15 साल का 'ममता युग' इतिहास के पन्नों में सिमट गया। कोलकाता की गलियों से लेकर दार्जिलिंग के पहाड़ों तक सिर्फ 'भगवा लहर' का शोर है। यह केवल एक चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत का सबसे बड़ा 'महा-परिवर्तन' है, जहां खुद सूबे की मुखिया ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को अपनी ही जमीन पर शिकस्त का सामना करना पड़ा है।
"कभी 'खेला होबे' के नारों से विरोधियों को ललकारने वालीं ममता बनर्जी के साथ इस बार बंगाल की जनता ने ही खेल बदल दिया। बंगाल की 'बेटी' के दावे पर मोदी की 'गारंटी' ऐसी भारी पड़ी कि तृणमूल का 'किला' ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। भवानीपुर की हार और भाजपा को 207 सीटें मिलना, यह इस बात का सबूत है कि बंगाल की जनता ने इस बार क्या सोच रखा था।
सवाल है कि पिछले 15 साल से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव तक, जिस महिला वोटर्स ने ममता दीदी पर भरोसा जताया, वो इस बार दीदी से क्यों बिफर गई?
बंगाल चुनाव में वोटिंग के लिए कतार में खड़ी महिलाएं। ANI
इस बार बंगाल में लड़ाई दो दलों के बीच तो थी है, लेकिन एक जबरदस्त बहस दो योजनाओं के बीच भी चल रही थी। 'लक्ष्मी' या 'अन्नपूर्णा',पश्चिम बंगाल की महिलाएं इस बार किस पर भरोसा जताएंगी।
कैसे भाजपा ने तोड़ा ममता का महिला वोट बैंक?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'महिला मतदाता' हमेशा से सत्ता की चाबी रही हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 'बंगाल की बेटी' के नारे और 'कन्याश्री' और 'रूपाश्री' जैसी योजनाओं के दम पर महिलाओं का करीब 50 प्रतिशत वोट हासिल किया था, जबकि भाजपा 35 प्रतिशत पर सिमट गई थी।
इस जीत के बाद ममता सरकार ने 'लक्ष्मी भंडार' योजना के जरिए महिला वोट बैंक की घेराबंदी और मजबूत कर दी थी। मई 2022 में शुरू हुई इस योजना के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1,000 रुपये और आरक्षित वर्ग को 1,200 रुपये मासिक मिलते थे, जिसे 2026 के चुनाव से ठीक पहले बढ़ाकर क्रमशः 1,500 और 1,700 रुपये कर दिया गया था।
बंगाल की महिलाओं को लुभाने के लिए दोनों दलों ने की जमकर मेहनत। AI IMAGE
भाजपा का 'अन्नपूर्णा' दांव, सीधे दोगुना फायदा
ममता बनर्जी की 'लक्ष्मी भंडार' योजना की काट के लिए भाजपा ने इस बार 'अन्नपूर्णा भंडार' का मास्टरस्ट्रोक खेला। भाजपा ने वादा किया कि सत्ता में आने पर हर महिला को 3,000 रुपये प्रति माह की वित्तीय सहायता दी जाएगी।
यह राशि टीएमसी द्वारा दी जा रही मदद से लगभग दोगुनी थी, जिसने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को भाजपा की ओर सोचने पर मजबूर कर दिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 'लक्ष्मी भंडार' के भरोसे बैठी टीएमसी के लिए भाजपा का यह '3,000 रुपये वाला दांव' सबसे बड़ी चुनौती साबित हुआ।
आरक्षण और मुफ्त यात्रा
केवल नकद राशि ही नहीं, बीजेपी ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए दूरगामी वादों की झड़ी लगा दी। पार्टी ने घोषणा की कि सत्ता में आने पर पुलिस सहित सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा, जो युवाओं और शिक्षित युवतियों के बीच एक बड़ा आकर्षण बना।
इसके अलावा, दिल्ली की तर्ज पर राज्य की सभी बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा का वादा कर भाजपा ने कामकाजी और मध्यम वर्ग की महिलाओं के दैनिक खर्चों को कम करने की गारंटी दी। सुरक्षा, नौकरी में हिस्सेदारी और 'अन्नपूर्णा' की बड़ी वित्तीय मदद के त्रिकोण ने मिलकर ममता बनर्जी के सबसे मजबूत 'महिला किले' में सेंध लगा दी।
दूर्गा पूजा पंडाल में मौजूद बंगाल के लोगों की फाइल फोटो। istock
जब संदेशखाली की महिलाओं का फूटा गुस्सा
