर जा रहे कनाडा, EU जैसे सहयोगी
सैद्धांतिक रूप से चीन और रूस पहले से यूएस के 'मित्रवत' देश नहीं है अब ट्रंप ने यूरोप एवं नाटो के देशों को भी रुसवा कर दिया है। अब ये देश अपने लिए एक सुरक्षित राह की तलाश में हैं। दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को हासिल करने की ट्रंप की महात्वाकांक्षा ने यूरोप को डरा दिया है।
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Jan 24, 2026, 02:04 PM IST
Doald Trump News : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उससे दुनिया भर में उथल-पुथल होनी शुरू हो गई है। ट्रंप पहले से स्थापित वैश्वक व्यवस्था को कमजोर करने और उसे बदलने की राह पर हैं। उनके फैसलों एवं बयानबाजी से यही संकेत मिलता है कि वह अपने इशारों पर दुनिया को चलाना चाहते हैं, उनके लिए अंतरराष्ट्रीय नियम, कानून और वैश्विक व्यवस्था कुछ भी मायने नहीं रखता। यूएस के जो करीबी सहयोगी देश हैं, ट्रंप ने उन्हें भी नहीं बख्शा है। उनके फैसले यूरोपीय देशों को परेशान कर रहे हैं। रिश्तों को केवल नफा-नुकसान और कारोबार की दृष्टि से देखने की उनकी नीयत अमेरिका के करीबी सहयोगी देशों को एक-एक कर उनसे अलग कर रही है।
यूरोप एवं नाटो के देशों को भी ट्रंप ने किया रुसवा
सैद्धांतिक रूप से चीन और रूस पहले से यूएस के 'मित्रवत' देश नहीं है अब ट्रंप ने यूरोप एवं नाटो के देशों को भी रुसवा कर दिया है। अब ये देश अपने लिए एक सुरक्षित राह की तलाश में हैं। दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को हासिल करने की ट्रंप की महात्वाकांक्षा ने यूरोप को डरा दिया है। यूरोप के देशों को लगता है कि आज वह ग्रीनलैंड लेने की बात कह रहे हैं, कल उन्हें इटली, जर्मनी या यूके पसंद आ सकता है। ट्रंप की जो सोच और इरादा है, उस पर चलते हुए वह आगे यूरोप की संप्रभुता खतरे में डाल सकते हैं। ट्रंप के रवैये एवं रुख से यूरोप के देशों का यूएस पर से भरोसा डिग गया है। अब वे अपने लिए भरोसेमंद साथी और साझेदार तलाश रहे हैं और अपनी सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने लगे हैं।
ट्रंप के रवैये से डर गए हैं यूरोप के देश। तस्वीर-AP
कनाडा और चीन के बीच हुई ट्रेड डील
व्यापार और कारोबार के लिए केवल वे अमेरिका के भरोसे न रहें, इसकी कवायद भी उन्होंने तेज की है। वे चीन, लैटिन अमेरिकी देशों और भारत के साथ डील कर रहे हैं। खास तौर से यूरोप के कारोबारी डील में एक तरह की तेजी देखी गई है। लैटिन अमेरिकी देशों के साथ यूरोप की ट्रेड डील करीब ढाई दशकों से चल रही थी लेकिन अब अचानक से उनके बीच डील हो गया है। कनाडा जो कि अमेरिका का पड़ोसी और उसका करीबी देश है, वह चीन पर भरोसा जता रहा है। हाल ही में कनाडा और चीन के बीच इलेक्ट्रिकल व्हीकल के निर्माण को लेकर बहुत बड़ी डील हुई है। यही नहीं, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा है कि उनका देश चीन के साथ रक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में अपना सहयोग बढ़ाएगा।
कार्नी ने ट्रंप को दिया करारा जवाब
जाहिर है कि कनाडा और अमेरिका के रिश्ते में एक गांठ आ गई है। इस बात को कार्नी ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक में भी कही। कार्नी ने कहा कि अब तक की जो एक वैश्विक व्यवस्था थी, उसमें 'दरार' आ गई है और हमें एकजुट होकर चुनौतियों का सामना करना होगा। इस बैठक में कार्नी ने ट्रंप को जवाब देते हुए कहा कि 'कनाडा, अमेरिका की रहमो-करम' पर जिंदा नहीं है। यह वही कनाडा है जो एक साल पहले तक या कहिए दूसरी बार ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले आंख मूंदकर अमेरिका पर भरोसा करता था। बाइडेन के समय पूरा यूरोप उनके पीछे खड़ा था लेकिन अब स्थिति दूसरी है। ट्रंप के पीछे न तो कनाडा खड़ा और न ही यूरोप। सब उनसे दूर जा रहे हैं। दुनिया भर में एक से बढ़कर एक और बड़ी डील हो रही है लेकिन अमेरिका इसमें कहीं दिखाई नहीं देता।
दुनिया में बन रही नई सप्लाई चेन। तस्वीर-AP
तो दुनिया में तैयार होगी नई सप्लाई चेन!
कारोबार और डील के जरिए देशों के बीच रिश्ते प्रगाढ़ हो रहे हैं और नए गुट तैयार हो रहे हैं। जाहिर है कि इससे आपूर्ति श्रृंखला की एक नई चेन तैयार होगी और यह चेन अमेरिका पर निर्भर नहीं होगी। शुरुआत में इस नई आपूर्ति श्रृंखला के तैयार होने में थोड़ा वक्त लग सकता है और इसके सुचारु होने तक देशों को परेशानी भी हो सकती है लेकिन एक बार इसके तैयार हो जाने पर देशों की अमेरिका पर निर्भरता कम हो जाएगी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हो सकता है क्योंकि एक बार विकल्प तैयार हो जाने के बाद देश अपने उत्पादों एवं सेवाओं की खपत यूएस को छोड़ अन्य देशों में करेंगे। अमेरिका में वस्तुओं एवं सामानों का कम आयात वहां महंगाई बढ़ाने का काम करेगी। ऐसे में ट्रंप अपने ही टैरिफ के दांव में फंस सकते हैं। ऐसा हुआ तो आगे चलकर उन्हें अपने टैरिफ को वापस लेना पड़ सकता है।
अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे देश
दरअसल, ट्रंप को लगता है कि दुनिया उनकी 'मनमानी' स्वीकार कर लेगी लेकिन ऐसा नहीं है। अमेरिका सुपरपावर है, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन वह दौर दूसरा था जब अमेरिका की हर बात देश मान लेते थे। आज समय बदल चुका है। दुनिया बहु-ध्रूवीय हो गई है। गत दशकों में चीन और भारत जैसी अनेक शक्तियों का तेजी से उभार हुआ है। कई देश आर्थिक और सैन्य दृष्टि से भले ही ज्यादा मजबूत न हों लेकिन वे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता एवं संप्रभुता के साथ कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं हैं। भले ही इसके लिए उन्हें कीमत चुकानी पड़े। वे ट्रंप की 'दबंगई' और 'धौंस' से डरने वाले नहीं है।
