पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों (West Bengal Election 2026 dates) के ऐलान के साथ ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग (Election Commission) के मुताबिक राज्य में दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान कराया जाएगा, जबकि 4 मई को मतगणना के बाद नतीजे घोषित होंगे। चुनाव कार्यक्रम सामने आने के बाद सभी राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं। बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से चार दलों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है-तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी),भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और कांग्रेस। चुनावी कार्यक्रम सामने आने के बाद अब राजनीतिक दल अपनी रणनीति तेज कर रहे हैं और राजनीतिक विश्लेषक भी विभिन्न दलों की ताकत और कमजोरियों का आकलन कर रहे हैं। हर दल अपने-अपने तरीके से चुनावी मैदान में उतर रहा है, लेकिन सभी के सामने अलग-अलग चुनौतियां भी हैं। ऐसे में हम इन सभी प्रमुख पार्टियों की ताकत और कमजोरी का विश्लेषण करेंगे और बताएंगे कि कौन किस पर कैसे भारी पड़ सकता है....
सबसे पहले तो जानें बंगाल चुनाव का कार्यक्रम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए चुनाव आयोग ने पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव दो चरणों में कराए जाएंगे और सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 148 सीटों का बहुमत हासिल करना होगा।
चुनाव कार्यक्रम के अनुसार पहले चरण की अधिसूचना 30 मार्च को जारी होगी, जबकि दूसरे चरण की अधिसूचना 2 अप्रैल को जारी की जाएगी। पहले चरण के लिए नामांकन की अंतिम तारीख 6 अप्रैल और दूसरे चरण के लिए 9 अप्रैल तय की गई है। इसके बाद नामांकन पत्रों की जांच 7 अप्रैल और 10 अप्रैल को की जाएगी। उम्मीदवार पहले चरण के लिए 9 अप्रैल और दूसरे चरण के लिए 13 अप्रैल तक अपना नाम वापस ले सकेंगे।
मतदान की बात करें तो पहले चरण की वोटिंग 23 अप्रैल को और दूसरे चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को होगी। दोनों चरणों के मतदान के बाद 4 मई को वोटों की गिनती की जाएगी और उसी दिन चुनाव परिणाम घोषित किए जाएंगे।
मजबूत नेतृत्व के सहारे सत्ता में है टीएमसी
पश्चिम बंगाल में फिलहाल ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता में है। 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद से टीएमसी लगातार राज्य की राजनीति में सबसे प्रभावशाली दल बनी हुई है।abhishek banerjee on evm
टीएमसी की ताकत
1. ममता बनर्जी की लोकप्रियतामुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी बीते एक दशक से अधिक समय से राज्य में मजबूत जनाधार और सत्ता बरकरार रखे हुए है। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत बनर्जी की प्रभावशाली छवि बनी हुई है, जिनका जनाधार और जूझारु रवैया अब भी बंगाल की राजनीति में विपक्षी दलों पर भारी है। बीते वर्षों में उन्होंने खुद को राज्य स्तर पर एक कद्दावर नेता और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की आवाज के रूप में स्थापित किया है।
2. मजबूत संगठनात्मक ढांचा
पार्टी की एक और ताकत इसका मजबूत संगठनात्मक ढांचा है, जो राज्य नेतृत्व से लेकर गांवों और शहरों में बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं तक फैला हुआ है। पंचायत निकायों, नगरपालिका बोर्ड और स्थानीय समितियों के माध्यम से इस नेटवर्क को मजबूती मिली है। इसके अलावा इस नेटवर्क के जरिये पार्टी को मतदाताओं को प्रभावी ढंग से संगठित और सक्रिय रखने में मदद मिली है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान, टीएमसी ने स्थानीय स्तर पर अपनी मशीनरी को सक्रिय किया ताकि इस प्रक्रिया की निगरानी करके यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसका जनाधार अटूट बना रहे।
3. कल्याणकारी योजनाओं का प्रभाव
टीएमसी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई सामाजिक योजनाएं लागू की हैं। जिनमें ये प्रमुख हैं-
- लक्ष्मी भंडार
- कन्याश्री
- स्वास्थ्य साथी
टीएमसी की कमजोरियां
1. सत्ता विरोधी लहरकरीब डेढ़ दशक से सत्ता में रहने के कारण टीएमसी को अब सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ सकता है।
2. भ्रष्टाचार के आरोप
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षक भर्ती और अन्य घोटालों को लेकर पार्टी को आलोचना झेलनी पड़ी है।
3. आंतरिक गुटबाजी
पार्टी के भीतर गुटबाजी एक और चुनौती बनी हुई है। जिला स्तरीय नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक प्रभाव के लिए होड़ कभी-कभी सार्वजनिक झगड़ों का कारण बन चुकी है, विशेषकर स्थानीय चुनावों के दौरान।
ऐसी तनावपूर्ण स्थितियां संगठनात्मक एकजुटता को कमजोर कर सकती हैं, जब पार्टी को एसआईआर प्रक्रिया के राजनीतिक निहितार्थों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
भाजपा की ताकत
