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कैसे ग्रीनलैंड की 'कीमत' पर वर्जिन आइलैंड्स बना था अमेरिका का हिस्सा? तब कहलाता था डेनिश वेस्ट इंडीज

आज ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच विवाद चल रहा है, उसे लेकर 100 साल पहले एक समझौता हुआ था, वो भी अमेरिका और डेनमार्क के बीच ही। ग्रीनलैंड के बदले वर्जिन आइलैंड्स का सौदा डेनमार्क ने किया था। इसी सौदे में ग्रीनलैंड को लेकर एक शर्त रखी गई थी। जिसमें साफ कहा गया था कि संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार डेनमार्क सरकार द्वारा अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को संपूर्ण ग्रीनलैंड तक विस्तारित करने पर आपत्ति नहीं करेगी।

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कभी डेनमार्क ने अमेरिका को बेचा था वर्जिन आइलैंड्स (फोटो- Wikimedia Commons/ Times Now Navbharat)
KEY HIGHLIGHTS
    • कभी डेनमार्क का हिस्सा था अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स, कहलाता था डेनिश वेस्ट इंडीज
    • प्रथम विश्वयुद्ध के समय अमेरिका ने डेनमार्क से खरीदा था डेनिश वेस्ट इंडीज
    • बदले में डेनमार्क को राजनीतिक और आर्थिक हितों को संपूर्ण ग्रीनलैंड तक विस्तारित करने की मिली थी अनुमति

आज ग्रीनलैंड को लेकर जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, डेनमार्क के पीछे पड़े हैं, वैसे ही कभी एक और अमेरिकी राष्ट्रपति वर्जिन आइलैंड्स को लेकर डेनमार्क के पीछे पड़े थे। तब भी अमेरिका ने सीधे डेनमार्क को कहा था, या तो हमें वर्जिन आइलैंड्स बेच दो या फिर हम इसे छीन लेंगे। समय था प्रथम विश्वयुद्ध का, तब वर्जिन आइलैंड्स, डेनिश वेस्ट इंडीज के नाम से जाना जाता था। डेनिश वेस्ट इंडीज का सौदा एक बार नहीं बल्कि दो बार हुआ था, पहली बार 1867 में और दूसरी बार 1916 में। तब डेनमार्क और अमेरिका के बीच डेनिश वेस्ट इंडीज का सौदा इस शर्त पर हुआ था कि ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का कब्जा बरकरार रहेगा, अमेरिका उसमें इंटरफेयर नहीं करेगा।

डेनिश वेस्ट इंडीज का इतिहास

डेनिश वेस्ट इंडीज का इतिहास कैरेबियन क्षेत्र में यूरोपीय उपनिवेशवाद, व्यापार और दास प्रथा से गहराई से जुड़ा हुआ है। डेनिश वेस्ट इंडीज में यूरोपियों के आने से पहले यहां अरावाक और कैरिब जनजातियां निवास करती थीं। 17वीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों ने कैरेबियन द्वीपों पर कब्जा करना शुरू किया। डेनमार्क ने 1672 में सेंट थॉमस, 1694 में सेंट जॉन और 1733 में सेंट क्रॉइक्स पर नियंत्रण स्थापित किया। डेनिश शासन के दौरान ये द्वीप गन्ना उत्पादन और चीनी व्यापार के प्रमुख केंद्र बने। खेतों में काम के लिए अफ्रीका से बड़ी संख्या में दासों को लाया गया। चीनी, रम और अन्य उत्पादों के निर्यात से डेनमार्क को भारी आर्थिक लाभ हुआ, लेकिन स्थानीय और अफ्रीकी मूल के लोगों को अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। 1848 में व्यापक विद्रोह और दबाव के बाद डेनमार्क ने दास प्रथा को समाप्त कर दिया, हालांकि इसके बाद भी सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी रहीं।

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कभी डेनमार्क का हिस्सा था अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स (फोटो- Fritz Melbye)

अमेरिका की नजर कब डेनिश वेस्ट इंडीज पर पड़ी?

19वीं सदी में जब दुनिया का परिदृश्य बदलने लगा, तब अमेरिका की नजर इस क्षेत्र पर पड़ी। डेनमार्क जहां कमजोर हो रहा था, वहीं अमेरिका का तेजी से उभार हो रहा था। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार तब अमेरिका के राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन थे, वो अमेरिका का प्रभाव विश्व पटल पर बढ़ाने की कोशिश में थे, यहीं से अमेरिका की नजर डेनिश वेस्ट इंडीज इलाके पर गई।

डेनिश वेस्ट इंडीज अमेरिका के लिए क्यों था महत्वपूर्ण?

