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Explained: क्या थी ईरान की 1979 क्रांति, अमेरिका को रातोंरात क्यों छोड़ना पड़ा था देश?

1 फरवरी, 1979 की सुबह लाखों ईरानी तेहरान की सड़कों पर रुहोल्लाह खामेनेई का स्वागत करने के लिए उमड़ पड़े थे, जो 15 वर्षों के निर्वासन के बाद लौटे थे। दो सप्ताह पहले पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित शाह मोहम्मद रजा पहलवी, जिन्होंने 1941 से शासन किया था, बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के कारण देश छोड़कर चले गए थे।

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Photo : AP
ईरान क्रांति क्या है?

ईरान में एक बार फिर अराजकता फैल गई है। हर तरफ विरोध प्रदर्शनों के नजारे दिख रहे हैं। दो साल पहले ही महसा अमीनी की निर्मम हत्या के बाद हो बड़े प्रदर्शन आम हो गए हैं। आर्थिक हालात ऐसे बदतर हुए हैं कि लोग सड़कों पर उतर पड़े हैं। ईरान में फिर से 1979 का दौर लौटता दिख रहा है जब आयतुल्लाह खामेनेई के पिता रुहोल्लाह खामनेई के नेतृत्व में ईरान के कट्टरपंथियों ने अमेरिका को भागने पर मजबूर कर दिया था। कैसे पैदा हुए थे वे हालात, क्यों अमेरिका को ईरान से भागना पड़ा था और कैसे खामनेई ने सत्ता पर कब्जा जमाया था, विस्तार से जानते हैं।

रुहोल्लाह खामनेई ने ईरान क्रांति को दी हवा

1 फरवरी, 1979 की सुबह लाखों ईरानी तेहरान की सड़कों पर रुहोल्लाह खामेनेई का स्वागत करने के लिए उमड़ पड़े थे, जो 15 वर्षों के निर्वासन के बाद लौटे थे। दो सप्ताह पहले पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित शाह मोहम्मद रजा पहलवी, जिन्होंने 1941 से शासन किया था, बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के कारण देश छोड़कर चले गए थे। खामनेई की वापसी के 10 दिन बाद उनके क्रांतिकारी सहयोगियों ने सत्ता संभाली और घोषणा की कि ईरान एक इस्लामी गणराज्य बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा, जिस पर खामनेई का पूरा नियंत्रण होगा। 1979 की ईरानी क्रांति ने 3.8 करोड़ की आबादी वाले इस देश के लिए एक व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्गठन की नींव रखी, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र और विश्व में आज भी देखने को मिल रहे हैं।

अंग्रेजों ने 1921 में शाह के पिता को सत्ता में स्थापित करने में मदद की थी, और सोवियत संघ के साथ मिलकर 1941 में उन्हें अपने बेटे के पक्ष में गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर किया था। 1953 में सीआईए की सहायता से हुए सैन्य तख्तापलट ने युवा शाह को सत्ता को मजबूत करने में मदद की। 1963 में शाह ने श्वेत क्रांति शुरू की, जिसका उद्देश्य भूमि सुधारों, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, आर्थिक नियंत्रणों और मतदान के अधिकारों का विस्तार करके ईरान का आधुनिकीकरण करना था।