भाजपा भी इस बार जोर-शोर से चुनावी मैदान में उतरी है। हालांकि उसकी भी कुछ ताकत और कुछ कमजोरियां हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आलाकमान के प्रभावशाली नेतृत्व से आस लगाए हुए है। पार्टी ने हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण के माध्यम से अपनी पकड़ बनाई है, साथ ही भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित किया है।
पिछले एक दशक के बंगाल के चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि भाजपा ने पारंपरिक वाम और कांग्रेस के मतदाताओं को आकर्षित कर राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खुद को स्थापित किया है। भाजपा ने साल 2001 के चुनाव में केवल पांच प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 2016 में 291 में से केवल तीन सीट जीती थीं। अब पार्टी का मत प्रतिशत 39 प्रतिशत से अधिक है। पार्टी के 12 सांसद और 65 से अधिक विधायक हैं।
भाजपा की कमजोरियां भी जान लें
- दूसरी ओर पार्टी की कुछ कमजोरियां भी हैं। यह विडंबना ही लगती है कि राष्ट्रीय स्तर पर करिश्माई नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी को टीएमसी के सामने करारी हार का सामना करना पड़ा है। विश्लेषकों के अनुसार, टीएमसी की भाजपा को बाहरी बताने की मुहिम काफी कारगर रही है जिससे भाजपा को नुकसान हुआ है।
- विश्लेषकों के अनुसार वास्तव में कथित ’उत्तर भारतीय मॉडल’ पर भाजपा की अत्यधिक निर्भरता अक्सर पार्टी की संभावनाओं के खिलाफ काम करती है। इसके अलावा कई लोगों के अनुसार, एसआईआर पर भाजपा के अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूह पार्टी से दूरी बना सकते हैं।
- भाजपा की बंगाल इकाई में गहरी आंतरिक गुटबाजी के बार-बार सामने आने से पिछले चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा है।
खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में माकपा
वहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और वाम मोर्चा जो कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी हुआ करते थे, वो आज अपनी खोई जमीन वापस पाने की कवायद में लगे हैं। 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे ने लगातार 34 वर्षों तक राज्य पर शासन किया, लेकिन 2011 के बाद से वाम दलों का जनाधार तेजी से घटा है। इसके बावजूद माकपा अभी भी राजनीतिक वापसी की कोशिश कर रही है। पार्टी अपने नेताओं की सादगी और साफ छवि को अपनी बड़ी ताकत के रूप में पेश करती है। हाल के वर्षों में माकपा ने कई मुद्दों पर आंदोलन चलाए हैं, जिनमें शिक्षक भर्ती घोटाला और आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज से जुड़ा मामला प्रमुख रहे हैं। इन आंदोलनों के जरिए पार्टी जनता के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रही है।माकपा के सामने ढेरों कठिनाइयां
फिर भी चुनावी स्तर पर माकपा को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत काफी कम हो गया है और संगठनात्मक ढांचा भी पहले जितना मजबूत नहीं रहा। इसके अलावा पार्टी नेतृत्व के उम्रदराज होने और नई पीढ़ी के नेताओं की कमी को भी एक बड़ी चुनौती माना जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वाम दलों के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और पुनर्जीवित करने की बड़ी परीक्षा है।
Adhir Ranjan Chowdhury
कांग्रेस: सीमित प्रभाव, लेकिन उम्मीद कायम
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति भी पिछले वर्षों में कमजोर हुई है, लेकिन पार्टी अभी भी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही है। इस बार कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठबंधन के बजाय अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हालांकि राज्य के कुछ हिस्सों विशेष रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में कांग्रेस का पारंपरिक जनाधार अब भी मौजूद है। इन क्षेत्रों में पार्टी को उम्मीद है कि वह अपने पुराने वोट बैंक को फिर से सक्रिय कर सकती है।कांग्रेस की एक ताकत यह भी मानी जाती है कि पार्टी के टिकट के लिए बड़ी संख्या में आवेदन सामने आए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि कई नेता और कार्यकर्ता अब भी पार्टी के साथ जुड़ना चाहते हैं। इसके बावजूद संगठनात्मक कमजोरी, सीमित संसाधन और कई जिलों में कमजोर नेटवर्क कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी की मौजूदगी पहले के मुकाबले काफी कम हो चुकी है, जिससे चुनावी मुकाबले में उसकी स्थिति कमजोर हो जाती है।
बंगाल चुनाव: किसके लिए कितना कठिन मुकाबला?
पश्चिम बंगाल का चुनाव हमेशा से देश की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और इस बार भी मुकाबला काफी दिलचस्प नजर आ रहा है। एक ओर टीएमसी अपनी सत्ता बरकरार रखने की कोशिश करेगी, वहीं भाजपा राज्य में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी। दूसरी तरफ माकपा अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है और कांग्रेस अपने पारंपरिक क्षेत्रों में वापसी की उम्मीद लगाए हुए है। ऐसे में यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक दिशा का भी संकेत देगा। आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार, गठबंधन और स्थानीय मुद्दे इस मुकाबले को और भी रोचक बना सकते हैं।