डेनिशन वेस्ट इंडीज की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार थी कि अमेरिका के लिए सामरिक दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण था, यूरोप के लिए भी। यहां स्थित सेंट थॉमस का बंदरगाह अमेरिका के लिए काफी अहम था, जिससे कैरेबियाई क्षेत्र को नियंत्रित किया जा सकता था। यह वो दौर था, जब डेनमार्क के लिए डेनिश वेस्ट इंडीज एक बोझ बनने लगा था और यही कारण था कि पहली बार इसे डेनमार्क से अमेरिका ने खरीदने की कोशिश की थी।

President Andrew Johnson

अमरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन (फोटो- white house history)

जब बिकते-बिकते रह गया डेनिश वेस्ट इंडीज

डेनमार्क को लेकर 1867 में अमेरिका और डेनमार्क डेनिश वेस्ट इंडीज के सौदे को लेकर एक समझौता भी हुआ। बीबीसी के अनुसार इसकी कीमत रखी गई, अमेरिका के 7.5 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना। लेकिन तब यह सौदा फाइनल स्टेज में पहुंचा ही नहीं।

जब बिक गया डेनिश वेस्ट इंडीज

कुछ साल आगे निकला। अमेरिका अपना प्रभाव दुनिया के मानचित्र पर बढ़ाता रहा, रूस से अलास्का खरीद लिया और तभी शुरू हो गया प्रथम विश्वयुद्ध। जर्मनी की नजर डेनिश वेस्ट इंडीज पर टिक गई। अमेरिका शुरू में तो इस महायुद्ध से दूर रहा लेकिन जैसे ही जर्मनी ने अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाया, अमेरिका मैदान में उतर गया। यहीं से फिर से शुरू हुआ डेनिश वेस्ट इंडीज का सौदा। अमेरिका को डर था कि अगर जर्मनी का कब्जा यहां हुआ तो अमेरिका पर हमले का बड़ा खतरा हो जाएगा। उसने डेनमार्क को फिर से सौदे के लिए बुलाया। तब अमेरिका ने साफ कहा था कि या तो डेनिश वेस्ट इंडीज हमे बेचो या फिर हम इसपर हमला करके इसे हासिल कर लेंगे, (आज की तारीख में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ इसी तरह की धमकी डेनमार्क को दे रहे हैं।), जिसके बाद डेनमार्क के साथ अमेरिका का यह सौदा 25 मिलियन डॉलर मूल्य के सोने के बदले तय हुआ। अमेरिका के Office of The Historian की वेबसाइट के अनुसार डेनिश वेस्ट इंडीज के खरीद पर 4 अगस्त 1916 को न्यूयॉर्क में डेनमार्क ने हस्ताक्षर कर दिए। इस सौदे के घोषणापत्र में कुल 12 अनुच्छेद हैं। जिसमें इस समझौते को लेकर विस्तार से लिखा गया है। इसी में ग्रीनलैंड को लेकर भी प्रमुखता से लिखा गया है।

Convention Between the United States and Denmark for the Cession of the Danish West Indies

डेनिश वेस्ट इंडीज के हस्तांतरण के लिए अमेरिका और डेनमार्क के बीच समझौता (फोटो- US Govt)

डेनिश वेस्ट इंडीज हस्तांतरण की प्रमुख शर्तें-

  • डेनमार्क ने सेंट थॉमस, सेंट जॉन और सेंट क्रॉइक्स द्वीपों को अमेरिका को सौंपने पर सहमति दी।
  • अमेरिका ने इसके बदले डेनमार्क को 25 मिलियन डॉलर (सोने में) भुगतान किया।
  • हस्तांतरण के बाद यह क्षेत्र यूएस वर्जिन आइलैंड्स कहलाया।
  • अमेरिका को द्वीपों पर पूर्ण प्रशासनिक, सैन्य और रणनीतिक अधिकार मिले।
  • द्वीपों को अमेरिकी नौसैनिक अड्डे के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति मिली।
  • वहां रहने वाले लोगों को नागरिक अधिकारों की गारंटी देने का प्रावधान किया गया (हालांकि पूर्ण अमेरिकी नागरिकता बाद में मिली)।
  • डेनमार्क ने क्षेत्र से जुड़े सभी भविष्य के दावों को समाप्त करने पर सहमति दी।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार डेनमार्क सरकार द्वारा अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को संपूर्ण ग्रीनलैंड तक विस्तारित करने पर आपत्ति नहीं करेगी।

अब ग्रीनलैंड पर विवाद

जिस डेनिश वेस्ट इंडीज का सौदा, ग्रीनलैंड के बदले हुआ था, डेनमार्क ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी हस्तक्षेप को खत्म करने के लिए जो शर्त इसमें रखी थी, वो अब खत्म होता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए धमकियां पर धमकियां दे रहे हैं। कभी पूर्ण कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी मिलिट्री एक्सेस की। इसके कारण न सिर्फ डेनमार्क से बल्कि पूरे यूरोप से अमेरिका के संबंध खराब होते दिख रहे हैं। फिलहाल ये विवाद जारी है, ट्रंप कभी नरम तो कभी सख्त रूख अपना रहे हैं, कभी डेनमार्क समेत पूरे यूरोप को धमका रहे हैं तो कभी पुचकार भी रहे हैं। यह विवाद कब खत्म होगा, क्या अमेरिका, ग्रीनलैंड को कब्जे में ले पाएगा, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन इतना तय दिख रहा है कि डेनमार्क ने जिस ग्रीनलैंड के बदलने वर्जिन आइलैंड्स को बेचा था, वो अब खतरे में है।

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