क्या है मदुरै मंदिर दीपक विवाद? जानें कैसे टेंपल-दरगाह के बीच का मामला जज के खिलाफ महाभियोग तक पहुंचा
महाभियोग लाने का यह प्रस्ताव मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है जो श्रद्धालुओं को मदुरै की एक पहाड़ी पर मौजूद स्तंभ पर पारंपरिक दीप प्रज्वलित करने की इजाजत देता है। खास बात यह है कि मंदिर इस पहाड़ी के नीचे स्थित है। तमिलनाडु की सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए इस पहाड़ी पर श्रद्धालुओं के जाने पर पाबंदी लगाई। इसके बाद यह मामला अदालत में पहुंच गया।
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Dec 11, 2025, 03:06 PM IST
Madurai temple lamp controversy: द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सांसद कनिमोझी ने मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन को हटाने के लिए बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष महाभियोग चलाने का एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव पर इंडिया ब्लॉक के करीब 120 सांसदों के हस्ताक्षर थे। कनिमोझी ने महाभियोग का यह प्रस्ताव जब बिरला को सौंपा तो उनके साथ कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी और समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव मौजूद थे। दरअसल, महाभियोग लाने का यह प्रस्ताव मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है जो श्रद्धालुओं को मदुरै की एक पहाड़ी पर मौजूद स्तंभ पर पारंपरिक दीप प्रज्वलित करने की इजाजत देता है। खास बात यह है कि मंदिर इस पहाड़ी के नीचे स्थित है। तमिलनाडु की सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए इस पहाड़ी पर श्रद्धालुओं के जाने पर पाबंदी लगाई। इसके बाद यह मामला अदालत में पहुंच गया।
हाई कोर्ट के जज ने दीप प्रज्वलित करने की इजाजत दी
बीते 5 दिसंबर को तमिलनाडु सरकार ने जब सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के खिलाफ अपील दायर की तो इस मामले ने तूल पकड़ लिया। इसके अलावा उसने एकल पीठ वाले जज के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट अवमानना मामले की सुनवाई के लिए तैयार हुआ है जबकि मद्रास हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने कहा कि वह मामले की सुनवाई 10 दिसंबर को करेगा। दीप प्रज्वलित करने का यह विवाद एक दिसंबर को मदुरै बेंच के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के उसे फैसले से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने थिरुप्परनकुंद्रम मुरुगन मंदिर में कार्तिगई दीपम पर पहाड़ी पर दीप प्रज्वलन करने की इजाजत दे दी।
दीप प्रज्वलित करने से राज्य सरकार ने रोका
यह अर्जी हिंदू तमिलार कांची के संस्थापक रामा रविकुमार की ओर से दायर की गई थी। कोर्ट की इजाजत के बाद श्रद्धालु तीन दिसंबर को जब पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम उत्सव कर रहे थे तो अधिकारियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। इसके बाद रामा ने अवमानना की अर्जी दायर की। फिर जज ने रविकुमार और 10 अन्य को सीआईएसएफ की सुरक्षा में दीप प्रज्वलित करने की मंजूरी दी लेकिन पुलिस ने एक बार फिर इन्हें पहाड़ी पर धार्मिक अनुष्ठान करने से रोक दिया। राज्य सरकार ने कहा कि उसकी अपील अभी कोर्ट में लंबित है, ऐसे में वह दीप प्रज्वलन की इजाजत नहीं दे सकती।
भगवान मुरुगन के छह पवित्र स्थलों में से एक
बता दें कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी को भगवान मुरुगन के छह पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। यहां एक बड़ा प्रचीन पत्थर और मंदिर है। इस मंदिर का दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। इस पहाड़ी के पास एक दरगाह भी है। दरगाह और मंदिर के बीच विवाद भी काफी पुराना है। पहाड़ी किसकी है इसका विवाद 1920 से चला आ रहा है। इस पहाड़ी के मालिकाना हक को लेकर 1920 में पहला केस दर्ज हुआ। इस मामले की सुनवाई करते हुए सिविल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दरगाह के आस-पास के क्षेत्र को छोड़कर इस पहाड़ी पर अधिकार सुब्रमण्यास्वामी मंदिर का है। पहाड़ी पर दीप उत्सव या धार्मिक अनुष्ठान होना है कि नहीं, कोर्ट ने इस बार में कोई फैसला नहीं सुनाया।