साल 2024 की शुरुआत में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखाली में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के स्थानीय नेता शाहजहां शेख और उसके सहयोगियों द्वारा स्थानीय महिलाओं के यौन शोषण और जबरन जमीन हड़पने के खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन था। इस विवाद की शुरुआत 5 जनवरी 2024 को हुई थी, जब राशन घोटाले की जांच के सिलसिले में ED की टीम पर शाहजहां के समर्थकों ने हमला किया था। अधिकारियों की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और कई अधिकारियों को चोटें आईं. इस घटना ने राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।इसके बाद शाहजहां शेख फरार हो गया और करीब 55 दिनों तक पुलिस के हाथ नहीं आए. इस दौरान संदेशखाली में स्थानीय महिलाओं ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए. महिलाओं ने आरोप लगाया कि शेख और उसके सहयोगी इलाके में दबंगई करते थे, जमीनों पर कब्जा करते थे और महिलाओं के साथ यौन शोषण तक की घटनाएं होती थीं। इन आरोपों ने ममता सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया।
ममता सरकार के दौरान महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया। AI IMAGE
जब ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुआ जघन्य अपराध
9 अगस्त 2024 को कोलकाता के प्रतिष्ठित आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक 31 वर्षीय महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने न केवल पश्चिम बंगाल, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। अस्पताल के सेमिनार हॉल में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर के साथ हुआ बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या एक ऐसी घटना थी, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। इस घटना ने ममता सरकार पर कई सवाल खड़े कर दिए। ‘नो सेफ्टी, नो ड्यूटी’ के आह्वान पर देशभर के डॉक्टर सड़क पर आए, और कोलकाता की लाखों महिलाएं ‘रिक्लेम द नाइट’ आंदोलन में आधी रात सड़कों पर निकलीं।दोनों मुद्दों को भुनाने में कामयाब रही बीजेपी
भाजपा (BJP) ने अपनी चुनावी रणनीति में आरजी कर मेडिकल कॉलेज की जघन्य घटना और संदेशखाली में महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मुद्दों को केंद्र में रखा। पार्टी ने केवल सहानुभूति नहीं बटोरी, बल्कि आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ और संदेशखाली आंदोलन का चेहरा रहीं रेखा पात्रा को टिकट देकर इसे 'अस्मिता की लड़ाई' बना दिया। रत्ना देबनाथ की पनिहाटी में जीत और रेखा पात्रा की बशीरहाट में सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की महिलाओं ने टीएमसी शासन के दौरान उपजी असुरक्षा और प्रशासनिक विफलता के खिलाफ अपना जनादेश दिया है।
बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी की फोटो। PTI
'दुर्गा सुरोखा स्क्वाड' का भरोसा
महिलाओं के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करने के लिए भाजपा ने "दुर्गा सुरोखा स्क्वाड" जैसी विशेष महिला गश्ती टीम और हर ब्लॉक में महिला पुलिस स्टेशन खोलने का ठोस वादा किया। इसके साथ ही, पार्टी ने आत्मरक्षा प्रशिक्षण और हर थाने में महिला हेल्प डेस्क की घोषणा कर यह संदेश दिया कि उनकी सरकार में कानून-व्यवस्था प्राथमिकता होगी।
महिलाओं ने संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं के बाद राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर जो असंतोष व्यक्त किया था, भाजपा ने उसे एक व्यवस्थित सुरक्षा ढांचे के वादे से संतुलित किया। यही कारण रहा कि जमीनी स्तर पर महिलाओं ने टीएमसी के 'कट मनी' और 'सिंडिकेट राज' के मुकाबले भाजपा के सुरक्षा मॉडल को अधिक विश्वसनीय माना।
आर्थिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का 'विजन 2026'
भाजपा ने महिला मतदाताओं को केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक और स्वास्थ्य लाभों का भी विजन दिया। पार्टी के घोषणापत्र में गर्भवती महिलाओं को 21,000 रुपये की सहायता, स्नातक छात्राओं को 50,000 रुपये और 75 लाख 'लखपति दीदियों' के निर्माण जैसे वादों ने मध्यम और निम्न आय वर्ग की महिलाओं को आकर्षित किया।
इसके अतिरिक्त, मुफ्त एचपीवी टीकाकरण और स्तन कैंसर की जांच जैसे स्वास्थ्य संबंधी वादों ने महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता सुधारने का भरोसा दिलाया। आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी और कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल की सुविधा जैसे कदमों ने यह सुनिश्चित किया कि भाजपा का एजेंडा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक सशक्तिकरण पर आधारित है, जिससे अंततः ममता बनर्जी के 'बेटी' कार्ड पर बीजेपी की 'गारंटी' भारी पड़ी।
