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Explained: केवल पश्चिम दिशा से ही क्यों होता है Disturbance, जो बदलता है मौसम का मिजाज; जानें क्या है पश्चिमी विक्षोभ

Western Disturbance: अगर आपने कभी सोचा है कि सर्दियों में उत्तर भारत में अचानक बारिश क्यों होने लगती है, पहाड़ों में बर्फबारी कैसे शुरू हो जाती है या ठंड एकाएक क्यों बढ़ जाती है, तो इसका जवाब अक्सर एक ही शब्द में छिपा होता है, और वो है पश्चिमी विक्षोभ। मौसम विभाग की हर दूसरी रिपोर्ट में सुनाई देने वाला यह शब्द सिर्फ भारत के मौसम को दिशा देने वाला एक अहम मौसमी सिस्टम है। खासकर उत्तर भारत की सर्दी, बारिश और कोहरे की कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन आखिर पश्चिमी विक्षोभ है क्या, यह कहां से आता है और मौसम पर इसका असर इतना गहरा क्यों होता है, आइए कोशिश करते हैं इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की।

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क्या होता है वेस्टर्न डिस्टर्बेंस

अगर आपको मौसम के विषय में थोड़ी सी भी रुचि है, या आपके शहर में मौसम का हाल कैसा रहने वाला है, केवल इतना भर जान लेने के लिए आपने गूगल का इस्तेमाल किया हो, तो आपके सामने एक शब्द जरूर आया होगा- पश्चिमी विक्षोभ, जिसे अंग्रेजी में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (Western Disturbance) कहते हैं। आए दिन बातचीत में हम कहते हैं कि आज ठंड बढ़ गई, आज बारिश हो गई या पहाड़ों में बर्फ गिरने लगी। खासकर उत्तर भारत में जब भी सर्दियों के दौरान अचानक बारिश हो, घना कोहरा छा जाए या बर्फबारी शुरू हो जाए, तो मौसम विभाग यह शब्द जरूर इस्तेमाल करता है। कभीकभार तो ऐसा लगता है, जैसे यह मौसम विज्ञानियों का पसंदीदा शब्द है। अब इतनी जगहों पर इस्तेमाल होने वाला यह शब्द यूं ही तो नहीं बार-बार सामने आ सकता है, तो इसमें इतना खास क्या है। आइए जानते हैं क्या है वेस्टर्न डिस्टर्बेंस यानी पश्चिमी विक्षोभ, वह भी बेहद आसान जबान में।

क्या होता है पश्चिमी विक्षोभ?

अब यह शब्द सुनते ही कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब धरती पर चार दिशाएं हैं, तो मौसम विभाग का पश्चिम से इतना खास राब्ता क्यों है। क्या उत्तर या पूर्व से कोई विक्षोभ नहीं आता? क्या दक्षिण से आने वाला सिस्टम अलग है? इन सभी सवालों के जवाब मौसम के विज्ञान, हवा की दिशा और धरती की भौगोलिक संरचना में छिपे हुए हैं। पश्चिमी विक्षोभ कोई एक तूफान नहीं होता, बल्कि यह एक पूरा मौसमी सिस्टम होता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में एक्स्ट्राट्रॉपिकल डिस्टर्बेंस कहा जाता है। इसका मतलब है ऐसा दबाव तंत्र जो उष्णकटिबंधीय इलाकों के बाहर बनता है और ठंडी-नम हवाओं के साथ आगे बढ़ता है। पश्चिमी विक्षोभ आमतौर पर भूमध्यसागर, कैस्पियन सागर या ब्लैक सी के आसपास जन्म लेता है, जहां ठंडी ध्रुवीय हवाएं और अपेक्षाकृत गर्म समुद्री सतह आपस में टकराती हैं। जब इन क्षेत्रों में वायुमंडलीय अस्थिरता बढ़ती है, तो वहां कम दबाव का क्षेत्र बनता है। यही कम दबाव आगे चलकर पश्चिमी विक्षोभ का रूप ले लेता है। यह सिस्टम अपने साथ नमी, बादल और ठंडी हवा लेकर चलता है और धीरे-धीरे पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है।

