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क्या दुनिया का BOSS बनने की चाहत होगी पूरी? ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस का कौन दे रहा साथ और किसने बनाई दूरी,जानें सबकुछ

डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस 2026 में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ लॉन्च कर वैश्विक शांति के लिए एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है। ट्रंप का दावा है कि गाजा युद्धविराम की निगरानी से शुरू होकर यह बोर्ड भविष्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे व्यापक वैश्विक मंच का भी विकल्प बन सकता है। हालांकि रूस की भागीदारी, ट्रंप की स्थायी अध्यक्षता और भारी आर्थिक शर्तों के कारण यूरोप और कई बड़े देशों ने इससे दूरी बना ली है। कुछ देश समर्थन में हैं, कई असमंजस में, और कई ने इनकार किया है। इस पहल को लेकर सवाल यही है कि क्या यह वाकई वैश्विक शांति का प्रभावी मंच बनेगी या फिर यूएन व्यवस्था को चुनौती देने वाला एक विवादित प्रयोग बनकर रह जाएगी।

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दुनिया के बॉस बन पाएंगे ट्रंप? (फोटो- AI)

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक कूटनीति में एक नया प्रयोग करते हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 (दावोस) में औपचारिक रूप से बोर्ड ऑफ पीस की शुरुआत कर दी है। गुरुवार को ट्रंप ने इस पहल के चार्टर (संविधान) पर हस्ताक्षर किए और इसे वैश्विक शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। इस बोर्ड को शुरुआत में गाजा युद्धविराम योजना की निगरानी के लिए सोचा गया था, लेकिन अब इसके दायरे को और बड़ा करने की तैयारी है। हालांकि जहां ट्रंप इसे लगातार मजबूत और ऐतिहासिक संस्था बता रहे हैं वहीं, कई यूरोपीय देशों ने इससे दूरी बना ली है। बोर्ड ऑफ पीस में रूस की मौजूदगी और यूएन जैसी संस्थाओं पर इसके असर को लेकर वैश्विक बहस तेज हो गई है। सवाल यह है कि इसे यूएन जैसी वैश्विक स्वीकार्यता मिल भी पाएगी या नहीं। ऐसे में आज हम आपको यह बताएंगे कि वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए ट्रंप का यह प्लान क्या है। इसके चार्टर में क्या है और अभी तक इसमें शामिल होने के लिए किन देशों ने सहमति दे दी है और किसने इनकार कर दिया है। आइए जानते हैं...

क्या है ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस और क्या काम करेगा?

यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय समूह है, जिसकी अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रंप करेंगे।ट्रंप का दावा है कि अमेरिका के नेतृत्व वाला शांति बोर्ड युद्ध के बाद गाजा में शांति स्थापित करने और उसके भविष्य को समृद्ध करने पर ध्यान देगा। इतना ही नहीं, भविष्य में यह वैश्विक रूप से अपना विस्तार कर एक तरह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरह काम करेगा। ट्रंप ने विश्व इतिहास में अभी तक का सबसे प्रभावशाली निर्णायक समूह करार दिया है। ट्रंप प्रशासन इसे भविष्य में वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता करने वाले मंच के रूप में देख रहा है।

ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में कौन-कौन शामिल

  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, अध्यक्ष
  • अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो
  • स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के विशेष वार्ताकार
  • जेरेड कुशनर, ट्रंप के दामाद
  • टोनी ब्लेयर, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री
  • मार्क रोवन, अरबपति अमेरिकी फाइनेंसर
  • अजय बंगा, विश्व बैंक के अध्यक्ष
  • रॉबर्ट गैब्रियल, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में ट्रंप के वफादार सहयोगी

चार्टर की शर्तें क्या हैं?

बोर्ड ऑफ पीस शुरू में गाजा के लिए एक 'अम्ब्रेला ओवरसाइट बॉडी' के तौर पर काम करेगा और जिसकी अध्यक्षता ट्रंप करेंगे, उसमें विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे। मिडिल ईस्ट और दुनिया भर के कई देशों के नेताओं को इसके लिए न्योता भेजा गया है। भारत भी इसमें शामिल है। व्हाइट हाउस के एक बयान के अनुसार, प्रस्तावित कार्यकारी बोर्ड के सदस्य गाजा के स्थिरीकरण और दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण विभागों की देखरेख करेंगे। इनमें शासन क्षमता निर्माण, क्षेत्रीय संबंध, पुनर्निर्माण, निवेश आकर्षण, बड़े पैमाने पर वित्तपोषण और पूंजी जुटाना शामिल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्थायी सदस्यता के लिए देशों को 1 अरब अमेरिकी डॉलर (USD 1 Billion) का योगदान देना होगा। जो देश भुगतान नहीं करेंगे, उन्हें तीन साल का सीमित कार्यकाल मिलेगा। चार्टर के तहत, डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी बोर्ड के स्थायी अध्यक्ष बने रहेंगे।

शांति योजना के दूसरे चरण के दौरान काम कर देगा शुरू

ऐसा कहा जा रहा है कि यह गाजा शांति योजना के दूसरे चरण के दौरान काम करना शुरू कर देगी। पहला चरण संपन्न हो चुका है, जिसके लिए अक्टूबर 2025 में इजरायल और हमास के बीच मिस्र, कतर, अमेरिका और तुर्की ने मध्यस्थता की थी।

