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हंबनटोटा पोर्ट के पास ‘दुनिया के सबसे खाली एयरपोर्ट’ पर भारत की दिलचस्पी क्यों, हिंद महासागर में क्या है चीन-भारत की रणनीति?

चीन-नियंत्रित हंबनटोटा पोर्ट के पास स्थित श्रीलंका के मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट को लीज पर देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। भारत इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है और इसे हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने के बड़े अवसर के रूप में देख रहा है।

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मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भारत की नजर क्यो? (फोटो- AI)
Edited by: Shiv Shukla
Updated May 20, 2026, 02:10 IST

भारत और श्री लंका के बीच हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग का एक नया अध्याय खुल सकता है। श्रीलंका ने चीन-नियंत्रित हंबनटोटा पोर्ट के पास स्थित मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Mattala Rajapaksa International Airport) को 30 साल की लीज पर विदेशी निवेशकों को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद करीबी नजर रखे हुए है, क्योंकि यह सिर्फ एक एयरपोर्ट निवेश नहीं बल्कि हिंद महासागर में प्रभाव बढ़ाने की रणनीतिक लड़ाई का हिस्सा माना जा रहा है।

मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट को क्यों कहते हैं दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट

श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से हंबनटोटा में स्थित यह एयरपोर्ट 2013 में शुरू हुआ था। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे की महत्वाकांक्षी परियोजना माना जाता था। एयरपोर्ट के निर्माण पर करीब 20.9 करोड़ डॉलर खर्च हुए थे, जिसका अधिकांश वित्तपोषण चीन के एक्सिम बैंक ने किया था।

एयरपोर्ट में आधुनिक टर्मिनल, 3500 मीटर लंबा रनवे और बड़े विमानों को संभालने की क्षमता होने के बावजूद यह व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो पाया। यहां यात्रियों की संख्या बेहद कम रही और कई एयरलाइनों ने सेवाएं बंद कर दीं। इसी कारण इसे दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट तक कहा जाने लगा। लेकिन अब यही एयरपोर्ट भू-राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम बन गया है।

मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट

मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट

आखिर भारत की दिलचस्पी क्यों बढ़ी?

भारत की चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह एयरपोर्ट चीन-नियंत्रित हंबनटोटा बंदरगाह के बेहद करीब स्थित है। वर्ष 2017 में श्रीलंका आर्थिक संकट और कर्ज के दबाव के कारण हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर चीन को सौंप चुका है। उस समय नई दिल्ली ने इसे हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक मौजूदगी के रूप में देखा था।

अब जब एयरपोर्ट के संचालन और आसपास की 238 हेक्टेयर जमीन के विकास के लिए वैश्विक निवेशकों को आमंत्रित किया गया है, तो भारत इसे अपने लिए रणनीतिक अवसर मान रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारतीय कंपनियां यहां निवेश करती हैं तो इससे भारत को हिंद महासागर में एक मजबूत लॉजिस्टिक और एविएशन उपस्थिति मिल सकती है। यह चीन के प्रभाव को संतुलित करने का भी माध्यम बन सकता है।

मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट

मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट

एयरपोर्ट लीज मॉडल में क्या है खास?

श्रीलंका सरकार ने एयरपोर्ट लीज पर लेने के लिए निवेश के लिए दो अलग-अलग ट्रैक पेश किए हैं- इनमें पहला है एयरसाइड या एयरोड्रोम ऑपरेशन और दूसरा लैंडसाइड ऑपरेशन।

1. एयरसाइड या एयरोड्रोम ऑपरेशन

इसके तहत एयरपोर्ट संचालन, एयर ट्रैफिक और नागरिक उड्डयन सेवाओं का प्रबंधन शामिल होगा। बोली लगाने वाली कंपनी के पास अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट संचालन का अनुभव होना जरूरी है।