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पश्चिम से चलती हैं खास हवाएं (सांकेतिक चित्र: Canva)

इसे पश्चिमी विक्षोभ ही क्यों कहा जाता है

इस मौसमी प्रणाली के नाम में ही इसकी पहचान छिपी हुई है। पश्चिमी विक्षोभ को पश्चिमी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका उद्गम भारत के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों में होता है और इसकी यात्रा की दिशा भी पश्चिम से पूर्व होती है। यह ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों तक पहुंचता है। जब यह सिस्टम भारत में दाखिल होता है, तो सबसे पहले जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे इलाकों में असर दिखाता है। इसके बाद इसका प्रभाव उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-NCR तक फैल जाता है। यही कारण है कि उत्तर भारत में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी का सबसे बड़ा कारण पश्चिमी विक्षोभ को माना जाता है।

सिर्फ पश्चिम से ही क्यों आता है ऐसा मौसमी सिस्टम

धरती की सतह पर देखने पर ऐसा लगता है कि हवाएं हर दिशा से चलती हैं, लेकिन मौसम को नियंत्रित करने वाली असली ताकत ऊपरी वायुमंडल में होती है। जमीन से लगभग 8 से 12 किलोमीटर ऊपर एक बेहद तेज हवा की धारा बहती है, जिसे सबट्रॉपिकल वेस्टरली जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream) कहा जाता है। यह जेट स्ट्रीम पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है और सर्दियों के दौरान बेहद ताकतवर हो जाती है। यही जेट स्ट्रीम पश्चिमी विक्षोभ को अपने साथ खींचकर भारत तक लाती है। अगर यह हवा की धारा न हो, तो भूमध्यसागर के आसपास बने ये सिस्टम भारत तक कभी नहीं पहुंच पाते। इसीलिए भारत के मौसम पर पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव सबसे ज्यादा देखने को मिलता है।

उत्तर, दक्षिण और पूर्व से मौसम क्यों नहीं बदलता

उत्तर दिशा में मौजूद क्षेत्र जैसे साइबेरिया या आर्कटिक बेहद ठंडे जरूर होते हैं, लेकिन वहां की हवाएं आमतौर पर शुष्क होती हैं और ज्यादा नमी नहीं लेकर चलतीं। ये हवाएं भारत तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाती हैं और किसी बड़े मौसमी सिस्टम का रूप नहीं ले पातीं। दक्षिण दिशा से आने वाला सिस्टम मानसून कहलाता है। गर्मियों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नम हवाएं जब भारत में प्रवेश करती हैं, तो उन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है। यह पूरी तरह अलग प्रक्रिया है और इसे पश्चिमी विक्षोभ की श्रेणी में नहीं रखा जाता। पूर्वी हवाएं आमतौर पर बंगाल की खाड़ी और पूर्वी भारत तक ही सीमित रहती हैं। इनका असर उत्तर भारत के मौसम पर अपेक्षाकृत कम होता है। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो भारत के उत्तरी हिस्सों में मौसम को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला सिस्टम पश्चिमी विक्षोभ ही है।

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बारिश कराने में बड़ी भूमिका निभाता है पश्चिमी विक्षोभ (सांकेतिक चित्र: Canva)

भारत में पश्चिमी विक्षोभ का असर कहां और कब दिखता है

पश्चिमी विक्षोभ मुख्य रूप से नवंबर से मार्च के बीच सक्रिय रहता है। यही वह समय होता है जब उत्तर भारत में सर्दी अपने चरम पर होती है। इस दौरान हर कुछ दिनों या हफ्तों में एक नया पश्चिमी विक्षोभ भारत तक पहुंचता है। आमतौर पर सर्दियों में चार से पांच ऐसे सिस्टम सक्रिय रहते हैं। इनका असर सबसे ज्यादा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में दिखता है, जहां भारी बर्फबारी होती है। मैदानी इलाकों में यह बारिश, घना कोहरा और शीतलहर का कारण बनता है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