गाजा

रूस और पुतिन को लेकर विवाद क्यों?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को शामिल किए जाने पर ट्रंप ने कहा कि मैं चाहता हूं कि हर ताकतवर व्यक्ति इसमें शामिल हो, जो काम कर सकता है। हालांकि, इसी वजह से कई यूरोपीय देशों ने बोर्ड से दूरी बना ली। ब्रिटेन ने दावोस समारोह में चार्टर पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर ने कहा कि पुतिन को न्योता देना चिंता का विषय है। फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे जैसे देशों ने भी बोर्ड के विस्तारित अधिकारों और UN-आधारित वैश्विक व्यवस्था पर असर को लेकर सवाल उठाए हैं।

पुतिन

पुतिन

कितने देश जुड़े, कितनों को न्योता?

ट्रंप प्रशासन के अनुसार, करीब 35 देश बोर्ड में शामिल होने पर सहमत हो चुके हैं। लगभग 60 देशों को न्योता भेजा गया है। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सीसी ने बोर्ड की सदस्यता की पुष्टि की है। ट्रंप ने कहा कि कुछ देशों को शामिल होने से पहले संसदीय मंजूरी लेनी होगी, जबकि कई ऐसे देश भी हैं जिन्हें न्योता नहीं मिला, लेकिन वे इसमें शामिल होना चाहते हैं।

किन देशों ने बोर्ड में शामिल होने की सहमति दी है?

अब तक जिन देशों ने ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का फैसला किया है, उनमें अर्जेंटीना, अल्बानिया, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, बुल्गारिया, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, संयुक्त अरब अमीरात (UAE),उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं।

किन देशों ने बोर्ड में शामिल होने से इनकार किया?

कुछ यूरोपीय देशों ने फिलहाल ट्रंप के इस प्रस्ताव से दूरी बना ली है। इनमें शामिल हैं फ्रांस, चीन, नॉर्वे, स्लोवेनिया, स्वीडन, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन)। इन देशों का मानना है कि बोर्ड की भूमिका, संरचना और निष्पक्षता को लेकर अभी कई सवाल हैं।

कौन से देश अभी असमंजस में हैं?

कई बड़े और प्रभावशाली देश ऐसे हैं, जिन्होंने न्योता तो दिया गया है, लेकिन उन्होंने अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। इनमें भारत भी शामिल है। भारत के अलावा, कंबोडिया, चीन, क्रोएशिया, साइप्रस, ग्रीस, जर्मनी, इटली, यूरोपीय संघ का कार्यकारी निकाय, पराग्वे, रूस, सिंगापुर, थाईलैंड और यूक्रेन ऐसे देश हैं जिन्होंने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है।

antonio Guterres

यूएन चीफ एंटोनियो गुटेरस।

यूएन को लेकर क्यों है चिंता?

ट्रंप के इस प्लान के साथ सबसे बड़ी चिंता जो उभर कर सामने आई है वह है यूएन की स्थिति की। ट्रंप शुरुआत से ही कहते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र कमजोर हो गया है। वह उस काम को सही से नहीं कर पा रहा, जिसके लिए उसका गठन किया गया था। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल है कि बोर्ड ऑफ पीस क्या संयुक्त राष्ट्र की जगह लेगा? यह आशंका अब धीरे-धीरे वास्तविकता की तरफ जाती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने द्वारा बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस की भूमिका और दायरा स्पष्ट करने लगे हैं। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि बोर्ड ऑफ पीस के साथ यूएन यदि मिलकर काम करता है तो यह उसके लिए अच्छा रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह यूएन के प्रशंसक रहे हैं लेकिन वह अपनी जिम्मेदारियां पूरी तरह से निभा नहीं पाया है।

दावोस से लौटते समय एयर फोर्स वन में मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा, ' मुझे नहीं पता कि मैं यह चाहता भी हूं या नहीं, लेकिन यह गाजा के साथ बेहतरीन काम करेगा, और शायद दूसरी चीजों में भी, आप जानते हैं, यह गाजा से आगे भी जा सकता है। और हम संयुक्त राष्ट्र के साथ काम करेंगे…मैंने हमेशा कहा है कि संयुक्त राष्ट्र में बहुत बड़ी क्षमता है, लेकिन वे उस पर खरे नहीं उतर पाए हैं। मैंने कहा कि आठ युद्ध हुए, और मैंने उनसे कभी बात नहीं की। आपको लगता कि मैं उनसे बहुत बात करता। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अपार क्षमता है। मुझे लगता है कि शांति बोर्ड के साथ काम करना संयुक्त राष्ट्र के लिए एक अच्छी बात साबित होगी।'

क्यों अहम और विवादित है यह पहल?

अगर यह बोर्ड प्रभावी हुआ, तो यह संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों का विकल्प बनने की कोशिश कर सकता है। यूरोपीय देशों और चीन जैसे देशों का इनकार और भारत-जर्मनी, इटली जैसे देशों की चुप्पी बताती है कि ट्रंप की इस पहल पर वैश्विक सहमति अभी दूर है। इसके अलावा, आलोचकों का कहना है कि यह संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकता है। स्थायी अध्यक्ष के तौर पर ट्रंप की भूमिका और भारी आर्थिक शर्तें भी विवाद का कारण हैं।

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