2. लैंडसाइड ऑपरेशन

यह 30 साल के बीओटी मॉडल पर आधारित है। इसमें एयरपोर्ट से जुड़ी 238 हेक्टेयर जमीन का विकास शामिल है।इस जमीन का उपयोग कई परियोजनाओं जैसे एमआरओ (Maintenance, Repair and Overhaul) हब, फ्लाइंग ट्रेनिंग स्कूल, लॉजिस्टिक्स पार्क,सोलर प्रोजेक्ट,इंडस्ट्रियल पार्क, वरिजॉर्ट और होटल के लिए किया जा सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निवेशक एयरसाइड, लैंडसाइड या दोनों में निवेश कर सकते हैं। इससे जोखिम कम होता है और निवेश की संभावनाएं बढ़ती हैं।

भारत के लिए MRO और एविएशन हब क्यों अहम?

भारत का विमानन क्षेत्र दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में शामिल है। लेकिन विमान मरम्मत और रखरखाव यानी एमआरओ सुविधाओं की भारी कमी बनी हुई है। भारतीय एयरलाइनों को अक्सर अपने विमानों को विदेश भेजना पड़ता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ते हैं।

मत्ताला एयरपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि यहां लंबा रनवे होने के साथ ही एयर ट्रैफिक बहुत कम है। इसके अलावा,बड़े पैमाने पर खाली जमीन भी उपलब्ध है। साथ ही इसकी लोकेशन समुद्री मार्गों के करीब है जिसके कारण यह रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। इसलिए इसे भारतीय एयरलाइनों के लिए एक संभावित MRO हब के रूप में देखा जा रहा है।

‘पड़ोसी पहले’ और महासागर रणनीति से क्या संबंध?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से नाइबरहुड फर्स्ट नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। इसके साथ ही भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी 'MAHASAGAR'यानी “Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions” दृष्टि को भी आगे बढ़ा रहा है। इसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करना है। ऐसे में हंबनटोटा के पास भारतीय निवेश को सिर्फ कारोबारी परियोजना नहीं बल्कि एक रणनीतिक उपस्थिति के रूप में देखा जा रहा है।

चीन के लिए इसका क्या मतलब?

चीन पिछले डेढ़ दशक में श्रीलंका में भारी निवेश करता रहा है। हंबनटोटा पोर्ट, कोलंबो पोर्ट सिटी और कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं उसकी बेल्ट एंड रोड पहल का हिस्सा हैं। ऐसे में भारत की संभावित एंट्री से पहली बार ऐसी स्थिति बन सकती है,जहां चीन के प्रभाव वाले क्षेत्र में भारत की भी प्रत्यक्ष आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी दिखाई दे।हालांकि श्रीलंका संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। आर्थिक संकट के बाद वह भारत, चीन, जापान और पश्चिमी देशों सभी से निवेश आकर्षित करना चाहता है।

पहले भी हुआ था भारतीय प्रयास

करीब डेढ़ साल पहले एक इंडो-रूसी संयुक्त उद्यम के जरिए इस एयरपोर्ट को लीज पर लेने की योजना लगभग अंतिम चरण में पहुंच गई थी। इसमें भारतीय कंपनी शौर्य एयरोनॉटिक्स शामिल थी। लेकिन श्रीलंका में सरकार बदलने के बाद वह सौदा आगे नहीं बढ़ सका।अब नई सरकार ने फिर से एक्प्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है, जिसे “फ्रेश स्टार्ट” माना जा रहा है।

हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में हंबनटोटा पोर्ट और उसके पास का एयरपोर्ट केवल आर्थिक परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि वे इस बात के प्रतीक हैं कि एशिया में आने वाले समय में रणनीतिक प्रभाव किसके पास होगा भारत या चीन।अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या भारतीय कंपनियां इस अवसर को भुनाती हैं और क्या मत्ताला एयरपोर्ट भविष्य में दक्षिण एशिया की नई रणनीतिक धुरी बनता है

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