क्रांति की ओर अग्रसर ईरान

1978 के दौरान विरोध प्रदर्शनों, हिंसक दमन और नए विरोध प्रदर्शनों के एक निरंतर चक्र ने शाह की सत्ता पर पकड़ को हिला दिया। जनवरी में कोम में, फरवरी में तबरीज में, मार्च और मई में तेहरान सहित दर्जनों शहरों में प्रदर्शन हुए। विपक्षी आंदोलन अपनेआप में विविध थे, वामपंथियों से लेकर लोकतंत्र समर्थक मध्यमार्गी और खामेनेई के आंदोलन जैसे इस्लामी आंदोलनकारी तक। 19 अगस्त को आगजनी करने वालों ने अबादान के एक सिनेमाघर में भीषण आग लगा दी, जिसमें 400 से अधिक लोग मारे गए। आगजनी के पीछे आतंकवादियों की पहचान अभी भी विवादित है, लेकिन खामनेई ने इसके लिए शाह और सावक को दोषी ठहराया, और कई ईरानियों ने उनसे सहमति जताई। सितंबर में रमजान के आखिर के उपलक्ष्य में तेहरान में हो रहे एक विशाल प्रदर्शन पर सैनिकों ने गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए। श्रमिकों ने विरोध प्रदर्शन किए, जिनमें ईरान के तेल उद्योग के श्रमिक भी शामिल थे, और अक्टूबर में राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल की घोषणा की गई।

हालात को संभालने की कोशिश में शाह ने एक सैन्य सरकार नियुक्त की और ईरानियों से सीधे अपील करते हुए अपने शासन की कुछ गलतियों को स्वीकार किया। उन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए विपक्ष के साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव रखा। फ्रांस में निर्वासन में रह रहे खामेनेई, जिन्हें वैश्विक स्तर पर और ईरान में क्रांतिकारी आंदोलन के आध्यात्मिक नेता के रूप में देखा जा रहा था, उन्होंने शाह के सुलह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दियाय। खामेनेई ने शाह की स्तात उखाड़ फेंकने की कोशिशों को जारी रखने का आह्वान किया। कुछ सप्ताह बाद शाह ईलाज के बहाने ईरान छोड़कर चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे।

शाह की जगह धर्मगुरु ने ली

खामेनेई की वापसी के साथ विपक्ष के कई लोगों ने अभी भी यह मान लिया था कि शाह के बाद के ईरान में उनका नेतृत्व काफी हद तक आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक होगा। इसके बजाय खामेनेई और उनके सहयोगियों ने तेजी से एक ऐसे गणतंत्र की स्थापना के लिए जोर दिया जो पूरी तरह से इस्लामी शिक्षाओं द्वारा निर्देशित होगा और उन लोगों द्वारा नियंत्रित होगा जो धर्म को सबसे अच्छी तरह समझते थे—यानी धर्मगुरु।

1979 के दौरान खामेनेई और उनके सहयोगियों ने हर विरोधियों और विरोध के हर तर्क को हाशिए पर धकेलने का काम किया। कुछ विरोधियों को निर्वासन में भेज दिया गया। कुछ ने शासकों के साथ अस्थायी गठबंधन बनाए लेकिन बाद में उन्हें एक-एक करके ईरानी राजनीति से हटा दिया गया। फिर भी, नागरिक समाज के कुछ पहलू बने रहे और उन्होंने समय-समय पर सरकार और धार्मिक नियंत्रण और दमन के खिलाफ आवाज उठाई। लेकिन ताकतवर इस्लामी शासन के आगे ये आवाजें दबकर रह गईं।

अमेरिका की ईरान से विदाई

ईरान की इस्लामी क्रांति की दो घटनाओं ने साबित कर दिया कि ये देश हमेशा के लिए कट्टरपंथियों के हाथों चला गया है। 1979-1981 के ईरान बंधक संकट के दौरान, तेहरान में अमेरिकी दूतावास में दर्जनों अमेरिकी राजनयिकों को कट्टरपंथी खुमैनी समर्थक छात्र प्रदर्शनकारियों ने बंधक बना लिया था। खामेनेई के अंतिम समर्थन के साथ यह दौर एक वर्ष से अधिक समय तक चला। इससे एक क्रांतिकारी ईरान की वैश्विक छवि बनी जो बाहरी शक्तियों के सामने खड़े होने से नहीं डरता था। इस प्रक्रिया में संभवतः 1980 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम को भी प्रभावित किया। इस घटना ने अमेरिका और पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया। अमेरिका को ईरान के आगे झुकना ही पड़ा और उसकी हमेशा के लिए इस देश से विदाई हो गई।

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