Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश में 12 फरवरी खास दिन है। इस दिन यहां की करीब 12 करोड़ जनता अपने लिए एक नई सरकार का चुनाव कर रही है। खास बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग इस चुनाव का हिस्सा नहीं है। हसीना की पार्टी पर प्रतिबंध लगने की वजह से वह चुनाव नहीं लड़ पाई है। इस बार चुनाव में मुख्य मुकाबला पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के मुखिया शफीकुर रहमान के बीच है। समझा जाता है कि इन दोनों पार्टियों में से किसी एक की सरकार बन सकती है। बीएनपी का नेतृत्व लंदन से लौटे खालिदा के बेटे तारिक कर रहे हैं। स्वदेश वापसी के बाद तारिक ने बीएनपी में नई जान फूंकी है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने लोगों को एक नए बांग्लादेश का सपना दिखाया है।
हम 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति पर आगे बढ़ेंगे-तारिक
तारिक ने कहा है कि उनकी सरकार 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति पर आगे बढ़ेगी। उसका किसी देश के प्रति झुकाव नहीं होगा। वहीं, कट्टरपंथी विचारों के साथ आगे बढ़ने वाली जमात के मुखिया ने चुनाव से एक दिन पहले कहा कि वह भारत के साथ सकारात्मक संबंध चाहते हैं। जाहिर है कि बांग्लादेश के दोनों नेताओं ने भारत को लेकर एक सकारात्मक रुख दिखाया है लेकिन शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के साथ जो कुछ हुआ है और यूनुस सरकार जिस तरह से भारत विरोधी गतिविधियों एवं बयानबाजी में शामिल रही है, उससे नई दिल्ली और ढाका के द्विपक्षीय रिश्तों में तल्खी एवं दरार आई है। भारत और बांग्लादेश के रिश्ते वैसे नहीं हैं जैसे गत दशकों में रहे हैं। अंतरिम सरकार के मुखिया जिनका पद प्रधानमंत्री जैसा था, उन्होंने आपसी रिश्ते को कमजोर करने का काम किया।
Tarique Rahman
तीन तरफ से भारत से घिरा है बांग्लादेश
बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। म्यांमार से बांग्लादेश की सीमा थोड़ी सी लगती है बाकी करीब 4000 किलोमीटर की उसकी सीमा पर भारतीय राज्य हैं। अपने कारोबार के लिए बांग्लादेश काफी हद तक भारत पर निर्भर है। कच्चे माल से लेकर, बिजली एवं अन्य आधारभूत संरचनाओं की आपूर्ति भारत से होती रही है। बांग्लादेश चाहकर भी लंबे समय तक भारत से 'शत्रुता' जारी नहीं रख सकता। उसे थक-हारकर भारत से रिश्ते सामान्य बनाने ही होंगे। भारत के साथ स्थायी संबंध के लिए बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता जरूरी है। समझा जाता है कि यह राजनीतिक स्थिरता इस चुनाव से आएगी। नई सरकार के पास 'बिगड़े हुए रिश्ते' को दोबार पटरी पर लाने का अच्छा मौका होगा।
बांग्लादेश से जुड़े हैं भारत के रणनीतिक हित
बांग्लादेश के इस चुनाव पर दुनिया ही नहीं भारत भी करीबी नजर रखे हुए है क्योंकि बांग्लादेश के साथ भारत के रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। नई सरकार शेख हसीना के रास्ते पर आगे बढ़ती है या मो. यूनुस का अनुसरण करती है, यह देखने वाली बात होगी। जहां तक बात तारिक रहमान की है तो उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी विदेश नीति 'बांग्लादेश फर्स्ट' का अनुसरण करेगी यानी कि बांग्लादेश के हित सर्वोपरि होंगे, उनकी सरकार देश हित के साथ समझौता नहीं करेगी। तारिक का यह भी कहना है कि उनका देश चीन, पाकिस्तान या भारत किसी खेमे में नहीं जाएगा। यह एक संप्रभु देश के रूप में आगे बढ़ेगा। तारिक लंबे समय तक निर्वासन में लंदन में रहे हैं। लंदन में रहते हुए उन्होंने भारत विरोधी बयानबाजी की है। कुछ रिपोर्टों में उनकी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के साथ करीबी संबंध होने का भी दावा किया गया है। फिर भी तारिक के हालिया बयान भारत को लेकर सकारात्मक एवं सहयोगात्मक रहे हैं। तारिक की पार्टी यदि सत्ता में आती है तो यह भारत के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है।
Shafikur Rahman
यूनुस के समय बढ़ा जमात का दबदबा
बांग्लादेश चुनाव में दूसरी सबसा बड़ा किरदार जमात-ए-इस्लामी का है। जमात, नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ी है। युवाओं के इसी समूह ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया। इसके कुछ नेता अंतरिम सरकार का हिस्सा भी रहे। इनका आरोप था कि हसीना भारत के इशारे पर काम कर रही हैं और भारत उनके जरिए ढाका के आंतरिक मामलों में दखल देता है। हालांकि, भारत सरकार इन दावों को पूरी तरह से खारिज करती आई है। जमात बांग्लादेश में कट्टर एवं चरमपंथी संगठन है। इसका इतिहास भारत विरोधी रहा है। बांग्लादेश के लोग जब अपनी आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ संघर्ष और युद्ध लड़ रहे थे तो उस समय जमात ने पाकिस्तानी फौज का साथ दिया। जमात के इशारे एवं निशानदेही पर बड़ी संख्या में देशभक्त बांग्लादेशी मारे गए। जमात आज भी खुद को पाकिस्तान के साथ जोड़कर देखता है। इसके कुछ मौलवी तो बांग्लादेश में शरिया लागू करने की वकालत करते आए हैं।
पाकिस्तान के साथ पुराने हैं जमात के रिश्ते
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बांग्लादेश में हिंदुओं सहित अल्पसंख्यकों की दुर्दशा एवं हिंसा के पीछे जमात की कट्टर मजहबी विचारधारा है। रिपोर्टों के मुताबिक जमात के उकसावे पर ही हिंदुओं पर हमले और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता रहा है। हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद हिंदुओं के खिलाफ जिस बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, उसके पीछे कहीं न कहीं जमात का ही हाथ है। कहा जाता है कि जमात के जरिए पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबे को पूरा करना चाहता है। यूनुस सरकार में जमात का जब दबदबा बढ़ा तो पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अफसर एवं आईएसआई के अधिकारी कई बार ढाका आए। कुछ तो भारत के उस 'चिकन नेक' के करीब तक आए जो रणनीतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील है। ऐसे में जमात और पाकिस्तान के संबंधों और उसकी चरमपंथी विचारधारा को देखते हुए बांग्लादेश की सरकार में जमात-ए-इस्लामी का आना भारत के लिए अच्छी बात नहीं होगी क्योंकि जमात का मंसूबा और उसकी गतिविधियां छिपी नहीं हैं। फिलहाल, बांग्लादेश में चाहे जिसकी भी सरकार आए, भारत को उससे बात करते हुए अपने द्विपक्षीय रिश्ते आगे बढ़ाने होंगे।
