Explainer: क्या है 'नाता विवाह...' जिसे कोर्ट ने दी कानूनी मान्यता, Live-in जैसा या कोई फर्क?
Nata Vivah in Rajasthan: राजस्थान की नाता प्रथा के अनुसार कुछ जातियों में पत्नी अपने पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है। क्या है 'नाता विवाह' और इसे लेकर कोर्ट ने क्या आदेश दिया है, जानें यह सब...
- Authored by: रवि वैश्य
- Updated Jan 23, 2026, 09:26 AM IST
- नाता प्रथा राजस्थान की एक पुरानी और विशिष्ट सामाजिक परंपरा
- खासतौर पर राज्य के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है
- पति की मृत्यु, तलाक, या अलगाव के बाद महिला समाज की सहमति से किसी अन्य पुरुष के साथ रहती है
भारत में राजस्थान प्रदेश की कला संस्कृति बेहद समृद्ध है, यहां की कुछ परंपराएं सुर्खियों में रहती हैं। बात यहां नाता प्रथा (Nata Pratha of Rajasthan) की। बता दें कि इस प्रथा के अनुसार कुछ जातियों में पत्नी अपने पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है। इसे 'नाता करना' कहते हैं। इसमें कोई औपचारिक रीति रिवाज नहीं करना पड़ता बस केवल आपसी सहमति ही होती है।
राजस्थान में आज भी कायम इस पुरानी परंपरा को माना जाता है। यह प्रथा आधुनिक समाज में महिलाओ की दशा सुधारने के लिए बनाई गयी है। कहा जाता है कि नाता प्रथा को विधवाओं व परित्यक्ता स्त्रियों को सामाजिक जीवन जीने के लिए मान्यता देने के लिए बनाया गया था, जिसे आज भी माना जाता है।
'नाता विवाह' है क्या (What is Nata Vivah)
नाता प्रथा राजस्थान की एक पुरानी और विशिष्ट सामाजिक परंपरा है, जो खासतौर पर राज्य के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है जहां पति की मृत्यु, तलाक, या अलगाव के बाद महिला समाज की सहमति से किसी अन्य पुरुष के साथ रहना शुरू करती है। इसमें धार्मिक रस्में-जैसे सात फेरे आदि की आवश्यक नहीं होतीं, पर समाज और परिवार की स्वीकृति बेहद अहम है। महिला को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना इसका मकसद है। नाता प्रथा के अनुसार कोई भी विवाहित पुरुष या महिला (विधवा,परित्यक्ता) सामाजिक बंधनों का निर्वाह कर अन्य सामाजिक पुरुष या महिला के साथ अपनी मर्जी से संपूर्ण रीति रिवाज के साथ वैवाहिक बंधन में बंध जाते है।
यदि किसी महिला का अपने पति से संबंध टूट जाता है तो...
नाता प्रथा के तहत यदि किसी महिला का अपने पति से संबंध टूट जाता है, चाहे वह पति की मृत्यु,तलाक, परित्याग या आपसी सहमति से अलगाव के कारण हो, तो वह समाज की अनुमति से किसी अन्य पुरुष के साथ रहने का अधिकार रखती है।इस नए संबंध को नाता कहा जाता है। इसमें विस्तृत रस्में जरूरी नहीं होती हैं जैसे-सात फेरे, धार्मिक मंत्र आदि, समाज और परिवार की स्वीकृति ही जरूरी मानी जाती है।राजस्थान के भील, मीणा, गरासिया, रेबारी, जाट और कुछ अन्य समुदायों में नाता प्रथा काफी लंबे समय से चलन में है।
नाता विवाह करने के बाद महिला की क्या होती है स्थिति?
राजस्थान में नाता प्रथा को लेकर समय के साथ कई तरह की बहसें भी सामने आई हैं, समाज और कानून की दृष्टि से यह प्रथा कई बार विवादों में रही है। नाता संबंध में रहने वाली महिला को समाज में विवाहिता जैसा ही दर्जा मिलता है साथ ही वह अपने नए साथी के घर में पत्नी के रूप में रहती है और पत्नी जैसे ही अधिकार रहते हैं।
राजस्थान की इस विशिष्ट नाता प्रथा को समझिए
राजस्थान में एक स्थापित मान्यता है कि कन्या कि उसके संपूर्ण जीवनकाल में केवल एक बार ही शादी हो सकती है। यानी कन्या को जीवनकाल में एक बार तेल चढ़ता है। मतलब कि शादी से जुड़ी रस्मों को भी एक बार ही निभाया जा सकता है। वहां की कई जातियां ऐसा मानती हैं कि एक विधवा महिला अपने पति की मृत्यु के बाद किसी अन्य मर्द के साथ अपना घर बसा सकती है। नाता संबंध में महिला को समाज में विवाहिता जैसा दर्जा मिलता है पर बताते हैं कि कई मामलों में नाता प्रथा का दुरुपयोग भी होता रहा है।
'नाता प्रथा' और 'लिव-इन' में क्या कोई समानता है?
नाता प्रथा अलग है और लिव-इन अलग है। इसे ऐसे समझिए कि लिव-इन में रहने वाली युवती को अपने साथी से पति के रुप में अधिकारों मिलें ही यह जरूरी नहीं है पर नाता प्रथा में युवती को अपने साथी से पत्नी के समान सभी अधिकार मिलते हैं। वहीं लिव-इन रिलेशन में कोई भी युवती और युवक रह सकते हैं। जबकि नाता प्रथा में वही युवक और युवती रह सकते हैं, जिनका एक बार विवाह पूर्व में हो चुका हो। लिव-इन को समाज आमतौर पर मान्यता प्रदान नहीं करता है, किंतु नाता प्रथा को समाज मान्यता देता है।
कोर्ट ने नाता विवाह को एक कानूनी मान्यता दी
हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट ने नाता विवाह को एक वैध विवाह माना है, खासकर जब यह सामाजिक परंपराओं के अनुसार संपन्न हुआ हो। वहीं इस फैसले के बाद नाता विवाह करने वाली महिला को भी अपने पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन और अन्य वित्तीय लाभ मिलेंगे।कोर्ट ने कहा कि नाता विवाह, यदि पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार होता है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत भी वैध माना जा सकता है। यानी नाता विवाह से जुड़ी महिलाओं को भी पेंशन, भरण-पोषण और संपत्ति के अधिकार मिल सकते हैं। ये नाता प्रथा से जुड़ा बेहद अहम फैसला है।