हिमालय से टकराकर कैसे बदलता है मौसम

जब पश्चिमी विक्षोभ भारत में प्रवेश करता है और हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं से टकराता है, तो वहां मौजूद नम और ठंडी हवाएं ऊपर की ओर उठने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ओरोग्राफिक लिफ्टिंग कहा जाता है। जैसे-जैसे हवा ऊपर उठती है, उसका तापमान गिरता है और नमी कंडेस होकर बादलों का रूप ले लेती है। यही कारण है कि हिमालयी इलाकों में बर्फबारी और मैदानी इलाकों में बारिश होती है। कई बार इसी वजह से घना कोहरा छा जाता है और दृश्यता बेहद कम हो जाती है।

सर्दियों की बारिश का सबसे बड़ा कारण

उत्तर भारत में सर्दियों के मौसम में होने वाली लगभग पूरी बारिश पश्चिमी विक्षोभ की देन होती है। दिसंबर से मार्च के बीच जब भी हल्की या मध्यम बारिश होती है, तो उसके पीछे यही सिस्टम काम कर रहा होता है। यही बारिश तापमान को नियंत्रित करती है और सर्दी को संतुलित बनाए रखती है। अगर पश्चिमी विक्षोभ न हो, तो उत्तर भारत का मौसम बेहद शुष्क और असामान्य रूप से ठंडा हो सकता है। बारिश और बर्फबारी के बिना नदियों का जलस्तर भी प्रभावित होता है। रबी फसलों के लिए भी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस बड़ा जरूरी होता है। गेहूं, चना, सरसों और दालें सर्दियों में इसी बारिश पर निर्भर करती हैं। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है। हालांकि अगर पश्चिमी विक्षोभ बहुत ज्यादा ताकतवर हो जाए, तो यही बारिश फसलों के लिए नुकसानदायक भी बन सकती है। ओलावृष्टि, अत्यधिक वर्षा और खेतों में पानी भरने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

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पहाड़ों पर बर्फबारी का भी होता है जिम्मेदार (सांकेतिक चित्र: Canva)

गर्मियों में देता है राहत, मानसून पर भी असर

अप्रैल से जून के बीच जब पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होता है, तो यह उत्तर भारत में गर्मी के बीच राहत लेकर आता है। इस दौरान बादल छा जाते हैं और हल्की बारिश होती है, जिससे लू और भीषण गर्मी से कुछ समय के लिए राहत मिलती है। इसी को प्री-मानसून गतिविधि कहा जाता है। अगर मई और जून के अंत तक पश्चिमी विक्षोभ बार-बार सक्रिय रहता है, तो यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की गति को प्रभावित कर सकता है। कई बार मानसून की एंट्री में देरी हो जाती है या मानसून एक ही जगह पर अटक जाता है। इससे पूरे देश के वर्षा चक्र पर असर पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन और पश्चिमी विक्षोभ

जलवायु परिवर्तन के चलते पश्चिमी विक्षोभ का स्वरूप भी बदल रहा है। हाल के वर्षों में यह अधिक अनियमित और अधिक तीव्र होता जा रहा है। एल नीनो और ला नीना जैसी घटनाएं भी इसके व्यवहार को प्रभावित कर रही हैं। यही वजह है कि मौसम विभाग इसकी लगातार निगरानी करता है। इतिहास में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के पीछे मजबूत पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका रही है। उत्तराखंड की बाढ़, कश्मीर की तबाही और लेह में हुआ क्लाउडबर्स्ट इसके उदाहरण हैं। ऐसे हालात में पश्चिमी विक्षोभ भारी बारिश, भूस्खलन, हिमस्खलन और जान-माल के नुकसान का कारण बनता है।

अबतक तो आप समझ चुके होंगे कि भारत के मौसम की कहानी ज्यादातर पश्चिम से आने वाली हवाएं लिखती हैं। अगली बार जब उत्तर भारत में अचानक ठंड बढ़े, बारिश हो या पहाड़ों में बर्फ गिरे, तो समझिए कि पश्चिमी विक्षोभ एक बार फिर सक्रिय हो गया है और मौसम का मिजाज बदल चुका है।

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