2014 में दीपक जलाने के खिलाफ निर्णय
बीते कई दशकों तक यह मामला शांत रहा लेकिन 1994 में एक श्रद्धालु ने दीप प्रज्वलन अनुष्ठान को पारंपरिक स्थान से स्थानांतरित कर दरगाह के समीप पहाड़ी के ऊपर करने का आदेश देने की मांग की। आगे साल 1996 में हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में दीपम को मंडपम के समीप पारंपरिक स्थान पर प्रज्वलित करने की इजाजत दी। 2014 में, मद्रास हाईकोर्ट की दो जजों की पीठ ने दीपाथुन पर दीपक जलाने के खिलाफ निर्णय दिया था। इस बार, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में कार्तिगाई दीपम जलाने की अनुमति मांगने के लिए एक नई याचिका दायर की गई थी।
क्या है कार्तिगई दीपम
कार्तिगई दीपम तमिलनाडु में मनाया जाने वाला एक दक्षिण भारतीय प्रकाश पर्व है, जो भगवान मुरुगन को समर्पित है। मुरुगन को कार्तिकेय और सुब्रमण्यम स्वामी भी कहा जाता है, जो भगवान शिव और पार्वती के पुत्र हैं। तमिल माह कार्तिगई की पूर्णिमा के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय, समृद्धि के आह्वान और बुरी आत्माओं को दूर भगाने के प्रतीक के रूप में दीप जलाकर मनाया जाता है। इस पर्व में मिट्टी के दीपों की कतारें जलाई जाती हैं, विशेष पूजा की जाती है। यह महादीपक भगवान शिव के अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट होने पर उत्सव के रूप में जलाया जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद को सुलझाने के लिए एक अंतहीन अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। यह महादीपक उचिपिल्लायर मंदिर के पास प्राचीन दीपाथुन नामक पिलर के पास जलाया जाता है।
वीएचपी ने कहा-हिंदू विरोधी है डीएमके सरकार
कार्तिगई दीपम विवाद के बीच, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने डीएमके सरकार पर हमला बोलते हुए इसे हिंदू विरोधी बताया और केंद्र से हिंदुओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने तथा राज्य में कानून का शासन सुनिश्चित करने का आग्रह किया। विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए द्रमुक सरकार की आलोचना करते हुए श्रद्धालुओं के खिलाफ की गई कार्रवाई को "हिंदुओं के मौलिक अधिकारों और संविधान पर हमला और साथ ही न्यायपालिका की अवमानना" करार दिया। इस मुद्दे से शुक्रवार को लोकसभा में हंगामा मच गया। द्रमुक नेता टी आर बालू ने भाजपा पर तमिलनाडु में सांप्रदायिक तनाव "भड़काने" की कोशिश करने का आरोप लगाया, जबकि केंद्रीय मंत्री एल मुरुगन ने "पूजा के अधिकार से इनकार" करने के लिए तमिलनाडु सरकार पर पलटवार किया।
दीपथून पर भी दीप प्रज्वलित करने के लिए बाध्य है-कोर्ट
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने बृहस्पतिवार को मदुरै जिला कलेक्टर और शहर के पुलिस आयुक्त द्वारा दायर एक अंतर-न्यायालयी अपील खारिज कर दी और एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें श्रद्धालुओं को दीपथून में ‘कार्तिगई दीपम’ दीप जलाने की अनुमति दी गई थी। एक दिसंबर को न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन की एकल पीठ ने कहा था कि अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर, उचि पिल्लैयार मंडपम के पास परंपरागत प्रकाश स्तंभ के अलावा, दीपथून पर भी दीप प्रज्वलित करने के लिए बाध्य है। न्यायालय ने कहा था कि ऐसा करने से निकटवर्ती दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। जब आदेश का क्रियान्वयन नहीं हुआ तो एकल न्यायाधीश ने तीन दिसंबर को एक और आदेश पारित कर श्रद्धालुओं को स्वयं दीप जलाने की अनुमति दे दी तथा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इसके बाद राज्य सरकार को शीर्ष न्यायालय का रुख करना पड़ा।